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साहित्य-संस्कृति के रंग में रंगी है होली!

प्रो. डॉ. दयानंद तिवारी। होली रंगों का त्योहार है, हंसी-खुशी का त्योहार है, लेकिन वर्तमान समय में होली के भी अनेक रूप देखने को मिलते हैं। प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, भांग-ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक संगीत की जगह फिल्मी गानों का प्रचलन जैसे इसके कुछ आधुनिक रूप निखर कर सामने आए हैं। लेकिन इससे होली पर गाए-बजाए जानेवाले ढोल, मंजीरों, फाग, धमार, चैती और ठुमरी की शान में कमी नहीं आई। अनेक लोग ऐसे हैं जो पारंपरिक संगीत की समझ रखते हैं और पर्यावरण के प्रति सचेत हैं। इस प्रकार के लोग और संस्थाएं चंदन, गुलाब जल, टेसू के फूलों से बने हुए रंग तथा प्राकृतिक रंगों से होली खेलने की परंपरा को बनाए हुए हैं, साथ ही इसके विकास में महत्वपूर्ण योगदान भी दे रहे हैं। रासायनिक रंगों के कुप्रभावों की जानकारी होने के बाद बहुत से लोग स्वयं ही प्राकृतिक रंगों की ओर लौट रहे हैं। होली की लोकप्रियता का विकसित होता हुआ होली का अंतर्राष्ट्रीय रूप भी आकार लेने लगा है। आज होली वैश्विक स्तर खेली जाने लगी है या यूं कहें कि होली का भी वैश्वीकरण और भूमंडलीकरण हो गया है।

