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हाईकोर्ट का झटका : पुनर्वास सचिव को भेजा जेल …पूरी तरह बेइज्जत हुई गद्दार सरकार

•  मंत्रालय में मचा हड़कंप
•  क्षमा के लिए सरकार ने जोड़े न्यायदेवता के समक्ष हाथ
सामना संवाददाता / मुंबई
मुंबई हाईकोर्ट ने गुरुवार को राज्य में घाती सरकार की इज्जत की धज्जियां उड़ा दीं। भूमि अधिग्रहण मामले में कोर्ट के आदेश को बार-बार दरकिनार करनेवाले राहत व पुनर्वास विभाग के सचिव समेत पांच लोगों को कोर्ट ने ऐतिहासिक झटका दिया है। गद्दार सरकार की मनमानी कार्यशैली की कड़ी आलोचना करते हुए पांच लोगों को एक-एक माह की सजा सुनाई। इससे पूरा मंत्रालय हिल गया। सरकार की इज्जत बचाने के लिए न्याय के देवता के आगे दया याचना करते हुए माफी मांगी गई। माफी मांगते हैं हमें क्षमा करें सजा न दें, ऐसी याचना करते हुए सरकारी पक्ष ने हाथ जोड़ लिए, जिस पर कोर्ट ने सजा को एक हफ्ते के लिए स्थगित तो कर दिया, लेकिन सजा रद्द करने से इनकार कर दिया।
पुणे जिले के शिरूर तालुका में किसानों की भूमि अधिग्रहण के मामले में कोर्ट ने समय-समय पर आदेश दिए थे। उन आदेशों के बाद भी सरकारी अधिकारी चुप्पी साधे रहे। न्यायालय के आदेशों का पालन करने के बजाय उन्हें दरकिनार करते रहे। यह दावा करते हुए कि अधिकारियों की यह मनमानी अदालत की बड़ी अवमानना है, ऐसा दावा करते हुए अजय नारे, धनंजय ससे, गुलाब मुले समेत १५ से २० किसानों ने वरिष्ठ वकील नितिन देशपांडे और एड. सचिन देवकर के मार्फत हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर की। उन सभी याचिकाओं पर गुरुवार को न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी और न्यायमूर्ति जितेंद्र जैन की पीठ के समक्ष सुनवाई हुई। खंडपीठ ने दो दिन पहले संबंधित अधिकारियों को कोर्ट में पेश होने का सख्त आदेश जारी किया था।
इसके बाद भी अधिकारियों ने कोर्ट की अनदेखी की। गुरुवार को जब प्रशासन की यह सारी लापरवाही और मनमानी सामने आई तो खंडपीठ बुरी तरह झल्ला गई। साथ ही संबंधित अधिकारियों को लापरवाही बरतने व मनमानी के लिए एक महीने के कारावास की सजा सुनाई गई। उन्होंने उन अधिकारियों को तत्काल न्यायालय परिसर स्थित थाने में आत्मसमर्पण करने का मौखिक आदेश भी दिया। इतिहास में यह पहली बार है कि कोर्ट ने सरकारी अधिकारियों के खिलाफ इतना सख्त रुख अपनाया है। इसलिए सचमुच सरकार कोर्ट के सामने भौंचक्की हो गई। सरकार की ओर से एड. प्रियभूषण काकड़े और तत्कालीन वरिष्ठ वकील मिलिंद साठे ने कोर्ट से सजा को रद्द करने की पुरजोर गुहार लगाई। इतना ही नहीं उन्होंने कोर्ट के सामने हाथ भी जोड़ लिए। इस पर कोर्ट ने सरकारी पक्ष को विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया और सजा एक हफ्ते के लिए स्थगित कर दी। लेकिन लापरवाह सरकारी अधिकारियों को दी गई सजा को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया गया।

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