" /> कवि के कितने धर्म निभाए…

कवि के कितने धर्म निभाए…

ऋतुओं का रथ हांको क्रमशः ओ! रसराज कहानेवाले
कवि के कितने धर्म निभाए युग पूंछेंगे आनेवाले
संस्कार की गद्दी पर गुमनाम अंधेरा बिखराते हो
जुगुनूं को दिनमान बताकर सुप्त उजाला दिखलाते हो
पथ के पाहन बन बैठे हो ओ! पथ को बतलानेवाले
कवि के कितने धर्म…
पाप-पुण्य फिर से गठरी में रखकर तोला जाएगा
घने बबूलों का जंगल क्या चंदन बोला जाएगा
शिलालेख पर सदा छपेंगे अमृत को बरसानेवाले
कवि के कितने धर्म…
घट में सागर की लहरों को भर पाना आसान कहां है
क्षणिक मात्र के यश वैभव का बोलो वह सम्मान कहां है
अद्भुत लेख लिखेंगे तुम पर तुमको ही समझानेवाले
कवि के कितने धर्म…
शब्द-शब्द से खेल-खेल कर ब्रह्मा का अपमान किया है
शिल्प साधना के योगी हैं यह तुमने अभिमान किया है
चाटुकारिता अय्याशी के बोलो (अब तक) बिगुल बजानेवाले
कवि के कितने धर्म…
हंसों की टोली में कुछ बगुलों के आज बिरादर निकले
आदर की पोथी में बांधे लाखों आज अनादर निकले
नाखूनों पर खून उन्हीं के जो थे जिस्म बचानेवाले
कवि के कितने धर्म…
सृष्टी का अभिशाप लगेगा उड़ जाएगा धूल के जैसा
अपवादों की मूर्ति बनेगा भटकेगा तू दर-दर ऐसा
कंधे भी अपयश मानेंगे मरघट तक ले जानेवाले
कवि के कितने धर्म…
महाप्रलय के महाविजेता ने सृष्टी खंडन कर डाला
कायरता के वस्त्र ओढ़कर पीकर मस्त हुए हो हाला
समयावधि से पहले ही तुम बोलो ओ! मर जानेवाले
कवि के कितने धर्म…
– ज्ञानेंद्र शुक्ल वत्सल, गीतकार