मुख्यपृष्ठग्लैमर‘मैं चढ़ ही नहीं पाता था!’: वैभव तत्ववादी

‘मैं चढ़ ही नहीं पाता था!’: वैभव तत्ववादी

टीवी, फिल्म्स, ओटीटी प्लेटफॉर्म के अलावा विज्ञापन की दुनिया का एक लोकप्रिय चेहरा हैं हैंडसम और टैलेंटेड एक्टर वैभव तत्ववादी। महाराष्ट्र के अमरावती जिले में जन्मे और नागपुर में पले-बढ़े वैभव का परिवार काफी पढ़ा-लिखा है। इंजीनियर होने के बावजूद वैभव ने अभिनय को अपना करियर बनाया। सोनी लिव पर उनके शो ‘निर्मल पाठक की घर वापसी’ को काफी सराहा जा रहा है। पेश है, वैभव तत्ववादी से पूजा सामंत की हुई बातचीत के मुख्य अंश-

  • ‘निर्मल पाठक की घर वापसी’ शो को स्वीकारने की क्या वजह रही?
    जब लेखक-निर्देशक राहुल पांडे ने कहानी और किरदार समझाया तो मुझे एहसास हुआ कि कहानी काल्पनिक नहीं है। कहानियां ऐसी होनी चाहिए जो दर्शकों को अपनी लगे। यही वजह रही इस शो को स्वीकारने की।
  • आपका किस तरह का किरदार है?
    इस शो में मैं निर्मल पाठक का मुख्य किरदार निभा रहा हूं, जो दिल्ली का एक युवक है और कामकाज के सिलसिले में कहीं और जाकर रहता है। जीवन के उतार-चढ़ाव उसे ये निर्णय लेने पर मजबूर कर देते हैं कि वो अपने परिवार के पास अपने गांव वापस लौटे। कहीं-न-कहीं कहानी इस ओर भी इशारा करती है कि जो युवक अपने परिवार के साथ रहते हुए करियर बनाता है उसके अच्छे-बुरे समय में उसका परिवार उसे पूरा साथ देता है। इंसान को अपनी जड़ों को कभी भूलना नहीं चाहिए।
  • आपके लिए मुंबई में करियर बनाना कितना आसान रहा?
    मेरा जन्म अमरावती में हुआ और परवरिश नागपुर में। अभिनय का प्रेम मुझे पुणे ले आया। लेकिन अभिनय की सबसे ज्यादा संभावनाएं मुंबई में होने के कारण मैं मुंबई आ गया। मुंबई शहर में जिसे काम मिल जाता है उसके जीने के लिए दरवाजे खुल जाते हैं, बिना पर्याप्त पैसों के इस शहर में जीना बहुत मुश्किल है। मैं जोगेश्वरी में किराए के घर में रहता था और मेरे नाटकों की रिहर्सल्स दादर में हुआ करती थी। सुबह ऑफिस जानेवालों की भीड़ रहती है। मैंने जब भी लोकल में चढ़ने की कोशिश की मैं पगला गया, चढ़ ही नहीं पाता था। आरंभ के दिन मेरे लिए काफी मुश्किलों भरे रहे। दूसरे शहर से आए लोगों के लिए मुंबई में रहना आसान नहीं है।
  • आपका झुकाव अभिनय की ओर कैसे हुआ?
    मेरे परिवार का झुकाव अकेडमिक के साथ कई कलाओं में है। मेरी मां एक बेहतरीन कत्थक डांसर हैं और उन्हें अभिनय में भी दिलचस्पी है। मेरे परदादा ने मराठी के मशहूर लेखक-निर्देशक और अभिनेता पी.एल. देशपांडे के साथ नाटक और फिल्मों में काम किया है। मेरे पिताजी इंजीनियरिंग कॉलेज के प्राचार्य हैं और उन्हें भी कई कलाओं में रुचि रही है। कला-पढ़ाई-नृत्य-अभिनय मुझे विरासत में मिली है।
  • संघर्ष के दिनों के क्या अनुभव रहे?
    संघर्ष के दिन मुझे भी देखने पड़े। मराठी फिल्मों सहित विज्ञापनों में मौके मिले और मेरी पहचान बन गई। मैं ऑडिशन देता रहा और धीरे-धीरे मुझे काम मिलता गया। ‘लिपस्टिक अंडर माय बुरखा’, ‘मणिकर्णिका- द क्वीन ऑफ झांसी’, ‘त्रिभंगा’ जैसी पॉप्युलर फिल्मों और ओटीटी प्लेटफार्म के शोज से मुझे प्रशंसा मिली और आगे बढ़ने के मौके मिले।
  • प्रादेशिक भाषाओं के कलाकारों को हिंदी की मुख्य धारा में मौका मिलना आसान नहीं होता? आपने कितनी कोशिशें कीं?
    मेरे काम को देख-देखकर ही मुझे आगे बढ़ने का मौका मिलता गया। यह तो हम कलाकारों पर निर्भर होता है कि हम हमारे गुणों को पहचान लें और फिर आगे बढ़ें। बिना संयम और धीरज खोए मैं कछुआ गति से धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा हूं। ये जरूरी नहीं कि किसी शख्स को नाकामयाबी मिली तो आपको भी मिलेगी। मुझे जब तक अपना किरदार पसंद नहीं आता मैं उसे स्वीकार नहीं करता।

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