वैसे तो प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में होली के अनेक रूपों का विस्तृत वर्णन है। श्रीमद्भागवत महापुराण में रसों के समूह रास का वर्णन है। अन्य रचनाओं में ‘रंग’ नामक उत्सव का वर्णन है, जिनमें हर्ष की प्रियदर्शिका व रत्नावली तथा कालिदास की कुमारसंभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम् शामिल हैं। कालिदास रचित ऋतुसंहार में पूरा एक सर्ग ही ‘वसंतोत्सव’ को अर्पित है। भारवि, माघ और अन्य कई संस्कृत कवियों ने वसंत की खूब चर्चा की है। भट्ट वंश के शिरोमणि कवि चंद बरदाई द्वारा रचित हिंदी के पहले महाकाव्य पृथ्वीराज रासो में होली का वर्णन है। भक्तिकाल और रीतिकाल के हिंदी साहित्य में होली और फाल्गुन माह का विशिष्ट महत्व रहा है। आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर जायसी, मीराबाई, कबीर और रीतिकालीन बिहारी, केशव, घनानंद आदि अनेक कवियों को यह विषय प्रिय रहा है। महाकवि सूरदास ने अपने काव्य में वसंत एवं होली पर ७८ पद लिखे हैं। पद्माकर ने भी होली विषयक प्रचुर रचनाएं की हैं। इस विषय के माध्यम से कवियों ने जहां एक ओर नितांत लौकिक नायक-नायिका के बीच खेली गई अनुराग और प्रीति की होली का वर्णन किया है, वहीं राधा-कृष्ण के बीच खेली गई प्रेम और छेड़छाड़ से भरी होली के माध्यम से सगुण साकार भक्तिमय प्रेम और निर्गुण निराकार भक्तिमय प्रेम का निष्पादन कर डाला है। सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो और बहादुर शाह जफर जैसे मुस्लिम संप्रदाय का पालन करनेवाले कवियों ने भी होली पर सुंदर रचनाएं लिखी हैं, जो आज भी जन सामान्य में लोकप्रिय हैं। आधुनिक हिंदी कहानियों प्रेमचंद की ‘राजा हरदोल’, प्रभु जोशी की ‘अलग-अलग तीलियां’, लंदन में रह रहे भारतीय मूल के सुप्रसिद्ध रचनाकार तेजेंद्र शर्मा की ‘एक बार फिर होली’, ओम प्रकाश अवस्थी की ‘होली मंगलमय हो’ तथा स्वदेश राणा की ‘होली में होली’ के अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं। भारतीय फिल्मों में भी होली के दृश्यों और गीतों को सुंदरता के साथ चित्रित किया गया है।
भारत में होली का यह उत्सव अलग-अलग प्रदेशों में भिन्नता के साथ मनाया जाता है। हमारे साहित्यकारों ने होली का वर्णन अपनी लेखनी के माध्यम से किया है वह रोचक, रोमांचकारी, मनोरंजक है। जैसे पद्माकर ने होली पर लिखा है।
फाग के भीर अभीरन में गहि गोविन्दै लै गई भीतर गोरी।
भाई करी मन की ‘पद्माकर’ ऊपर नाई अबीर की झोरी।
छीन पिताम्बर कम्मर ते सु बिदा दई मीड़ कपालन रोरी।
नैन नचाइ, कही मुसकाइ लला फिरी अइयो खेलन होरी।
चाहे सगुन साकार भक्तिमय प्रेम हो या निर्गुण निराकार भक्तिमय प्रेम या फिर नितांत लौकिक नायक-नायिका के बीच का प्रेम हो, फाल्गुन माह का फाग भरा रस सबको छूकर गुजरा है। होली के रंगों के साथ-साथ प्रेम के रंग में रंग जाने की चाह ईश्वर को भी है, तो भक्त को भी है, प्रेमी को भी है, तो प्रेमिका को भी। मीरा बाई ने इस पद में कहा है-
रंग भरी राग भरी रागसूं भरी री।
होली खेल्यां स्याम संग रंग सूं भरी, री।।
उड़त गुलाल लाल बादला रो रंग लाल।
पिचकां उड़ावां रंग रंग री झरी, री।।
चोवा चंदण अरगजा म्हा, केसर णो गागर भरी री।
मीरा दासी गिरधर नागर, चेरी चरण धरी री।।
इस पद में मीरा ने होली के पर्व पर अपने प्रियतम कृष्ण को अनुराग भरे रंगों की पिचकारियों से रंग दिया है। मीरा अपनी सखि को संबोधित करते हुए कहती हैं कि हे सखि मैंने अपने प्रियतम कृष्ण के साथ रंग से भरी, प्रेम के रंगों से सराबोर होली खेली। होली पर इतना गुलाल उड़ा कि जिसके कारण बादलों का रंग भी लाल हो गया। रंगों से भरी पिचकारियों से रंग-रंग की धाराएं बह चलीं। मीरा कहती हैं कि अपने प्रिय से होली खेलने के लिए मैंने मटकी में चोवा, चंदन, अरगजा, केसर आदि भरकर रखा हुआ है। मीरा कहती हैं कि मैं तो उन्हीं गिरधर नागर की दासी हूं और उन्हीं के चरणों में मेरा सर्वस्व समर्पित है। इस पद में मीरा ने होली का बहुत सजीव वर्णन किया है।
महाकवि सूरदास ने वसंत एवं होली पर ७८ पद लिखे हैं। सूरदास जैसे नेत्रहीन कवि भी फाल्गुनी रंग और गंध की मादक धारों से बच न सके और उनके कृष्ण और राधा बहुत मधुर छेड़खानी भरी होली खेलते हैं।
हरि संग खेलति हैं सब फाग।
इहिं मिस करति प्रगट गोपी: उर अंतर को अनुराग।।
सारी पहिरी सुरंग, कसि कंचुकी, काजर दे दे नैन।
बनि बनि निकसी निकसी भई ठाढी, सुनि माधो के बैन।।
डफ, बांसुरी, रुंज अरु महुआरि, बाजत ताल मृदंग।
अति आनन्द मनोहर बानि गावत उठति तरंग।।
एक कोध गोविन्द ग्वाल सब, एक कोध ब्रज नारि।
छांडि सकुच सब देतिं परस्पर, अपनी भाई गारि।।
मिली दस पांच अली चली कृष्नहिं, गहि लावतिं अचकाई।
भरि अरगजा अबीर कनक घट, देतिं सीस तैं नार्इं।।
