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आफत ला सकता है अंटार्कटिका …खत्म हो जाएगा इंसानों का वजूद!

सामना संवाददाता / नई दिल्ली
उत्तराखंड के चमोली में ग्लेशियर के चलते आई बाढ़ के बाद से ग्लेशियर एक बार फिर से चर्चा में है। ग्लेशियर का अपेक्षाकृत छोटे टुकड़े का गिरना जब ऐसा आफत ला चुका तो ये जानना जरूरी है कि सबसे बड़ा ग्लेशियर पिघलने पर कैसी कयामत लाएगा। अंटार्कटिका का थ्वाइट्स ग्लेशियर वही है, जो दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे खतरनाक ग्लेशियर माना जाता है। इसपर दुनियाभर के विशेषज्ञों की निगाहें हैं। अंटार्कटिका के पश्चिमी इलाके में स्थित ये ग्लेशियर समुद्र के भीतर कई किलोमीटरों की गहराई में डूबा हुआ है। वहीं इसकी चौड़ाई लगभग ४६८ किलोमीटर है। यानी समुद्र के भीतर ये एक विशालकाय दैत्य की तरह पैâला हुआ है। इससे अगर मजबूत जहाज भी टकराए तो भयंकर दुर्घटना हो सकती है।

हो चुकी तबाही की शुरुआत
इसके खतरे को समझने के लिए यहां की बर्फ पूरी दुनिया के पहाड़ों पर इकट्ठा बर्फ से भी ५० गुना से ज्यादा है। थ्वाइट्स का क्षेत्रफल १,९२,००० वर्ग किलोमीटर है यानी तुलना करें तो ये ग्रेट ब्रिटेन के जितना है। इतना विशाल ग्लेशियर जब पिघलेगा तो सारी दुनिया में तबाही मच जाएगी और इसकी शुरुआत हो भी चुकी है।

अमेरिकी शहर जितना बड़ा हुआ छेद
समुद्र के भीतर इस ग्लेशियर के भीतर छेद हो रहे हैं। नासा के वैज्ञानिकों ने इसका पता लगाया। रिपोर्ट के मुताबिक ग्लेशियर में एक बड़ा छेद हो चुका है, जो अमेरिका के मैनहट्टन शहर का दो-तिहाई है। इसके अलावा ये १,१०० फीट ऊंचा है। इस छिद्र को देखकर अनुमान लगाया गया कि ये पिघली हुई बर्फ लगभग १४ खरब टन रही होगी। ये सारी बर्फ पिछले तीन सालों के भीतर पिघली है।

अमेरिका और ब्रिटेन मिलकर कर रहे काम
बता दें कि इस ग्लेशियर के आसपास का मौसम इतना तूफानी होता है कि इसकी सैटलाइट इमेज भी साफ नहीं आ पाती है। यही देखते हुए अमेरिका और ब्रिटेन ने केवल इस ग्लेशियर की तस्वीर निकाल सकने के लिए एक बड़ा करार किया, जिसे इंटरनेशनल थ्वाइट्स ग्लेशियर कोलेबरेशन कहते हैं। इसपर हाल ही में काम शुरू हुआ है। दरअसल ग्लेशियर धीरे-धीरे पिघले तब तो ये प्राकृतिक रहेगा लेकिन समस्या इसका तेजी से पिघलना है। इसके विशाल टुकड़े हो रहे हैं और फिर वे चलते हुए समुद्र के पानी के संपर्क में आकर पिघल रहे हैं।

करोड़ों लोग होंगे विस्थापित
दुनियाभर के समुद्रों का स्तर २ से ५ फीट तक बढ़ जाएगा। इसके कारण तटीय इलाके पानी से डूब जाएंगे। इस तरह से अलग-अलग देशों की करोड़ों की आबादी या तो मारी जाएगी या फिर विस्थापन का शिकार हो जाएगी। इससे इकनॉमी चरमरा जाएगी और महामंदी आ जाएगी।

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