मुख्यपृष्ठस्तंभपहाड़ी तीर्थस्थलों को पर्यटन स्थल बनाना कितना उचित!

पहाड़ी तीर्थस्थलों को पर्यटन स्थल बनाना कितना उचित!

रासबिहारी पांडेय

चारधाम सड़क परियोजना में सुरंग बनाते हुए पहाड़ धंसने से पंâसे ४१ मजदूरों को १७ दिन बाद निकाल लिया गया, लेकिन इस घटना ने एक बार पुन: साबित कर दिया कि हिमालय जैसे कच्चे पहाड़ में सतत निर्माण कार्य मानव जीवन के साथ खिलवाड़ है। चारधाम यात्रियों को कम-से-कम समय में यात्रा कराने के उद्देश्य से चार लेन की सड़क बनाने का काम बहुत जोखिम भरा है।

निर्माण के तहत ५३ परियोजनाएं चल रही हैं, जिनमें दुर्घटनाओं का सिलसिला लगातार जारी है। इस प्रक्रिया में उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं हुआ है, इसलिए न्यायालय को स्वत: इसका संज्ञान लेना चाहिए। ऐसी परियोजनाओं का उद्देश्य बड़े कॉरपोरेट ठेकेदारों और नेताओं की जेब भरना है।

१२,००० करोड़ रुपए की चारधाम राजमार्ग विकास परियोजना की आधारशिला २०१६ में देहरादून के परेड ग्राउंड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा रखी गई थी। दुर्घटना और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों को खत्म करने के लिए सड़क में कई लंबे पुल और सुरंगें शामिल हैं। भारतीय रेलवे और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि इस सर्विâट पर रेल और सड़क मार्गों को एकीकृत किया जाए।

२०२४ तक इसे पूरा करने का लक्ष्य था, किंतु अभी परियोजना आधी भी पूरी नहीं हुई है। पिछले महीने मैं बद्रीनाथ की यात्रा पर गया था। सड़क चौड़ा करने की प्रक्रिया में कहीं-कहीं पहाड़ ऐसे धंसे हैं कि पहले जहां से दो गाड़ियां एक साथ निकल रही थीं, अब केवल एक ही गाड़ी निकल पा रही है। ऐसे में इस परियोजना का पूरा होना असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर लग रहा है।

हिमालय को वैज्ञानिकों ने कच्चा पहाड़ माना है। हिमालय में पहाड़ों के धंसने की घटनाएं अक्सर होती रहती हैं। इंदिरा गांधी ने पचास वर्ष पूर्व गढ़वाल के कलेक्टर एम.सी. मिश्रा को इसकी जांच करने के लिए कहा था। तब १८ विशेषज्ञों की कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री क्षेत्र ऐतिहासिक सिस्मिक और लैंडस्लाइड जोन में हैं। यहां ऐसी कोई परियोजना शुरू नहीं होनी चाहिए, जिससे भौगोलिक स्थिति खराब हो। ऐसा करना दुर्घटना को स्वयं आमंत्रित करना होगा। आईआईटी कानपुर के वरिष्ठ प्रोपेâसर जी.डी. अग्रवाल ने कई सरकारी कमेटियों के सदस्यों के रूप में हिमालय के ग्लेशियर और नदियों के साथ हो रही छेड़खानी के विरोध में अनशन करते हुए अपने प्राण त्याग दिए।

पेड़ों की कटाई रोकने, पहाड़ों में सुरंग बनाने, टिहरी जैसे खतरनाक बांध विरोधी आंदोलन करते-करते सुंदरलाल बहुगुणा की जिंदगी भी खत्म हो गई! जोशीमठ में घरों के दरकने की तरह टिहरी में भी कुछ ऐसा हुआ तो बहुत बड़ी विपत्ति आ सकती है। इस बांध में इतना पानी है कि दिल्ली तक इसकी चपेट में आ सकती है। बीच में आनेवाले गांव तो पहले ही समाप्त हो जाएंगे। हिंदू समाज परम सहिष्णु है। अपने तीर्थस्थलों के प्रति उसका कोई विशेष आंदोलन नहीं दिखता। झारखंड सरकार ने गिरिडीह स्थित जैन तीर्थस्थल सम्मेद शिखर को धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में चिह्नित किया था।

जैन समाज ने तुरंत इसका विरोध करते हुए कहा कि पर्यटन क्षेत्र बनाने से इस स्थान की पवित्रता भंग हो जाएगी। लोग पर्यटन की दृष्टि से आएंगे तो मांस भक्षण और मदिरा पान जैसी अनैतिक गतिविधियां बढ़ेंगी और इससे अहिंसक जैन समाज की भावना आहत होगी। मैदानी तीर्थस्थलों में मनचाहा विकास किया जा सकता है, लेकिन पहाड़ों पर राजमार्ग बनाने की महत्वाकांक्षी परियोजना मनुष्य जीवन को खतरे में डालना है।

अन्य समाचार