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इंद्राणी में जागी इंसानियत, महिला कैदियों के उत्थान के लिए गृह विभाग को लिखा पत्र

सामना संवाददाता / मुंबई
लगभग 6 वर्षों तक भायखला जेल में बंद रहने के बाद इंद्राणी मुखर्जी जेल से रिहा हुई है। जेल में रहते हुए महिला कैदियों की समस्याओं से अवगत हुई है। अब जेल से बाहर आते ही इंसानियत दिखाते हुए महिला कैदियों के उत्थान के लिए गृह विभाग को खुला पत्र लिखा है।
इंद्राणी मुखर्जी अगस्त 2015 में गिरफ्तारी के बाद से भायखला महिला जेल में बंद थी। पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जमानत पर बाहर आई है। इन छह वर्षों तक जेल में रहते समय इंद्राणी महिलाओं की समस्याओं से अवगत हुई है। इसको लेकर इंद्राणी मुखर्जी ने विचाराधीन कैदियों विशेष रूप से महिलाओं, जो खुद को जेल के भीतर में फंसा हुआ पाती हैं, ऐसी महिलाओं के मानसिक कल्याण और विकास को बढ़ावा देने के लिए प्रशासन द्वारा कार्य किए जाने पर सराहना करते हुए इन महिलाओं के उत्थान के लिए कार्य करने की मांग की है। इंद्राणी मुखर्जी ने बताया कि इन जेल की दीवारों के पीछे अपनी छह साल की यात्रा के दौरान मैं अनगिनत महिलाओं द्वारा सहे गए अन्याय की साक्षी रही हूं। मैं खुद अनुभव की हूं। जेल के अंदर रहने वाली महिलाओं को बेहतर बनाने पर नए सिरे से ध्यान देने की आवश्यकता है, जिससे कि हम विचाराधीन महिलाओं के जीवन को बेहतर बनाने और उनके पुनर्वास के लिए कोशिश की जानी चाहिए। इसमें और सुधार की गुंजाइश बनी हुई है। इन जेल की दीवारों के भीतर खुलने वाली कहानियां एक वास्तविकता को दर्शाती हैं। इस तरफ गृह विभाग का ध्यान आकर्षित करने के लिए पत्र लिखा गया है।
जेलों में क्षमता से चार गुना अधिक हैं महिला कैदी
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, 2021 के अंत तक पूरे भारत में 22,918 महिला कैद थीं, जबकि महिला जेलों की क्षमता केवल 6,767 हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से केवल 15 में केवल महिला जेलें हैं, जबकि 21 में महिला कैदियों के लिए कोई प्रावधान नहीं है। महिला कैदियों में से 1,650 के साथ जेल परिसर में बच्चे भी थे, जिनमें से कुछ को अभी तक दोषी साबित नहीं किया गया है। निर्दोष बच्चे सलाखों के पीछे बड़े हो रहे हैं। ऐसे में इन बच्चों का पुनर्वास करना आवश्यक है। इंद्राणी मुखर्जी ने बताया कि इन जेल की दीवारों के भीतर मासूम बच्चों की मौजूदगी वास्तव में दिल तोड़ देती है। इन सीमाओं से दबी हुई संभावनाओं और उन जिंदगियों की कल्पना करें, जो अतीत के बोझ से मुक्त होकर फलने-फूलने का मौका पाने के हकदार हैं। हम सिर्फ उनके अधिकारों के बारे में बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि उन्हें गरीबी, अपराध और कारावास की छाया से बचाने के हमारे नैतिक कर्तव्य के बारे में भी बात कर रहे हैं। यह मासूम चार दीवारों, शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और पोषण भरे माहौल के बीच पलने को मजबूर हैं। ऐसे में हमारी जेल प्रणाली के भीतर स्पष्ट असमानताओं पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। महिला जेलों की क्षमता वास्तविक संख्या से काफी कम है, जिसके परिणामस्वरूप कैद महिलाओं और उनके बच्चों दोनों पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। इन दीवारों की सीमाओं से परे हैं। महिला कैदियों की इन सब समस्याओं को देखते हुए गृह विभाग को पत्र लिखे जाने की जानकारी इंद्राणी मुखर्जी ने दी।

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