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काले रंग जैसी हूं

जिससे मिलती हूं उसे अपना-सा बना लेती हूं
मैं कुछ-कुछ काले रंग जैसी हूं!
समेट लेती हूं खुद में तपिश गर्म बातों की
मैं गमों के अंधेरों को खुद में समा लेती हूं
मैं कुछ-कुछ काले रंग जैसी हूं!
न सोना न चांदी न नीलम न पन्ना
मैं बनकर कोयला खुद को हीरे-सा सजा लेती हूं
मैं कुछ-कुछ काले रंग जैसी हूं!
न निंदिया न लोरी न मैं कोई सपना
मैं बनकर शब सबको चैन से सुला देती हूं
मैं कुछ-कुछ काले रंग जैसी हूं!
-नेहा सोनी, दतिया (मध्यप्रदेश)

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