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हाई कोर्ट की फटकार, हिली घाती सरकार! …सार्वजनिक भूखंडों पर अतिक्रमण का मामला

क्या सो रही है सरकार
अतिक्रमण हटाने के  लिए जिला कलेक्टरों को दो निर्देश

सामना संवाददाता / मुंबई
हाई कोर्ट द्वारा तीन साल पहले कांदिवली में अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई पर अस्थायी रोक लगाने के बाद उच्च न्यायालय ने बुधवार को सार्वजनिक भूखंडों पर अवैध निर्माण के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया। सरकार ने अभी तक उस रोक को हटाने के लिए एक सरल आवेदन क्यों नहीं किया है? क्या सरकार सो रही है? ऐसे शब्दों में अदालत ने शिंदे सरकार के कान मरोड़े। उन्होंने मुख्य सचिव को राज्य भर में सार्वजनिक भूखंडों पर अतिक्रमण को रोकने के लिए सभी जिलों के कलेक्टरों को निर्देश जारी करने का आदेश दिया।
कांदिवली में पार्क के लिए आरक्षित प्लॉट पर अतिक्रमण हो गया है। सरकार ने इन अतिक्रमणों को हटाने का वादा किया था, लेकिन तीन साल में कोई कार्रवाई नहीं की गई और न ही सिविल कोर्ट द्वारा दी गई अंतरिम रोक को हटाने के लिए कोई आवेदन दायर किया गया है। सरकार की धीमी कार्यप्रणाली की ओर इशारा करते हुए ‘वॉयस अगेंस्ट इलीगल एक्टिविटी’ संगठन ने हाई कोर्ट में अंतरिम अर्जी दाखिल की है। बुधवार को मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय व न्यायमूर्ति आरिफ डॉक्टर की खंडपीठ के समक्ष इसकी सुनवाई हुई। इस दौरान पीठ ने उपनगरीय जिला कलेक्टरों की लापरवाही को लेकर शिंदे सरकार को कड़े शब्दों में फटकार लगाई।

जिला कलेक्टर से मांगी गई रिपोर्ट
कोर्ट की फटकार लगते ही शिंदे सरकार बुरी तरह हिल गई है। कांदिवली में अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कदम उठाया जाएगा। इस संबंध में अगले शुक्रवार को कार्रवाई पर अंतरिम रोक आदेश को हटाने के लिए सिविल कोर्ट में एक आवेदन दिया जाएगा। पीठ ने इस पर संज्ञान लेते हुए सुनवाई एक सप्ताह के लिए स्थगित कर दी है। हालांकि, उप-जिला कलेक्टरों को पिछले तीन वर्षों में कांदिवली में अतिक्रमण के खिलाफ की गई कार्रवाई पर एक रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया गया था।

जनता के साथ विश्वासघात
सार्वजनिक भूमि अंतत: लोगों की होती है। यदि सरकार उनकी रक्षा करने में अनिच्छुक है तो यह सरकार द्वारा लोगों के साथ विश्वासघात है। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी चेतावनी दी कि जिला कलेक्टर के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई और जांच का आदेश दिया जाएगा।

कोर्ट की फटकार
सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण कैसे होता है? सरकार ऐसे निर्माणों के लिए परमिट कैसे देती है? लोग यहां अवैध रूप से रहते हैं और घर भी बेच देते हैं। यह चौंकाने वाली बात है, इसके लिए कौन जिम्मेदार है?
कांदिवली में अवैध निर्माण कलेक्टर, उपविभागीय अधिकारियों की लापरवाही के कारण हुआ है। सरकारी अधिकारियों द्वारा इस तरह के लापरवाहीपूर्ण आचरण को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
अवैध निर्माण दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं। उनके खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्या सरकार सो रही है? सार्वजनिक भूमि की सुरक्षा करना कलेक्टर का कर्तव्य है, लेकिन शिंदे की सरकार पूरी तरह से फेल हो गई है।

कोरोना योद्धाओं की कद्र नहीं!
क्या आपकी संवेदना मर चुकी है?
हाई कोर्ट ने घाती सरकार को फटकारा
सामना संवाददाता / मुंबई
कोरोना महामारी के दौरान पुणे के ससून अस्पताल में ड्यूटी के दौरान मरने वाली नर्स के पति द्वारा दायर मुआवजे के दावे को खारिज करने पर हाई कोर्ट ने बुधवार को घाती शिंदे सरकार को जमकर फटकार लगाई। क्या आप कोरोना योद्धाओं की कदर नहीं करते? आप इतने असंवेदनशील वैâसे हैं? क्या आपकी संवेदना मर चुकी है? कोर्ट ने शिंदे सरकार पर ऐसे सवालों के साथ जमकर फटकार लगाई है।
ससून अस्पताल की सहायक नर्स अनीता पवार की अप्रैल २०२० में कोरोना के कारण मृत्यु हो गई। वह कोरोना मरीजों का इलाज करने वाले कोरोना योद्धाओं की टीम में थीं। उनके पति सुधाकर ने ५० लाख के मुआवजे के लिए दावा दायर किया। लेकिन सरकार ने दावा खारिज कर दिया, जिसके बाद सुधाकर ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उनकी याचिका पर न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी और न्यायमूर्ति फिरदोश पुनीवाला की पीठ के समक्ष सुनवाई हुई। कोर्ट ने सुधाकर को नवंबर में मुआवजे के दावे पर फैसला लेने का निर्देश दिया था, तब भी शिंदे सरकार ने उनके दावे को खारिज कर दिया था। बुधवार को सरकारी वकीलों ने इस बारे में बताते हुए केंद्र सरकार की योजना की ओर इशारा किया। राज्य सरकार ने दलील दी कि सुधाकर पवार ने केंद्र की योजना से मुआवजा मांगा है। कोर्ट इस पर क्रोधित हो गया और शिंदे सरकार के असंवेदनशील आचरण पर सवाल उठाते हुए दो सप्ताह के भीतर हलफनामा दायर करने का आदेश दिया।

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