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हाय राम सब पर लगाम!

यूट्यूबिया चैनलों समेत निजी चैनलों पर सरकार कसेगी नकेल, नए ‘प्रसारण’ विधेयक पर संदेह के बादल

इन दिनों देश में निजी टीवी चैनलों की बहार है। इनमें राज्य स्तर पर कई खबरिया चैनल हैं, जो केंद्र सरकार के क्रियाकलापों पर बेलगाम टीका-टिप्पणी करते हैं। इसी तरह से यूट्यूब पर भी ढेरों खबरिया चैनल उग आए हैं, जो बिंदास केंद्र सरकार की आलोचना करते हैं। ऐसे में केंद्र का परेशान होना लाजिमी है। अब केंद्र सरकार जो नया ‘प्रसारण’ विधेयक ला रही है, उससे संदेह के बादल उमड़ने लगे हैं कि सरकार इस विधेयक के जरिए इन सभी चैनलों पर लगाम लगाना चाहती है।

गौरतलब है कि सरकार विभिन्न मनोरंजन प्लेटफॉर्मों, मीडिया व प्रौद्योगिकियों को एक ही नियामक ढांचे के तहत लाना चाहती है। इसके लिए ‘प्रसारण सेवा विनियमन विधेयक २०२३’ का प्रारूप बनाया गया है। इसे सूचना और प्रसारण मंत्रालय (एमआईबी) द्वारा सार्वजनिक परामर्श के लिए रखा गया है। माना जा रहा है कि इसका प्रसारण क्षेत्र पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा। सरकार का दावा है कि उसका लक्ष्य हिंदुस्थान को वैश्विक सामग्री उत्पादन केंद्र बनाना है। मगर विशेषज्ञों का कहना है कि प्रस्तावित कानून सामग्री निर्माण प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है, क्योंकि टीवी चैनलों की तरह ओटीटी प्लेटफॉर्म भी एक प्रोग्राम कोड से बंधे होंगे। अब तक ओटीटी प्लेटफॉर्मों को उस तरह की सामग्री बनाने की स्वतंत्रता थी, जो वे चाहते थे। हालांकि, इस वक्त कई राज्यों में कई टीवी चैनलों और ओटीटी की बागडोर विपक्ष के हाथों में है। ऐसे में उनका मानना है कि केंद्र सरकार इस कानून के माध्यम से उनके ऊपर नियंत्रण लाना चाहती है।

ब्रॉडकास्टिंग सर्विसेज रेगुलेशन बिल, २०२३, तीन दशक पुराने केबल टेलीविजन नेटवर्क रेगुलेशन एक्ट १९९५ (सीटीएन एक्ट) को बदलने का प्रयास है और ‘ओटीटी’ और डिजिटल समाचार को शामिल करके एमआईबी के नियामक ढांचे को व्यापक बनाने का प्रयास है। टीवी चैनलों और एफएम रेडियो के साथ-साथ केबल टीवी, डायरेक्ट टू होम (डीटीएच), इंटरनेट प्रोटोकॉल टेलीविजन (आईपीटीवी), और हेडएंड इन द स्काई (एचआईटीएस) जैसे वितरण प्लेटफॉर्म भी इसमें शामिल हैं। वर्तमान में एमआईबी, सीटीएन अधिनियम के माध्यम से केबल टीवी ऑपरेटरों और टीवी चैनलों को नियंत्रित करता है। इसके अतिरिक्त यह सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, २०२१ के भाग- ३ का प्रबंधन करता है, जो ओटीटी और डिजिटल समाचार सामग्री को नियंत्रित करता है। एमआईबी कहना है कि डीटीएच, आईपीटीवी और ओटीटी जैसी नई प्रौद्योगिकियों और प्लेटफॉर्मों के आगमन के कारण प्रसारण क्षेत्र में बड़ा बदलाव आया है, और इसलिए विनियमन को पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव के साथ तालमेल रखना चाहिए। मंत्रालय ने तर्क दिया है कि प्रस्तावित कानून पूरे प्रसारण क्षेत्र के लिए एक समेकित कानूनी ढांचा प्रदान करेगा, क्योंकि विभिन्न सेवाओं और प्लेटफॉर्मों के लिए अलग-अलग नियम और कानून हैं। एमआईबी का मानना ​​है कि प्रस्तावित कानून, कार्यक्रम और विज्ञापन कोड के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए स्व-नियामक तंत्र को मजबूत करेगा। प्रसारण उद्योग सामग्री मूल्यांकन समिति (सीईसी) द्वारा सामग्री के स्व-प्रमाणन जैसे खंड की शुरूआत से चिंतित है। उनका मानना ​​है कि यह टीवी प्रसारकों और ओटीटी खिलाड़ियों की रचनात्मक स्वतंत्रता को समान रूप से बाधित करेगा।

हितधारकों का यह भी दावा है कि सामग्री के प्रसार से पहले सीईसी की मंजूरी की आवश्यकता के कारण, एमआईबी एक आंतरिक सेंसर बोर्ड के समान एक निकाय की स्थापना कर रहा है जिसमें महिलाओं, बाल कल्याण अधिवक्ताओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यकों जैसे विभिन्न क्षेत्रों के बाहरी सदस्य शामिल होंगे। ओटीटी प्लेटफॉर्मों को डर है कि एमआईबी प्रोग्राम कोड के माध्यम से उनके क्षेत्र में पुराने टीवी नियम लागू करेगा। उदाहरण के लिए टीवी चैनलों के लिए मौजूदा प्रोग्राम कोड ऐसी सामग्री पर प्रतिबंध लगाता है जो ‘बैड टेस्ट’ के हैं या फिर शालीनता के खिलाफ हों। एमआईबी से टीवी, रेडियो और डिजिटल के लिए अलग-अलग प्रोग्राम कोड निर्धारित करने की उम्मीद की जाती है।

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