छिरकतिं सखि कुमकुम केसरि, भुरकतिं बंदन धूरि।
सोभित हैं तनु सांझ समै घन, आये हैं मनु पूरि।।
दसहूं दिसा भयो परिपूरन, सूर सुरंग प्रमोद।
सुर बिमान कौतुहल भूले, निरखत स्याम बिनोद।
सूर के कान्हा की होली देख तो देवतागण तक अपना कौतुहल न रोक सके और आकाश से निरख रहे हैं कि आज कृष्ण के साथ ग्वाल-बाल और सखियां फाग खेल रहे हैं। फाग के रंगों के बहाने ही गोपियां मानों अपने हृदय का अनुराग प्रकट कर रही हैं, मानो रंग-रंग नहीं उनका अनुराग ही रंग बन गया है। सभी गोपियां सुंदर साड़ी पहनकर, चित्ताकर्षक चोली पहनकर तथा अपनी आंखों में काजल लगाकर कृष्ण की पुकार सुन बन-ठनकर अपने घरों से निकल पड़ीं और होली खेलने के लिए आ खड़ी हुई हैं। रसखान जैसे रस की खान कहलाने वाले कवि ने तो फाग लीला के अंर्तगत अनेकों सवैय्ये रच डाले हैं।
फागुन लाग्यो जब तें तब तें ब्रजमण्डल में धूम मच्यौ है।
नारि नवेली बचैं नहिं एक बिसेख यहै सबै प्रेम अच्यौ है।।
सांझ सकारे वहि रसखानि सुरंग गुलाल ले खेल रच्यौ है।
कौ सजनी निलजी न भई अब कौन भटु बिहिं मान बच्यौ है।।
एक गोपी अपनी सखि से फाल्गुन मास के जादू का वर्णन करते हुए कहती है कि जबसे फाल्गुन मास लगा है, तभी से ब्रजमंडल में धूम मची हुई है। कोई भी स्त्री, नवेली वधु नहीं बची है, जिसने प्रेम का विशेष प्रकार का रस न चखा हो। सुबह-शाम आनंद मगन होकर श्री कृष्ण रंग और गुलाल लेकर फाग खेलते रहते हैं। हे सखि, इस माह में कौन-सी सजनी है, जिसने अपनी लज्जा और संकोच तथा मान नहीं त्यागा हो!
खेलत फाग लख्यौ पिय प्यारी को ता मुख की उपमा किहीं दीजै।
देखत ही बनि आवै भलै रसखान कहा है जौ बार न कीजै।।
ज्यों ज्यों छबीली कहै पिचकारी लै एक लई यह दूसरी लीजै।
त्यों त्यों छबीलो छवैâ छबि छाक सों हेरै हंसे न टरे खरो भीजै।।
एक गोपी अपनी सखि से फागलीला का वर्णन करती हुई कहती है कि ऐ सखि, मैंने कृष्ण और उनकी प्रिया राधा को फाग खेलते हुए देखा। उस समय की जो शोभा थी उसे किसी की भी उपमा नहीं दी जा सकती। वह शोभा तो देखते बनती थी कि उस पर कोई ऐसी वस्तु भी नहीं, जिसे न्यौछावर किया जा सके। ज्यों-ज्यों राधा एक के बाद एक रंग भरी पिचकारी उन पर डालती थीं, त्यों-त्यों वे उनके रूप-रस में सराबोर होकर मस्त हो रहे थे और हंस-हंस कर वहां से भागे बिना खड़े-खड़े भीग रहे थे।
बिहारी तो संयोग और वियोग निरुपण दोनों में सिद्धहस्त कवि हैं, संयोग हो या वियोग फागुन मास का विशेष महत्व है। प्रिय हैं तो होली मादक है और प्रिय नहीं हैं तो होली जैसा त्योहार भी रंगहीन प्रतीत होता है। बसंत ऋतु भी अच्छी नहीं लगती।
बन बाटनु पिक बटपरा, तकि बिरहिनु मत मैन।
कुहौ कुहौ कहि कहि उठे, करि करि राते नैन।।
हिय और सी हवे गई डरी अवधि के नाम।
दूजे करि डारी खरी, बौरी बौरे आम।।
बिहारी ने फागुन को साधन के रूप में लेकर संयोग निरुपण भी किया है। फागुन महीना आ जाने पर जब नायक, नायिका के साथ होली खेलता है, तो नायिका भी नायक के मुख पर गुलाल मल देती है या फिर पिचकारी से उसके शरीर को रंग में डुबो देती है।
जज्यौं उझकि झांपति बदनु, झुकति विहंसि सतराई।
तत्यौं गुलाब मुठी झुठि झझकावत प्यौ जाई।।
पीठि दियैं ही नैंक मुरि, कर घूंघट पटु डारि।
भरि गुलाल की मुठि सौं गई मुठि सी मारि।।
इस प्रकार हमारे प्राचीन कवियों ने फागुन मास और होली के रंग भरे त्योहार को अपने शब्दों में बड़ी सजीवता से प्रस्तुत किया है। होली का महत्व जो तब था, आज भी वही है। फागुन मास में बौराये आमों की तुर्श गंध और फूलते पलाश के पेड़ों के साथ तन-मन आज भी बौरा जाता है। आज भी होली रूप, रस, गंध का त्योहार है। होली उत्साह, उमंग और प्रेम पगी छेड़छाड़ लेकर आती है। होली सारे अलगाव और कटुता और अपनी रंग भरी धाराओं से धो जाती है। इस रंगमय त्योहार की महत्ता अक्षुण्ण है।
पद्माकर ने भी होली विषयक प्रचुर रचनाएं की हैं। इस विषय के माध्यम से कवियों ने जहां एक ओर नितांत लौकिक नायक-नायिका के बीच खेली गई अनुराग और प्रीति की होली का वर्णन किया है, वहीं राधा-कृष्ण के बीच खेली गई प्रेम और छेड़छाड़ से भरी होली के माध्यम से सगुण साकार भक्तिमय प्रेम और निर्गुण निराकार भक्तिमय प्रेम का निष्पादन कर डाला है।
संस्कृत साहित्य में बसंत ऋतु और बसंतोत्सव अनेक कवियों के विषय रहे हैं। महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘ऋतुसंहार’ में पूरा एक सर्ग ही ‘बसंतोत्सव’ को समर्पित है। कालिदास के ‘कुमारसंभव’ और ‘मालविकाग्निमित्र’ में ‘रंग’ नाम के उत्सव का वर्णन है। भारवि व माघ तथा अन्य संस्कृत के कवियों ने बसंत की बहुत ही अधिक चर्चा की है। हिंदी व संस्कृत साहित्य के साथ-साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत, लोक गीत, और फिल्मी संगीत की परंपराओं में भी होली का विशेष महत्व रहा है।

