" /> मैं तुझे अपना मानूं रे…!

मैं तुझे अपना मानूं रे…!

प्रेम शब्द पढ़ने में जितना सहज और सरल लगता है, वास्तव में उतना है नहीं। ज्यादातर लोग आकर्षण को प्रेम समझने की भूल कर बैठते हैं, जबकि आकर्षण लंबे समय तक टिकता नहीं और आकर्षण के खत्म होते ही प्रेम का नशा भी उतर जाता है। लेकिन सच्चा प्रेम जब एक बार होता है तो वो एक जन्म नहीं, बल्कि जन्म-जन्मांतर तक चलता है। इंसान जिसे भी दिल से सच्चा प्रेम करता है, उसके सिवा दुनिया में फिर दूजा कोई उसे अच्छा नहीं लगता। उसके बिना जीवन बिताना तो दूर एक पल भी काटना मुश्किल लगता है। हर पल सिर्पâ और सिर्पâ उसी का खयाल रहता है, फिर चाहे सुख हो या दुःख। प्रेम, त्याग और समर्पण मांगता है, जो हर किसी के लिए संभव नहीं, जो व्यक्ति हर दिन प्रेम के नाम पर इंसान को कपड़े की तरह बदले वो भला प्रेम का मतलब क्या समझ सकता है। आज आए दिन जहां हम लोगों के बीच तलाक या अलगाव की खबरें पढ़ते हैं, वहीं बॉलीवुड में एक ऐसी भी अभिनेत्री हैं, जिन्होंने अपने से २२ साल बड़े एक हीरो को अपना दिल १२ साल की छोटी-सी उम्र में दे दिया था। अपने उस चहीते हीरो, जिसे वो दिलोजान से चाहती थीं, की एक मशहूर फिल्म के प्रीमियर पर जब वे सज-धजकर पहुंचीं तो उनकी नजरें पर्दे पर चल रही फिल्म को देखने की बजाय वहां उपस्थित भीड़ में उन्हें ढूंढने में मशगूल थीं।
२३ अगस्त, १९४४ को मसूरी में जन्मीं सायरा बानो का अभिनय के प्रति झुकाव लंदन में पढ़ाई करने के दौरान ही हो गया था। अपनी स्वूâली छुट्टियों के दौरान जब वे मुंबई आर्इं उसी दौरान के. आसिफ की मशहूर फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ के ग्रैंड प्रीमियर का इनविटेशन कार्ड उन्हें अपने घर पर मिला। फिल्म का प्रीमियर अपने आप में ऐतिहासिक था। फिल्म का प्रिंट हाथी पर रखकर थिएटर तक लाया जानेवाला था। फिल्म को लेकर खबरों का माहौल गर्म था और हर तरफ चर्चाओं का दौर जारी था। लेकिन सायरा बानो को इन तमाम बातों में तनिक भर भी रुचि नहीं थी। उनकी आंखें तो बस दिलीप कुमार का दीदार करना चाहती थीं। अत: फिल्म का इनविटेशन कार्ड देखकर वे पूâली नहीं समार्इं और उन्होंने प्रीमियर के छह दिन पहले ही प्रीमियर पर जाने की तैयारी शुरू कर दी। दुबली-पतली सायरा बानो को साड़ी पहनना नहीं आता था। इसके बावजूद उन्होंने अपनी नानी शमशाद बेगम की ढेर सारी साड़ियों को उलट-पुलट डाला। नानी की एक भारी-भरकम साड़ी के साथ ही हाई हील वाला सैंडल भी उन्होंने उस मौके पर पहनने के लिए निकाला। अपने घुटनों तक लंबे बालों को अच्छी तरह धोकर धूप में सुखाया। नाखूनों को तराशने के साथ ही उस पर बढ़िया नेल पॉलिश भी लगाई। सायरा बानो खुद को ये सोचकर सजने और संवारने में मशगूल हो गर्इं कि प्रीमियर पर दिलीप कुमार की नजर जब उन पर पड़ेगी तो वे उन्हें देखकर चारों खाने चित हो जाएंगे। तकरीबन छह दिनों की तैयारी के बाद आखिरकार ‘मुगल-ए-आजम’ के प्रीमियर वाला दिन भी आ गया। सायरा बानो अपनी मां नसीम बानो के साथ सज-संवरकर प्रीमियर पर पहुंचीं। प्रीमियर पर सारी फिल्म इंडस्ट्री मौजूद थी। बस, नहीं मौजूद थे तो दिलीप कुमार। प्रीमियर शुरू हुआ और फिल्म पर्दे पर दिखाई जाने लगी। फिल्म के एक-एक दृश्य, डायलॉग और गीतों को सुनकर जहां लोग मंत्रमुग्ध हुए जा रहे थे, वहीं सायरा बानो की निगाहें फिल्म के दृश्यों को एन्जॉय करने की बजाय दिलीप कुमार को लगातार ढूंढ रही थीं। जब उन्हें पता चला कि किन्हीं कारणोंवश दिलीप कुमार प्रीमियर पर नहीं आए हैं, तो उनका मन उचट गया और वे इतनी मायूस हो गर्इं कि उन्होंने प्रीमियर के बीच ही घर जाने की जिद ठान ली।
दिलीप कुमार की नामौजूदगी में ‘मुगल-ए-आजम’ जैसी ऐतिहासिक फिल्म का एक दृश्य भी एन्जॉय न करनेवाली सायरा बानो उन्हें टूटकर चाहती थीं, उनसे बेइंतहा मोहब्बत करती थीं। दिलीप कुमार के प्रति सायरा बानो की दीवानगी का ये आलम था कि अपनी फिल्म ‘जंगली’ के हिट हो जाने के बाद वे ज्यादातर प्रोड्यूसर्स से कहतीं कि अगर फिल्म में दिलीप कुमार होंगे तो वे प्रâी में काम करेंगी। दिलीप कुमार के साथ फिल्मों में काम कर उनसे ब्याह रचाने वाली सायरा बानो जैसी पत्नियां फिल्म इंडस्ट्री में बहुत ही कम देखने को मिलती हैं, जिसने अपने पति की सेहत और खुशी के लिए अपने करियर के साथ ही अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया हो। जिंदगी में चाहे कितना ही बड़ा तूफान क्यों न आया हो, पति की जी-जान से सेवा करनेवाली सायरा बानो ने दिलीप कुमार का साथ कभी नहीं छोड़ा और मजबूती से हमेशा उनके साथ खड़ी रहीं। दिलीप कुमार के अंतिम समय तक हर पल उनका साथ निभानेवाली प्रेम और समर्पण की जीती-जागती प्रतिमूर्ति सायरा बानो को आज भी इंतजार है, तो बस अपने साहब दिलीप कुमार का…!