मुख्यपृष्ठसंपादकीयरोखठोकरोखठोक : हेराल्ड, नेहरू व ई.डी.!

रोखठोक : हेराल्ड, नेहरू व ई.डी.!

संजय राऊत -कार्यकारी संपादक 

नेशनल हेराल्ड प्रकरण में ईडी ने सोनिया व राहुल गांधी को नोटिस जारी की है। अब इस प्रकरण में खुद पंडित जवाहरलाल नेहरू को ही नोटिस देकर उसे उनके स्मारक पर चिपका दिया जाए तो इस पर हैरानी नहीं होनी चाहिए! वर्ल्ड मतलब स्वतंत्रता संग्राम की संस्था नेहरू ने इसे तैयार किया था यह सिर्फ संपत्ति नहीं है, राजनीति के वर्तमान व्यापारियों की समझ में कभी नहीं आएगा। 

नेहरू द्वारा शुरू किए गए नेशनल हेराल्ड का राजनीतिक महत्व बहुत पहले खत्म हो गया है, लेकिन हेराल्ड को लेकर राजनीति जारी ही है। नेशनल हेराल्ड नामक अखबार की शुरुआत पंडित नेहरू ने की थी। अंग्रेजों को देश से खदेड़ना इस अखबार का मुख्य उद्देश्य था। नेहरू ने वर्ष १९३७ में इस समाचार पत्र को शुरू किया था। उस समय स्वयं नेहरू, महात्मा गांधी और सरदार पटेल इस अखबार के मुख्य आधार स्तंभ थे। हेराल्ड उस समय स्वतंत्रता संग्राम के मुखर प्रवक्ता के रूप में लोकप्रिय था। हिंदुस्थान के स्वतंत्रता संग्राम में निश्चित तौर पर क्या चल रहा है, अंग्रेज क्या कर रहे हैं, इसके पीछे की सच्चाई जानना चाहते हैं तो ‘नेशनल हेराल्ड’ पढ़ें, ऐसा दुनियाभर में कहा जाता था। ‘टाइम्स’ से लेकर, देश के कई समाचार पत्र अंग्रेजों के चरणदास ही बन गए थे। जलियांवाला बाग हत्याकांड जैसी घटनाओं का एकतरफा विवरण ये समाचार पत्र दे रहे थे, ऐसे समय में नेहरू के ‘हेराल्ड’ के सत्यप्रकाश का सूरज देश में चमक रहा था। नेहरू के इस समाचार पत्र का खौफ अंग्रेजों ने इतना लिया था कि उन्होंने १९४२ के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के दौरान नेशनल हेराल्ड पर प्रतिबंध ही लगा दिया। १९४५ तक इस अखबार पर प्रतिबंध लगा रहा। देश के स्वतंत्रता संग्राम के लिए इस समाचार पत्र को शुरू किया गया था। यह सेनानियों के लिए एक शस्त्र था। इसमें धार थी और नीतिमत्ता थी। यह धन कमाने के लिए शुरू किया गया व्यवसाय नहीं था। यह स्वतंत्रता संग्राम के लिए शुरू किया गया एक मिशन था। अब इस अखबार में गड़बड़ी के एक मामले में सोनिया गांधी और राहुल गांधी को ‘ईडी’ ने समन्स भेजे हैं।

