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फिर अपराध की श्रेणी में समलैंगिकता! … अदालत की भूमिका पर पानी फेरेगी मोदी सरकार

दुनियाभर में एलजीबीटी समुदाय अपने हक के लिए आंदोलन चला रहा है। कई देशों में उसे मान्यता भी मिल चुकी है, जबकि कई देशों में संघर्ष जारी है। हिंदुस्थान में भी समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट ने पुराने कानून पर हथौड़ा चलाते हुए उसे रद्द कर दिया था। इसके बाद सहमति से ऐसे संबंध अपराध नहीं रहे थे। पर अब मोदी सरकार यूटर्न लेते हुए उसे फिर से अपराध की श्रेणी में डालने जा रही है। ऐसे में कहा जा सकता है कि अदालत ने इस समाज के रुख को देखते हुए जो हक उसे देने की पहल की थी, मोदी सरकार अब उसके ऊपर पानी फेरने की कोशिश में जुट गई है।
हाल ही में एक संसदीय समिति ने तीन आपराधिक विधेयकों पर सरकार को कई सुझाव दिए हैं, जिसमें आईपीसी की धारा ३७७ को वापस लाना, जिसे २०१८ में सुप्रीम कोर्ट ने आंशिक रूप से रद्द कर दिया था और व्यभिचार प्रावधान को बरकरार रखना शामिल है। इस संबंध में समिति ने तीनों विधेयकों में कई चीजें जोड़ने की सिफारिश की है। धारा ४९७ के तहत व्यभिचार पर सुझाव जोड़ा गया है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने समाप्त कर दिया था।
पैनल के अनुसार, व्यभिचार पर प्रावधान इसलिए जोड़ा गया है, क्योंकि ‘विवाह संस्था पवित्र है’ जिसे ‘संरक्षित’ किया जाना चाहिए। पैनल ने पिछले शुक्रवार को भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस-२०२३) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए-२०२३) विधेयकों पर राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इसमें आईपीसी की धारा ३७७ को वापस लाने के लिए कुछ सिफारिशें की गई हैं। ६ सितंबर, २०१८ को सुप्रीम कोर्ट द्वारा धारा ३७७ को आंशिक रूप से रद्द करते हुए सहमति से वयस्कों के बीच समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटा दिया गया था। समिति से जुड़े एक सदस्य के अनुसार, ‘पैनल ने तीन विधेयकों में कई अन्य बदलावों की भी सिफारिश की है। इसके अलावा, छोटे अपराधों के लिए जेल की सजा के स्थान पर सामुदायिक सेवा की सिफारिश की गई है।’

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