यह मिट्टी की चतुराई है,
रूप अलग औ’ रंग अलग,
भाव, विचार, तरंग अलग हैं,
ढाल अलग है ढंग अलग,
आजादी है जिसको चाहो आज उसे वर लो।
होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर को!
निकट हुए तो बनो निकटतर
और निकटतम भी जाओ,
रूढ़ि-रीति के और नीति के
शासन से मत घबराओ,
जो हो गया बिराना उसको फिर अपना कर लो।
होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!
होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो,
होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो,
भूल शूल से भरे वर्ष के वैर-विरोधों को,
होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!
– हरिवंशराय बच्चन

फागुनी शाम
अंगूरी उजास
बतास में जंगली गंध का डूबना
ऐंठती पीर में
दूर, बराह-से
जंगलों के सुनसान का कूंथना।
बेघर बेपरवाह
दो राहियों का
नत शीश
न देखना, न पूछनाष
शाल की पंक्तियों वाली
निचाट-सी राह में
घूमना घूमना घूमना।
– नामवर सिंह

जो कुछ होनी थी, सब होली!
धूल उड़ी या रंग उड़ा है,
हाथ रही अब कोरी झोली।
आंखों में सरसों फूली है,
सजी टेंसुओं की है टोली।
पीली पड़ी अपत, भारत-भू,
फिर भी नहीं तनिक तू डोली!
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
केशर की, कलि की पिचकारी:
पात-पात की गात संवारी।
राग-पराग-कपोल किए हैं,
लाल-गुलाल अमोल लिए हैं
तरू-तरू के तन खोल दिए हैं,
आरती जोत-उदोत उतारी-
गंध-पवन की धूप धवारी।
गाए खग-कुल-कंठ गीत शत,
संग मृदंग तरंग-तीर-हत
भजन-मनोरंजन-रत अविरत,
राग-राग को फलित किया री-
– मैथिलीशरण गुप्त

(लेखक श्री जेजेटी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर व सुप्रसिद्ध शिक्षाविद् और साहित्यकार हैं।)

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