गांधी पर आरोप
‘नेशनल हेराल्ड’ के बारे में नई पीढ़ी को ज्यादा जानकारी हो, ऐसी कोई वजह नहीं है। कांग्रेस के नए लोगों को भी पता नहीं होगा। इस प्रकरण को लेकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर आरोप लगा इसलिए नेशनल हेराल्ड के बारे में कांग्रेसियों को पता चला परंतु नेशनल हेराल्ड कभी कांग्रेस का सामथ्र्य था। इसमें नेहरू की आत्मा ही बसी थी। नेहरू निडर थे। किसी आलोचना से वे नहीं डरते थे। ‘नेशनल हेराल्ड’ ने उसी स्वतंत्र पत्रकारिता का समर्थन किया। उसकी कई कहानियां हैं। नेहरू एक स्नेही व्यक्तित्व थे।
वर्तमान शासकों और पत्रकारों का उस तरह से कम ही जमता है। परंतु इस संबंध में नेहरू ने ही क्या कहा है, उसे आज प्रस्तुत करना उचित होगा।
‘नेवर राइट आउट ऑफ फियर’ डरकर कभी भी कुछ मत लिखो, पत्रकारों के लिए नेहरू का हमेशा यही संदेश रहा है। स्वतंत्रता पूर्व के काल में नेहरू दैनिक ‘नेशनल हेराल्ड’ के प्रबंध निदेशक थे। वैâ. चलपति राव संपादक थे। वे कांग्रेस पार्टी की भी आलोचना करते थे। उस समय जब कांग्रेस के लोग उनसे इसकी शिकायत करते थे, तब नेहरू ने उक्त बातें कही थीं। उन्होंने आगे कहा, ‘कायरता एक संसर्गजन्य रोग और एक अपराध है। बहादुर बनो और नेतृत्व करो। लोग आपकी बात सुनेंगे। अगर तुम उपेक्षा करोगे तो दूसरे थर-थर कांपेंगे और कुछ धराशायी हो जाएंगे।’
जब नेहरू लखनऊ पहुंचे, तो स्थानीय कांग्रेसियों ने मौका देखकर ‘नेशनल हेराल्ड’ के बारे में अपनी शिकायतों को व्यक्त किया। ‘नेशनल हेराल्ड’ कांग्रेस पार्टी का मुखपत्र होने के बाद भी सिरदर्द बन गया है, ऐसा एक ने कहा। नेहरू नाराज हो गए। उन्होंने कहा, ‘तुम मुझसे क्या चाहते हो? संपादकों को बुलाऊं और उनसे कहूं कि आप हमेशा सबकी स्तुति करते रहें? ऐसा मुझे उनसे कहना चाहिए। आपकी पार्टी के दैनिक अखबार के संपादक चलपति राव एक बहुत ही काबिल पत्रकार हैं और उनकी निष्ठा संदेह से परे है! उस संपादक का क्या फायदा जो केवल देश के लिए प्रशंसा का काम करता है?’
‘नेशनल हेराल्ड’ को भारी नुकसान हो रहा था। सालाना बैठक में लगातार घाटे का मुद्दा उठता रहा। नेहरू ने अचानक कहा, ‘यदि आप नुकसान की भरपाई नहीं कर सकते हैं, तो मेरा आनंद भवन बेच दो और वह पैसा ‘नेशनल हेराल्ड’ के लिए ले लो!’
‘नेशनल हेराल्ड’ के संवाददाता और लंबे समय से नेहरू के साथ रहनेवाले पी.डी. टंडन की पुस्तक में ये संस्मरण उपलब्ध हैं। परंतु २ अगस्त, १९४२ को नेहरू, मुंबई के लिए रवाना हुए। उन्होंने टंडन को बुलाया और उन्हें पत्र वाला एक लिफाफा दिया। ‘मैं मुंबई जा रहा हूं। हमें गिरफ्तार किए जाने की संभावना है। आपके टेलीफोन बिल की समस्या न हो इसलिए यह व्यवस्था।’ नेहरू ने कहा।
इसमें दो महीने के टेलीफोन बिल का इंतजाम था। नेहरू ने ४४ रुपए और साथ में एक पत्र रखा था। आगे के बिल निम्नलिखित व्यक्तियों से लें। १. विजयलक्ष्मी पंडित, २. इंदिरा नेहरू गांधी, ३. बी.एन. वर्मा। नेहरू ने इसकी व्यवस्था की। ‘नेशनल हेराल्ड’ की ओर से नहीं। अपने खर्चे से किया।
अपने संवाददाता के टेलीफोन का ध्यान रखनेवाले नेहरू, मालिक होने के बाद भी संपादक की स्वतंत्रता के स्रोत कहलानेवाले नेहरू। नेहरू बहुत से लोगों को इतना क्यों पसंद करते हैं, इसकी वजह इस वजह से तो साफ हो जानी चाहिए।
