हाय रे गर्मी

जाने ये कैसा बवाल हुआ
अपना जीना मुहाल हुआ,
नहा रहे हैं सब बिन पानी
गर्मी में बुरा है हाल हुआ।
नींद न आती रातों को
पंखे, एसी सब फेल हुए
खुद के घर भी अब तो जैसे
लगे तिहाड़ के जेल हुए,
रोता छोटा बच्चा अब तो
अपने जी का जंजाल हुआ
नहा रहे है सब बिन पानी
गर्मी में बुरा है हाल हुआ।
बादल भी देखो उमड़-उमड़कर
अपने रंग दिखाता है
उम्मीद बंधे जब बरखा की
सबको ये ठेंगा दिखाता है,
शीत लहर तन में लगना
अब तो जैसे एक खयाल हुआ
नहा रहे है सब बिन पानी
गर्मी में बुरा है हाल हुआ।
एक सन्नाटा-सा छाया है
न हवा ही है किसी ओर बहे
साथी हैं बने मच्छर अपने
रो-रोकर अपने किस्से कहें,
नींद उड़ी है रातों की
दिन में बुरा है हाल हुआ
नहा रहे है सब बिन पानी
गर्मी में बुरा है हाल हुआ।
जाने किसका गुस्सा हम पर
सूर्य देव हैं निकाल रहे,
आलू की तरह क्यों हमको
दिन-रात ही ये उबाल रहे,
जाने कौन-सी खता हमारी
मन में खड़ा है यही सवाल हुआ
नहा रहे है सब बिन पानी
गर्मी में बुरा है हाल हुआ।
-अंकुर यादव, आजमगढ़

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