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मैं धरती पंजाब की…

मैं धरती पंजाब की रही स्थली,
ऋषि मुनि और गुरुओं की
पल्लवित हुई सभ्यताएं अनेकों
मेरे आंचल में रहकर ही,
वेदों ग्रंथों की रचना से
धरा मेरी का श्रृंगार हुआ।
इतिहास ने क्यूं मेरा ही
चीरहरण हर बार किया,
कर के मेरे अंग को छिन्न भिन्न
लहू-लुहान धरा मेरी को किया गया।
सियासत की ओछी चालों से
मेरे छाती पर संतानों मेरी ही का
बंटवारे में कत्ल-ए-आम किया,
भाई-भाई को शत्रु बनाकर
पंजाबी का रक्तपात हुआ।
पंच नद से सिंचित होकर
अथाह खाद्य भंडारण से
देश भर को खुशहाल किया,
उसी धरा के टुकड़े पर
नजर लग गयी बुरी कोई,
जिसकी माटी के स्पर्श मात्र से
होती ऊर्जा संचारित थी,
उसी मिट्टी को विस्मृत कर,
जमीन मेरी पर जन्मे बालक
दरम्यान में दूरियां बना कर
क्यूं विदेशों में है भाग रहे,
अपनी समृद्ध विरासत को भूल
विदेशों से नाता विचित्र जोड़ रहे।
देता रहा जो रोजगार पंजाबी,
आज क्यूं बनने को प्रवासी
हुआ जा रहा खुद आतुर है,
युवा शक्ति थी जो मान भुजाएं
आज मुझको बेबस छोड़ चले,
गांव-गांव वीरान हो रहे
अनजान हाथों में छोड़ मुझे।

मुनीष भाटिया
मोहाली-पंजाब

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