डॉ. स्वामी की लड़ाई
‘नेशनल हेराल्ड’ प्रकरण में डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने शिकायत दर्ज कराई थी। मामला कोर्ट में चला गया। यह जांच तब हुई जब अरुण जेटली वित्त मंत्री थे। उनका मानना ​​था कि इस मामले में दम नहीं है और पूरे मामले को बंद कर दिया। निश्चित तौर पर ये पूरा प्रकरण क्या है, इसे ठीक से समझ लेना चाहिए। १ अप्रैल, २००८ को इस अखबार को बंद करने का निर्णय लिया गया। उस समय समाचार पत्र का स्वामित्व एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड के पास था। एजीएल पर ९० करोड़ रुपए से अधिक का बकाया था। उस कर्ज को चुकाने के लिए एक और कंपनी स्थापित की गई थी। उस वंâपनी का नाम यंग इंडिया लिमिटेड है। इसमें राहुल और सोनिया की हिस्सेदारी ३८-३८ फीसदी थी। ‘एजीएल’ के नौ करोड़ रुपए के शेयर १० रुपए के भाव से यंग इंडिया को दिए गए। वर्ष १९३८ में शेयर के दाम १० रुपए थे। उसी कीमत में शेयर बेच दिए। डॉ. स्वामी ने ये आरोप लगाया कि ऐसी कंपनी  जिसका कोई व्यवसाय नहीं था, ५० लाख रुपए के बदले २,००० करोड़ रुपए की मालिक बन गई। इस कंपनी  के अन्य निदेशकों में मोतीलाल वोरा, ऑस्कर फर्नांडीस, सुमन दुबे और सैम पित्रोदा को भी आरोपी बनाया गया लेकिन लाइम लाइट में सोनिया और राहुल ही रहे। इस पूरे मामले में मनी लॉन्ड्रिंग कहीं भी नहीं हुई थी। आपराधिक मार्ग से कमाए गए धन का उपयोग हुआ हो, ऐसा भी दिखता नहीं। फिर भी ‘ईडी’ इसमें घुस गई।
‘सामना’ का आदर्श
‘नेशनल हेराल्ड’ के संबंध में, मेरी राहुल गांधी और उनके सहयोगियों के साथ कुछ मौकों पर चर्चा हुई थी। मुंबई में ‘नेशनल हेराल्ड’ अखबार चल रहा है। सुजाता आनंदन इसकी संपादक हैं, लेकिन ‘हेराल्ड’ चालू है, ये महाराष्ट्र में कांग्रेस के लोग जानते हैं क्या? ‘सामना’ शिवसेना का मुखपत्र है। इसे कैसे चलाया जाता है? और यह अखबार लोकप्रिय क्यों है? मैंने इसकी जानकारी ‘नेशनल हेराल्ड’ चलाने की इच्छा रखनेवालों को दी। ‘सामना’ की शुरुआत बालासाहेब ठाकरे ने की थी। उसी तरह ‘नेशनल हेराल्ड’ को पंडित नेहरू ने शुरू किया था। यह  सिर्फ  संपत्ति नहीं है। वे विचारों और भूमिकाओं के वाहक हैं।
‘नेशनल हेराल्ड’ प्रकरण में कर्ज चुकाने के लिए लेन-देन किया गया। इसे कदाचार नहीं कहा जा सकता। इस पूरे प्रकरण में सोनिया गांधी और राहुल गांधी को आरोपियों के कटघरे में खड़ा किया गया। क्या कह सकते हैं, ‘नेशनल हेराल्ड’ प्रकरण में नेहरू के नाम पर भी एकाध समन उनके स्मारक पर चस्पां कर दिया जाएगा। गांधी, नेहरू और पटेल के स्वतंत्रता संग्राम को वित्तीय गति देने के लिए बिड़ला और बजाज के नाम भी समन जारी किए जाएंगे।
‘नेशनल हेराल्ड’ के मामले को इतना तूल देने की जरूरत नहीं थी।
पंडित नेहरू की यह संस्था टिकी रहे इसके लिए कांग्रेस ने कुछ हेर-फेर  किए होंगे। ऐसे हेर-फेर  संघ परिवार के कई संगठन करते हैं। पीएम केयर फंड  से भाजपा के खजाने में जमा होनेवाले सैकड़ों करोड़ रुपयों पर सवाल उठे ही हैं।
…परंतु नेहरू का ‘हेराल्ड’ अपराधी बन गया! पंडित नेहरू को ई.डी., सीबीआई से नोटिस मिलने के बाद ही कुछ लोगों की आत्मा शांत होगी!

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