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इन हालातों को कलाकार कैसे रोके!- रुशद राणा

छोटे पर्दे पर धूम मचानेवाले रुशद राणा इंडस्ट्री में अपने २५ वर्ष पूरे कर चुके हैं। आकर्षक व्यक्तित्व के धनी रुशद राणा ने ‘हिप हिप हुर्रे’, ‘कहता है दिल’, ‘ससुराल सिमर का’, ‘यह उन दिनों की बात है’ जैसे कई शोज में काम किया है, जिसे दर्शक आज भी नहीं भूले हैं। इस वक्त रुशद राणा शो ‘मेहंदी वाला घर’ में नजर आ रहे हैं। पेश है, रुशद राणा से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-
-शो ‘मेहंदी वाला घर’ करने की क्या वजह रही?
शो ‘मेहंदी वाला घर’ के ऑफर को मैं अपनी खुशकिस्मती समझता हूं। शो में मेरा किरदार सशक्त और रिलेवेंट है। एक पारिवारिक शो करने का अपना एक अलग मजा है। इस शो के सभी किरदारों का शो में अपना वजूद है। यह कहानी घर की है, जहां स्त्री और पुरुष सभी किरदार है।
-अपने २५ वर्षों के करियर से आप कितने संतुष्ट हैं?
मैं खुद को इसलिए संतुष्ट मानता हूं क्योंकि काफी उतार-चढ़ावों के बाद भी मैं यहां टिका रहा। मेरे बाद अपना अभिनय करियर शुरू करनेवाले कई कलाकार आज इंडस्ट्री से ओझल हो चुके हैं और कई काम न मिलने के कारण इंडस्ट्री से आउट हो गए। फिल्मी परिवार से न होने के बावजूद अपनी मेहनत और प्रतिभा के बलबूते आत्मसम्मान के साथ मैं फिल्म, टीवी के साथ-साथ अब ओटीटी पर काम करता चला गया। कोई फिल्मी ताल्लुक न होने के बावजूद इंडस्ट्री में टिके रहना आसान नहीं होता। लेकिन लोगों का साथ, स्नेह और प्यार पाकर मैं अभिभूत हूं। मुझे मौके मिले इसलिए तो मैं टिका रहा।
-फिल्में छोड़कर आप टीवी में कैसे आए, जबकि फिल्मों में जाने के बाद कलाकार फिल्मों के होकर रह जाते हैं?
मैंने भी फिल्में कीं लेकिन करियर में कुछ गलतियां हुईं, जिसका मुझे पछतावा है। मैं उस फिल्म का नाम नहीं लेना चाहता। जब उस फिल्म का मुझे ऑफर मिला तो फिल्म का बैनर, मेरा किरदार और पूरा सेटअप अच्छा-खासा था। फिल्म के प्रोडक्शन ने मेरे सामने शर्त रखी कि अगर मैं उनकी फिल्म करता हूं तो फिल्म की रिलीज तक मैं कोई टीवी शो नहीं कर सकता। अच्छी फिल्म के लालच में मैंने उनकी शर्त मान ली। अफसोस ये कि मैं इस फिल्म के शुरू होने का बस इंतजार ही करता रहा, लेकिन यह फिल्म ३-४ वर्ष बीतने के बाद भी शुरू नहीं हुई और मेरे करियर के ४ वर्ष बर्बाद हो गए। जीवन और घर दोनों चलाना था इसलिए मैं टीवी की ओर मुड़ गया। मुझे फिर जीरो से शुरुआत करनी पड़ी। वो मेरे लिए बड़ा मुश्किल दौर था। मेरी जानकारी में ऐसे कई लोग हैं जो टीवी इंडस्ट्री छोड़ने के बाद दोबारा कम बैक नहीं कर पाए। शुक्र है, मैं टीवी की दुनिया में आकर दोबारा खड़ा हो पाया। बस, इसलिए मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूं।
-टीवी में घूम-फिर कर उन्हीं कहानियों को रिपीट किया जाता है, एक सीनियर कलाकार होने के नाते क्या आप इस बात से सहमत हैं?
इस बात से मैं सहमत हूं। लेकिन ऐसा सिर्फ टीवी की दुनिया में ही नहीं, बल्कि फिल्मों में भी चल रहा है। प्राय: देखा गया है कि टीवी और फिल्मों की दुनिया फॉर्मूले पर टिकी हुई है। जब फिल्म ‘शोले’ सफल हुई तब कई मेकर्स उसी तर्ज पर कहानियों को दोहराने का प्रयास करने लगे। कुछ वर्ष पहले मैंने ‘भेजा फ्राय’ नामक एक स्मॉल बजट वाली फिल्म की। इस फिल्म ने करोड़ों का बिजनेस किया। इस फिल्म की सफलता के बाद मेकर्स मुझे फोन पर कहने लगे कि हम लोग ‘भेजा फ्राय’ जैसी फिल्म बना रहे हैं। लेकिन मैं उनकी यह पहली लाइन सुनकर विनम्रता से उनसे कह देता, नो सर!
-क्या अच्छे लेखकों की कमी महसूस नहीं होती?
अच्छे लेखकों की बिलकुल कमी है। इसका एक मुख्य कारण जो मुझे समझ में आता है वो यह कि इस पीढ़ी के जो लेखक हैं वो पढ़ना नहीं जानते। वक्त की कमी है उनके पास, ज्यादा मेहनत नहीं करना चाहते। पढ़ते नहीं इसलिए उनके पास कल्पना शक्ति का अभाव रहता है। इस पीढ़ी के लेखकों का माइंडसेट अलग है। जमाना भी कामचोरों का है, सभी लोग फटाफट पैसे बनाने में लगे हुए हैं। ऐसे में नई प्रतिभाएं कैसे और कहां से आएंगी? अगर साउथ में कुछ हिट हुआ तो उसका रीमेक यहां बनाया जाता है। इन हालात को कलाकार वैâसे रोके?

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