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कैसे बनेगी ५ ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था? … उद्योग-धंधों की वित्तीय सेहत है खराब!

• रेटिंग एजेंसी क्रिसिल दे रही है चेतावनी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिंदुस्थान की अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन बनाने का लक्ष्य रखा है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था कितनी अच्छी है, इसका अनुमान वहां के उद्योग-धंधों की हालत से लगाया जा सकता है। अगर उद्योग जगत की स्थिति अच्छी रहती है तो देश की अर्थव्यवस्था भी सुदृढ़ रहती है। पर अगर उद्योग-धंधे बीमार हो जाएंगे तो देश की अर्थव्यवस्था भी चरमरा जाएगी। हिंदुस्थान के उद्योग जगत की हालत भी इन दिनों अच्छी नहीं है। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने हिंदुस्थान के खस्ताहाल उद्योग जगत पर टिप्पणी की है। अब रेटिंग एजेंसी क्रिसिल का कहना है कि हिंदुस्थानी कॉर्पोरेट जगत की वित्तीय सेहत चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में नरम हुई है और दूसरी छमाही में इसमें और गिरावट आने की आशंका है।
अब क्रिसिल ने ऐसा क्यों कहा, यह सोचने की बात है। जो कंपनियां प्रâॉड करती हैं, बैंकों का पैसा हजम कर जाती हैं, सरकार उन्हें अभयदान देती रहती है। पिछले महीने ही एक बड़े उद्योगपति के कर्ज की बड़ी रकम को राइट ऑफ किया गया है। इस मामले ने खूब तूल पकड़ा और सोशल मीडिया पर लोगों ने मोदी सरकार की खूब क्लास ली। देखा जाए तो पिछले ९ वर्षों में कई हजार करोड़ रुपए सरकार ने राइट ऑफ कर दिए गए। ऐसे में जिन बैंकों का पैसा डूबा, उनकी वित्तीय अवस्था तो खस्ता होनी ही है। महाराष्ट्र में उद्योग-धंधों के लिए सबसे ज्यादा अनुकूल माहौल है। मगर महाराष्ट्र घाती केंद्र सरकार ने पिछले एक साल में करीब एक दर्जन उद्योगों को महाराष्ट्र से छीनकर दूसरे राज्यों में भेज दिया है। यह बताता है कि मोदी सरकार देश में उद्योग के विकास के प्रति कितनी गंभीर है। देश में महंगाई का प्रभाव आम आदमी और कॉर्पोरेट दोनों पर ही पड़ रहा है। उद्योग के लिए सबसे जरूरी चीज है र्इंधन, अब चाहे वह बिजली हो या पेट्रोलियम, दोनों ही काफी महंगे हो गए हैं। इस बारे में क्रिसिल के प्रबंध निदेशक गुरप्रीत छटवाल का कहना है कि मुद्रास्फीति की ऊंची दर, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और बारिश के असमान वितरण से हिंदुस्थानी कॉर्पोरेट जगत की वित्तीय सेहत के लिए चुनौती बरकरार है। बता दें कि देशभर की करीब ६,५०० कंपनियों की रेटिंग करने वाली क्रिसिल रेटिंग्स ने यह अनुमान कंपनियों के कर्ज अनुपात यानी उनकी रेटिंग में सुधार एवं गिरावट को ध्यान में रखते हुए लगाया है। गुरप्रीत छटवाल कहते हैं कि वित्त वर्ष २०२३-२४ की पहली छमाही में कंपनियों की वित्तीय सेहत का नरम होना अपेक्षा के अनुरूप ही है। सरकार के ढांचागत परियोजनाओं पर खर्च बढ़ाने से कॉर्पोरेट जगत को सकारात्मक कर्ज अनुपात हासिल करने में मदद मिल रही है। जाहिर है क्रिसिल की चेतावनी को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। मोदी सरकार इस समय चुनावी मोड में आ चुकी है। ऐसे में अर्थव्यवस्था की हालत और भी खस्ता होती जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

सरकार की लचर नीति
हैरानी की बात है कि सरकार बारबार बैंकों के डूबे पैसों को वसूलने की बात तो करती है, पर उसकी लचर नीति के कारण ऐसे लोगों के खिलाफ कड़क कार्रवाई नहीं होती। बस इसकी जगह सरकार हर महीने जीएसटी कलेक्शन के आंकड़े जारी करके अपनी पीठ थपथपाती रहती है। इसके अलावा सरकार की ओर से उद्योग-व्यवसाय के लिए जो सहूलियतें मिलनी चाहिए, उसमें भी बोलबचन ज्यादा है। ऊपर से सरकार टैक्स वसूलने के लिए नए-नए जुगत भिड़ाती रहती है।

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