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होली तेरे कितने नाम!

अमिताभ श्रीवास्तव। होली है। हिंदुस्थान का एकमात्र ऐसा पर्व जिसे जन समूह एकमेव स्वर में बोलकर या चिल्ला कर, जोश और उत्साह से, रंग उड़ा कर मनाता है कि होली है। कितना अद्भुत है ये कि कोई दूसरा पर्व वो चाहे दिवाली हो या दशहरा हो ऐसे उत्साह से आसमान गुंजायमान स्वर में नहीं कहते कि दिवाली है या दशहरा है। कहते हैं तो सिर्फ होली पर ही कि होली है। बुरा न मानो होली है। होली इस हिंदुस्थानी मिट्टी की संस्कृति है। प्रेम का त्योहार है। कण-कण में होली का पवित्र और प्रेम संस्कार से सराबोर रंग समाया हुआ है। हिंदुस्थान इतना बड़ा देश है और इतने राज्य हैं जहां होली खेली जाती है, मनाई जाती है। रूप रंग एक ही है मगर राज्यों के हिसाब से इसके नाम हर जगह भिन्न हैं। यही तो विचित्रता है हमारे देश की, हमारे पर्वों की।
पुरातन पर्व है होली। एक अध्ययन के अनुसार ५०० से २०० ईसा पूर्व इसे होलाका कहा जाता था। होली तो बहुत बाद में हुआ। तब बसंतागमन के इस पर्व पर यज्ञ का विधान था, जिसे समस्त संकटों को नष्ट करनेवाला माना जाता था। प्रश्न है कि फिर रंगों के साथ खेलना कब शुरू हुआ? दिलचस्प है कि होली खेलने का वर्णन कलयुग से पहले द्वापर युग में भी मिलता है, जो हमारे देश की सांस्कृतिक विरासत में घुला-मिला है। श्रीकृष्ण हमारे ऐसे अवतारी पुरुष हैं, जिन्हें हम इस पर्व का ब्रांड एंबेसेडर भी कह सकते हैं। ब्रज की होली और बरसाने की लट्ठमार होली पूरी दुनिया में विख्यात है। यूं तो होली हिंदुस्थान के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरह से खेली जाती है, जैसे कुमाऊं में इसे गीत बैठकी का नाम दिया गया है। हरियाणा में धुलंडी, बंगाल की दोल जात्रा, महाराष्ट्र में रंग पंचमी, गोवा में शिमगो, पंजाब में होला मोहल्ला जिसमें सिक्खों द्वारा शक्ति प्रदर्शन किया जाता है तो तमिलनाडु में कमन पोडिगई, मणिपुर के याओसांग, छत्तीसगढ़ में होरी, मध्य प्रदेश के मालवा अंचल में भगोरिया, पूर्वांचल और बिहार में फगुआ के रूप में यह पर्व हमारी धार्मिक और आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक तानों-बानों की एक पूरी कहानी है। होली की कहानी के इस खूबसूरत पन्ने पर इसके अलग-अलग नाम जानने से पूर्व राज्यों में मनाई जानेवाली इस मौज को समझें जो पूरे देश को एकता में जोड़ती है।
विश्व में प्रसिद्ध ब्रज होली के बारे में लगभग हर कोई जानता है क्योंकि जब भी होली खेलने की बात होती है तो सबसे पहले ब्रज की होली ही याद आती है। यहां पर पूरे नौ दिनों तक होली का आनंद लिया जाता है। और बरसाने की लट्ठमार होली का तो अलग ही मिजाज है। बरसाना मतलब राधा का गांव, जहां कृष्ण होली खेलने जाते थे। यहीं होती है लट्ठमार होली जो फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाई जाती है। इस दिन नंदगांव के ग्वाल बाल होली खेलने के लिए राधा रानी के गांव बरसाने जाते हैं और मंदिरों में पूजा-अर्चना के पश्चात बरसाना गांव में होली खेलते हैं। इसके बाद अगले दिन दसवीं तिथि को लट्ठमार होली नंदगांव में खेली जाती है। जबकि मथुरा व वृंदावन में फूलों की होली भी बेहद प्रसिद्ध है। वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में भक्त अपने भगवान के साथ होली खेलते हैं। मंदिर के कपाट खुलते ही श्रद्धालु अपने प्रभु पर रंग बरसाने के लिए टूट पड़ते हैं। इस होली के तुरंत बाद मथुरा में होली का जुलूस निकलता है, जो देखते ही बनता है। मथुरा और वृंदावन में होली खेलने का यह सिलसिला करीबन १५ दिनों तक चलता है।
