मुख्यपृष्ठग्लैमर‘मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती!’: नेहा जोशी

‘मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती!’: नेहा जोशी

कला के प्रति अगर सच्चा जुनून हो तो व्यक्ति पैसों के पीछे नहीं भागता, बल्कि जिस काम में उसे आनंद मिलता है उसी में अपना लक्ष्य ढूंढता है। फिल्म और टीवी की जानी-मानी अभिनेत्री नेहा जोशी ‘एंड टीवी’ के नए बायोपिक शो ‘अटल’ की वजह से इन दिनों चर्चा में हैं। इस शो में उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के मां की भूमिका निभाई है। पेश है, नेहा जोशी से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

इस शो को स्वीकारने की मुख्य वजह क्या रही?

‘एंड टीवी’ के साथ यह मेरा तीसरा शो है और मैं खुद को खुशनसीब मानती हूं कि उन्होंने मुझे ये मौका तीसरी बार दिया। अमिताभ रैना और विष्णु शंकर ने मेरी काबिलियत पर भरोसा किया, जिसके लिए मैं दिल से उनकी शुक्रगुजार हूं। एक कलाकार के लिए इससे बड़ी बात क्या होगी कि उसकी कला देखकर उसे बार-बार मौका दिया जा रहा है।

अपने किरदार के बारे में कुछ बताएंगी?

नन्हे अटल की मां कृष्णा देवी वाजपेयी की महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का मौका पाकर मैं कितना गौरवान्वित महसूस कर रही हूं, मैं इसे शब्दों में बयां नहीं कर सकती। इतिहास और राजनीति कृष्णा देवी का पैशन है, इसके बावजूद वे अपने पति वाजपेयी जी की एक समर्पित समर्थक भी बनीं। अपने परिवार में सामंजस्य को बरकरार रखना उनकी जिंदगी का मिशन है और वे अपने पति के हर पैâसले में पूरी दृढ़ता के साथ उनके साथ खड़ी हैं। अपने दृढ़ संकल्प और गहरी धार्मिक प्रतिबद्धता के साथ वे खामोशी से ब्रिटिश शासन का विरोध करती हैं और भारत की आजादी की कामना करती हैं। अपने बेटे का भविष्य उज्ज्वल बनाने में उनकी प्रभावशाली भूमिका कृष्णा जी के किरदार को असाधारण बनाती है। कृष्णा जी ही अटल जी के जीवन में सबसे बड़ा मानसिक आधार हैं।

अटल जी के बारे में आप क्या जानती हैं?

हमने पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी का काम देखा है, देश के प्रति उनकी आस्था और प्यार हम सभी ने महसूस किया है। उनकी कविताएं मैंने पढ़ी हैं। देश में वो काफी बदलाव लाए। उनके कारण देश में काफी चीजों का आरंभ हुआ है। इंसान कहां से आता है, उसके संस्कार क्या है, परवरिश क्या है। उन पर संस्कार करनेवाली मां का किरदार निभाना अपने आप में आनंद है। बहरहाल, इतिहास में मुझे रुचि है।

इस किरदार को वास्तविक बनाने के लिए आपको कितना होमवर्क करना पड़ा?

इस शो से मैं काफी लेट जुड़ी। कास्टिंग प्रोसेस चल रही थी। मैंने निर्देशक और रिसर्च टीम के जरिए ही अपने किरदार को प्रस्तुत किया है। बहुत गहराई से होमवर्क करना मेरे लिए संभव नहीं हुआ।

आपको बायोपिक या ऐतिहासिक शो में ज्यादा देखा जाता है?

ऐसा नहीं है। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि शो ‘महानायक’ में मैंने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की मां का किरदार निभाया था और धारावाहिक ‘दूसरी मां’ का मैं हिस्सा थी। दोनों ही शो में मैंने मां का किरदार निभाया लेकिन दोनों शो में काफी अंतर हैं। एक बायोपिक था तो दूसरा पैâमिली ड्रामा। मैं हमेशा कोशिश करती हूं कि मैं जो भी किरदार निभाऊं उसका प्रभाव गहरा हो और समाज पर उसकी छाप पड़े।

शो ‘अटल’ में आपका किस तरह का लुक है?

काफी साधारण-सा पहनावा है। कॉटन की साड़ी, गले में मंगलसूत्र, हाथ में कांच की चूड़ियां और मांग में सिंदूर। इस चरित्र का लुक काफी साधारण सा है इसलिए ज्यादा मेकअप की जरूरत नहीं पड़ी। मैं ही अपना मेकअप करती हूं क्योंकि मुझे मेकअप करना पसंद है और मुझे मेरे हिसाब से चीजें अच्छी लगती हैं।

आपकी अब तक की जर्नी कैसी रही?

मेरी परवरिश मध्यमवर्गीय परिवार में हुई। पिता सदानंद जोशी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में काम करते थे। मेरे माता-पिता दोनों को रंगभूमि से काफी प्रेम रहा है। स्कूल के जमाने से ही मैं अभिनय की ओर आकर्षित हो गई थी। शुरुआत में थिएटर करने के बाद मराठी धारावाहिकों के साथ-साथ मराठी फिल्मों और व्यावसायिक नाटकों में भी काम किया। मैं निर्मात्री भी बनी और कुछ मराठी व हिंदी शोज का निर्माण किया। फिल्मों में भी मेरा सफर अच्छे से चल रहा है।

क्या यह माना जाए कि आपका संघर्ष अब खत्म हो चुका है और आप एस्टेब्लिश हो चुकी हैं?

सबसे पहली बात ये कि मैंने अपने अब तक के काम को कभी संघर्ष माना ही नहीं। मैं किसी फिल्म निर्माता-निर्देशक की बेटी नहीं और न ही फिल्मी परिवार से मेरा कोई दूर-दूर तक ताल्लुक है। सिर्फ अपनी मेहनत और प्रतिभा के बलबूते मुझे अभिनय के मौके मिले हैं। मुझे खुशी है कि मुझे जितना भी काम मिला वो बिना किसी समझौते या बिना किसी जान-पहचान के मिला है। मैंने अपने आपको इस क्षेत्र में समर्पित किया है और मैं हमेशा कड़ी मेहनत से अपना काम करती रहूंगी।

क्या शादी के बाद आपके करियर में कोई बदलाव आया?

कोई बदलाव नहीं आया है। लेखक ओंकार कुलकर्णी से मेरी शादी हुई। शादी के बाद बदलाव यह आया कि हम दोनों पर जिम्मेदारियां समान रूप से बढ़ीं। घर हम दोनों का है तो हम दोनों की जिम्मेदारियां भी संयुक्त हुई न! जीवन की खुशियां दोहरी हो चुकी हैं यह सबसे बड़ा और सुखद बदलाव है।

 

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