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पाकिस्तान में कब तक जुल्म सहेंगे अल्पसंख्यक!

योगेश कुमार सोनी
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की कहानी कोई नई नहीं है। कभी छोटे तो कभी बडे स्तर पर हर रोज घटनाएं होती रहती हैं। लेकिन इस बार वहां रह रहे ईसाइयों का अस्तित्व मिटाने के लिए बड़ी चोट मारी है। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में भीड़ ने २० चर्चों और ईसाइयों के ८६ घरों को जला दिया। एक मौलवी ने पांच मस्जिदों से लोगों को ईसाई घरों पर हमला करने के लिए उकसाने की घोषणा की थी और अब तक गिरफ्तार किए गए १४५ संदिग्धों में से एक है। पंजाब पुलिस की सरकार को सौंपी गई रिपोर्ट में कहा गया है। जिला प्रशासन ने पहले ही सात दिनों के लिए धारा १४४ लागू कर दी है। जरनवाला में सरकार द्वारा आयोजित कार्यक्रमों को छोड़कर सभी प्रकार की सभा पर रोक लगा दी है। आर्कबिशप सेबेस्टियन प्रâांसिस शॉ ने कहा कि ईसाइयों को मुआवजा मिल सकता है लेकिन इस भयानक घटना से उनमें पैदा हुए डर का क्या? उन्होंने कहा कि सरकार को अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा के लिए व्यावहारिक कदम उठाने होंगे। उन्होंने खुलासा किया कि कट्टरपंथी इस्लामवादियों ने जरनवाला के ईसाई सहायक आयुक्त शौकत मसीह के जीवन पर चार प्रहार किए लेकिन वह सौभाग्य से बच गए। ईसाइयों को डर है कि इस्लामवादी फिर से हमला कर सकते हैं। वर्तमान में जरनवाला में ईसाई क्षेत्रों में ३,५०० पुलिसकर्मी और १८० रेंजर्स कर्मी तैनात हैं। पाकिस्तान में ईशनिंदा एक संवेदनशील मुद्दा है, जहां इस्लाम या इस्लामी हस्तियों का अपमान करने वाले किसी भी व्यक्ति को मृत्युदंड का सामना करना पड़ सकता है। अक्सर एक आरोप दंगों का कारण बन सकता है और भीड़ को हिंसा, लिंचिंग और हत्याओं के लिए उकसा सकता है। सेंटर फॉर सोशल जस्टिस के अनुसार, इस साल १६ अगस्त तक लगभग १९८ लोगों पर ईशनिंदा का आरोप लगाया गया है, जिनमें से ८५ प्रतिशत मुस्लिम, ९ प्रतिशत अहमदी और ४.४ प्रतिशत ईसाई हैं। इसमें कहा गया है कि पंजाब प्रांत में पिछले ३६ वर्षों में ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग के ७५ प्रतिशत से अधिक मामले दर्ज किए गए। पाकिस्तान में ईसाइयों और हिंदुओं समेत अल्पसंख्यकों पर अक्सर ईशनिंदा के आरोप लगते रहे हैं और कुछ पर ईशनिंदा के तहत मुकदमा चला और सजा भी दी गई। वहां का कानून चाहे कितनी भी औपचारिकता कर ले लेकिन हालात न कभी सुधरे हैं और न ही कभी सुधरेंगे चूंकि इतिहास गवाह रहा है कि अल्पसंख्यकों पर अत्याचार मामले में किसी को कभी कड़ी सजा नही मिली जिससे उनके हौसले बुलंद होते रहे हैं। वहां जब लड़की को मासिक धर्म आता है तो अपरहणकर्ता सीधे कोर्ट में लड़की के साथ पेश होकर यह कहता है कि लड़की ने अपनी मर्जी से निकाह किया है। जैसा कि पाकिस्तान में शरिया कानून माना जाता है, जिसके अनुसार यदि लड़की को पहला मासिक धर्म आ जाए तो वह बालिग अर्थात शादी के योग्य मानी जाती है। जितने दिन लड़की गायब रहती है उतने समय में लड़की को इतना डरा दिया जाता है या ब्रेन वॉश कर दिया जाता है कि वह लाचार होकर किसी भी प्रकार का विरोध नही कर पाती। दोनों ही स्थिति में लड़की चाह कर भी विपरीत बयान नहीं दे पाती। पिछली कुछ ऐसी घटनाओं को लेकर एक बात यह भी सामने आ रही है कि अधिकतर अधेड़ उम्र के व्यक्ति ही ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। बीते दिनों भी पाकिस्तानी सांसद के भाई ने खुलेआम दिन-दहाड़े एक हिंदू परिवार की बच्ची उठा ली थी। बहरहाल, इस मामले को लेकर विश्व पटल पर चर्चा होनी चाहिए, जिससे पाकिस्तान में रह रहे अल्पसंख्यकों को राहत मिले।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक मामलों के जानकार हैं।)

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