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कैसे कम होगी हिंदुस्थान में शिशु मृत्यु दर? …हर मिनट होती है एक शिशु की मौत!

… सरकार की योजना साबित हो रही है नाकाम
सामना संवाददाता / मुंबई 
हिंदुस्थान में नवजात शिशुओं की उचित सुरक्षा न हो पाने के कारण हर साल हजारों बच्चे मौत के आगोश में चले जाते हैं। इस वजह से यहां नवजात शिशुओं की मौत की दर बहुत अधिक है। एक रिपोर्ट्स के अनुसार, हिंदुस्थान में हर साल २.५० करोड़ के करीब शिशु जन्म लेते हैं। वहीं हर मिनट में इन शिशुओं में से एक की मौत हो जाती है। इन मौतों के पीछे कई कारण हैं। शिशुओं की मृत्यु के पीछे मुख्य कारण समय से पहले जन्म लेना, जन्म के बाद संक्रमित होना और जन्मजात विकृतियां शामिल हैं। हालांकि, सरकार ने इसे रोकने कि दिशा में सार्थक प्रयास किए हैं, जिनकी बदौलत देश में शिशु मृत्यु दर में कमी आई है। सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयास अभी भी कई मोर्चों पर नाकाम ही साबित हो रहे हैं।
शिशु मृत्यु दर के कारण
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, साल १९५१ में जहां प्रति १,००० नवजात बच्चों में १४६ की मौत हो जाती थी। वहीं २०२२ में यह संख्या घटकर २८ तक आ गई है। ये आंकड़े उन बच्चों से जुड़े हैं जिनकी मौत जन्म के एक साल के अंदर हो जाती है। पिछले एक दशक में ग्रामीण क्षेत्रों की शिशु मृत्यु दर में ३५ प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में ३४ प्रतिशत की गिरावट आई है। इन मौतों के पीछे गरीबी, अशिक्षा, कम उम्र में शादी, १०० फीसदी संस्थागत प्रसव न होना, माता और बच्चे में उचित पोषण का अभाव, नियमिक टीकाकरण सहित कई कारणों को पाया गया है।
बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी 
देश में स्वास्थ्य संबंधी चीजों की कमी के कारण यह समस्या और बढ़ जाती है। सरकारों ने इस समस्या से निपटने के लिए बहुत-सी योजनाएं लागू की हैं। मगर बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी तथा जागरूकता की कमी के कारण शिशुओं की मृत्यु दर में पूर्णतया कमी नहीं आई है। उचित पोषण के अभाव में अब भी कई बच्चे दम तोड़ देते हैं। ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की कमी एवं प्रशिक्षित नर्सों व दाइयों की कमी के कारण भी विभिन्न प्रकार की समस्याएं उत्पन्न होती हैं। कुछ समय पहले यूनिसेफ इंडिया के द्वारा जो रिपोर्ट पेश की गई थी, उसके अनुसार, भारत में रोजाना ६७,३८५ बच्चों का जन्म होता है। यह संख्या पूरी दुनिया में जन्म लेने वाले बच्चों का छठा हिस्सा है। भारत में हर मिनट एक बच्चे की मौत हो जाती है। भारत में बाल मृत्यु दर में लैंगिक असमानता ११ फीसदी के करीब है।

शिशुओं की देखभाल कैसे करें
सुरक्षित शयन वातावरण
बेहतर खान-पान की व्यवस्था
स्वच्छता का ख्याल रखें
नियमित हेल्थ चेकअप कराएं
बच्चे के शरीर के तापमान पर ध्यान दें
बच्चे के साथ बेहतर बाउंडिंग रखें
बच्चे की प्रतिक्रिया पर ध्यान रखें
बच्चे के आसपास धूम्रपान न करें

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