अब आते हैं बंगाल की होली पर। यहां इस पर्व को डोल पूर्णिमा कहा जाता है। बंगाल में होली के दिन राधा और कृष्ण की प्रतिमाओं को डोली में बैठाकर उसकी झांकी पूरे शहर में निकालते हैं। वहीं ओडिशा में भी होली को डोल पूर्णिमा कहकर ही बुलाया जाता है और वहां पर होली के दिन भगवान जगन्नाथ जी को डोली में बिठाकर पूरे शहर में घुमाया जाता है।
मध्य प्रदेश में इंदौर की होली का महत्व और इसका आकर्षण खूब बढ़ गया है। इंदौर में होली का उत्सव पांच दिन का होता है और इस उत्सव का समापन रंगपंचमी के रूप में होता है। इंदौर में गेर निकलती है। गेर का अर्थ है रंगों से पुते हजारों लोग एक साथ समूह में गाते-बजाते और रंगों के पानी से भरे बड़े-बड़े ड्रम से लोगों पर फेंकते हुए ये हुजूम पूरे शहर से गुजरता है। नाचते हुए, झूमते हुए रंग-बिरंगे लोगों के इस हुजूम को देखते ही बनता है।
राजस्थान में भी होली के कई रंग देखने को मिलते हैं। यहां बाड़मेर में पत्थर मार होली खेली जाती है तो वहीं अजमेर की कोड़ा होली काफी प्रसिद्ध है। इसी तरह, सलंबर कस्बे में आदिवासी गेर खेलकर होली मनाते हैं। इस दिन यहां के युवक हाथ में एक बांस जिस पर घुंघरू और रूमाल बंधा होता है, जिसे गेली कहा जाता है लेकर नृत्य करते हैं। इस दिन युवतियां फाग के गीत गाती हैं।
कर्नाटक में होली के त्योहार को कामना हब्बा के रूप में मनाया जाता है। दरअसल, यहां ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव ने कामदेव को अपने तीसरे नेत्र से जला दिया था। इसलिए इस दिन लोग कूड़ा-करकट, फटे वस्त्र एक खुली जगह एकत्रित करके उन्हें अग्नि को समर्पित करते हैं। मणिपुर में होली का उत्सव छह दिन का होता है। दिलचस्प लगेगा यह जानना कि होली उत्सव की शुरुआत एक घास की कुटिया जलाने से होती है। इसके बाद शहरों में छोटे-छोटे बच्चे घर-घर जाकर कुछ पैसे या उपहार लेते हैं। वैसे मणिपुर में लोग होली के दौरान एक स्थानीय नृत्य तबल चांगबल का भी भरपूर आनंद उठाते हैं। लोक नृत्य और लोक गीतों का यही सिलसिला छह दिनों तक यूं ही चलता है।
मध्य प्रदेश में भीलों की होली को भुलाया नहीं जा सकता क्योंकि ये उत्सव उनके जीवन से जुड़ा है। उनके दांपत्य को संवारने के लिए जुड़ा है। इसे भगौरिया कहा जाता है। इस दिन युवक मांदल की थाप पर नृत्य करते हैं। नृत्य करते-करते जब युवक किसी युवती के मुंह पर गुलाल लगाता है और बदले में वह भी यदि गुलाल लगा देती है तो मान लिया जाता है कि दोनों विवाह के लिए सहमत हैं। यदि वह प्रत्युत्तर नहीं देती तो वह किसी और की तलाश में जुट जाता है। बड़ी विचित्र परंपरा और अद्भुत सौंदर्य में रचे-बसे इस पर्व भगौरिया को देखने देश-विदेश के लोग आते हैं। विशेषत: यह निमाड़ अंचल के आदिवासियों तथा भीलों के मध्य मनाया जाने वाला पर्व है। गांव-गांव में मेले लगते हैं। परंपरागत व्यंजनों की दुकानें लगती हैं। स्त्री-पुरुष सज-धजकर निकलते हैं। मांदल की थाप पर और लोक गीतों की धुन पर नाचते-झूमते इन भीलों को देखकर एक अलग ही दुनिया का अहसास होता है।
