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हाई स्पीड का ‘डेथ ट्रैप’? …. भैंसों से टकराई ‘वंदे भारत’ एक्सप्रेस

• बिना तैयारियों के ही दौड़ रही थी ट्रेन
• रेलवे की दशकों से लापरवाही जारी है
• ट्रैक पर आनेवाले जानवरों से तेज गति ट्रेनों को होता है सबसे ज्यादा खतरा
सुजीत गुप्ता / मुंबई
बड़े ही धूमधाम से गत ३० सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गांधीनगर-मुंबई सेंट्रल के बीच चलनेवाली ‘वंदे भारत’ ट्रेन को हरी झंडी दिखाई थी। इस सेमी स्पीड ट्रेन के परिचालन के शुरू होने को एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर दिखाया गया था। पर कल यह ट्रेन भैंसों के झुंड से टकरा गई। इस हादसे ने रेल यात्रियों की सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। अब जानकारों का मानना है कि अगर रेलवे हाई स्पीड पर चलनेवाली ट्रेनों को ट्रैक पर दोनों साइड में बिना सुरक्षा दीवार के चलाएगी तो यात्रियों के लिए ‘डेथ ट्रैप’ जैसा है। क्योंकि यह ट्रेन यदि अपनी फुल स्पीड में चल रही होती तो डिरेल होने के साथ ही कई यात्रियों की जान भी जा सकती थी।
गौरतलब है कि एक साल में ७५ ‘वंदे भारत’ ट्रेन देश में चलाने का ड्रीम प्रोजेक्ट मोदी का है। हालांकि मुंबई-अमदाबाद रूट पर ‘वंदे भारत’ ट्रेन को चलाने के लिए जितनी जल्दबाजी रेलवे ने दिखाई, उतनी इस ट्रेन को चलाने से पहले यात्रियों की सुरक्षा पर दिखाती तो शायद यह ट्रेन हादसे का शिकार नहीं होती। जी हां, मुंबई-अमदाबाद के बीच ‘वंदे भारत’ ट्रेन हादसे का शिकार हो गई। इस ट्रेन से भैंसों के टकरा जाने के कारण इस ट्रेन का अगला हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया। ये हादसा बटवा और मणिनगर रेल स्टेशन के बीच हुआ। भले ही इस हादसे में जान-माल का कोई नुकसान नहीं हुआ लेकिन इस हादसे ने एक बार फिर रेलवे को अपनी भूल में सुधार करने के संकेत जरूर दे दिए हैं क्योंकि हाई स्पीड ट्रेन चलाने से पहले पैंâसिंग, सुरक्षा दीवार, ब्रिज आदि मानक जो तय होते हैं, उसके प्रति रेलवे ने बड़ी लापरवाही बरतते हुए इस हाई स्पीड ट्रेन को चलाने की जल्दबाजी करते हुए हजारों यात्रियों की जान खतरे में डाल दी है।
‘मिशन रफ्तार’ परियोजना के अंतर्गत रेलवे, ट्रेनों की स्पीड कम-से-कम २५ किमी प्रति घंटा बढ़ाने पर काम कर रही है। लेकिन रेलवे के आगे कई चुनौतियां भी हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि जानवरों ने ट्रेन की स्पीड पर ब्रेक लगाया हो। इससे पहले भी कई हादसों में मवेशियों की जानें गई हैं। ७ मार्च, २०१७ को विरार स्टेशन के नारंगी फाटा के पास ९ भैंसे जयपुर-बांद्रा मेल एक्सप्रेस से कटकर मर गई थीं। इस तरह की घटना इस रूट पर हमेशा होती रहती है लेकिन रेलवे इसे इतनी गंभीरता से नहीं ले रही जो जानवर और इंसान दोनों की जान के लिए खतरा है। एक आरटीआई से प्राप्त जानकारी के मुताबिक साल २०२१-२२ में २६,१४२ जानवर ट्रेनों से कटकर मरे, जबकि इस दौरान १०,९१९ लोग पटरी पर कटकर मरे थे। इस तरह के हादसों में जानवरों की जानें तो जाती ही हैं, साथ ही ट्रेनों का परिचालन रुकने पर रेलवे को आर्थिक नुकसान भी होता है। आरटीआई से प्राप्त एक और जानकारी के मुताबिक यदि कोई डीजल पैसेंजर ट्रेन किसी कारण एक मिनट के लिए रुकती है तो २०,४०१ रुपए का नुकसान होता है, वहीं इलेक्ट्रिक ट्रेन के मामले में ये नुकसान २०,४५९ रुपए प्रति मिनट है।
जब भी कोई हादसा होता है तो अपनी जिम्मेदारियों से बचते हुए रेलवे हमेशा किसी और को दोषी ठहराने लगती है। ऐसा जानवरों के ट्रेन से टकराने के मामलों में भी होता रहा है। जिस रूट पर ‘वंदे भारत’ का हादसा हुआ है, उस रूट पर गाय-भैंसों के कई तबेले लाइन से हैं। कई बार जानवर चरते हुए ट्रैक पर आ जाते हैं और ट्रेन हादसे में अपनी जान गवां बैठते हैं। अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए रेलवे भी तबेला मालिकों पर मामला दर्ज कर कानूनी कार्रवाई करने के साथ जुर्माना भी वसूलती है। एक तो भैंस के ट्रेन से कटने और दूसरे जुर्माना लगने के डर से कोई भी तबेला मालिक अपनी भैंसों के रेल हादसे में मरने के बाद क्लेम करने नहीं आता है। ऐसी जानकारी पालघर के तबेला मालिक राजेश दीक्षित ने ‘दोपहर का सामना’ को दी।

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