जैसे भगौरिया के दृश्य हैं वैसे ही विचित्र गुजरात में भील जाति के लोगों की होली भी है। यह भी बेहद अलग अंदाज में होती है। यहां होली को गोलगधेड़ों के नाम से मनाते हैं। इसमें किसी बांस या पेड़ पर नारियल और गुड़ बांध दिया जाता है उसके चारों ओर युवतियां घेरा बनाकर नाचती हैं। युवक को इस घेरे को तोड़कर गुड़, नारियल प्राप्त करना होता है। इस प्रक्रिया में युवतियां उस पर जबरदस्त प्रहार करती हैं। यदि वह इसमें कामयाब हो जाता है तो जिस युवती पर वह गुलाल लगाता है वह उससे विवाह करने के लिए बाध्य हो जाती है। उत्तर प्रदेश, बिहार और खासकर हरियाणा की होली में देवर-भाभी के अनूठे व प्रेम भरे रिश्तों के रंग देखने को मिलते हैं। यहां पर धुलंडी में भाभी द्वारा देवर को सताए जाने की प्रथा है। उत्तर प्रदेश में भाभी के साथ देवर होली खेलते हैं।
पंजाब की होली भी अपने आप में एक विशिष्ट महत्व रखती है। यहां शक्ति प्रदर्शन के रंग देखने को मिलते है। पंजाब में दौड़ते हुए घोड़ों पर सवार हथियार बंद सिख योद्धा देखने को मिलते है। पंजाब के होला मोहल्ला द्वारा यह त्यौहार १७०१ से कुछ इसी अंदाज में मनाया जाता रहा है। होला मोहल्ला दो से तीन दिन तक लगातार मनाया जाता है। आखरी दिन चरण गंगा नदी के किनारे इस त्योहार को मानाने के लिए कई सिख युवा आते हैं जो अपने युद्ध कौशल का परिचय देते हैं।
होली है ही उमंग से भरा हुआ त्योहार। जैसे इसके मनाने के अपने अलग-अलग तरीके हैं वैसे ही हर जगह इसके नाम भी अलग हैं। बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में होली को फगुआ, फाग और लट्ठमार होली कहते हैं। इसी तरह मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में होली वाले दिन को होलिका दहन कहते हैं इसके दूसरे दिन को धुलैंडी कहा जाता है। और पांचवें दिन को रंग पंचमी। महाराष्ट्र में होली को `फाल्गुन पूर्णिमा’ और `रंग पंचमी’ के नाम से जानते हैं। गोवा का मछुआरा समाज इसे शिमगो या शिमगा कहता है। गुजरात में गोविंदा होली कहते हैं। हरियाणा में होली को दुलंडी या धुलैंडी के नाम से जानते हैं। पंजाब में होली को `होला मोहल्ला’ कहते हैं। पश्चिम बंगाल और ओडिशा में होली को `बसंत उत्सव’ और `डोल पूर्णिमा’ के नाम से जाना जाता है। तमिलनाडु में होली को कमान पंडिगई, कामाविलास और कामा-दाहानाम कहते हैं। कर्नाटक में होली के पर्व को कामना हब्बा के रूप में मनाते हैं। आंध्र प्रदेश, तेलंगना में भी ऐसी ही होली होती है। मणिपुर में इसे योशांग या याओसांग कहते हैं। यहां धुलेंडीवाले दिन को पिचकारी कहा जाता है। असम इसे `फगवाह’ या `देओल’ कहते हैं। त्रिपुरा, नगालैंड, सिक्किम और मेघालय में भी होली की धूम रहती है।
(लेखक सम सामयिक विषयों के टिप्पणीकर्ता हैं। ३ दशकों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं व दूरदर्शन धारावाहिक तथा डाक्यूमेंट्री लेखन के साथ इनकी तमाम ऑडियो बुक्स भी रिलीज हो चुकी हैं।)

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