मुख्यपृष्ठग्लैमरमैं उन्हें ही देखा करती थी!- सई ताम्हणकर

मैं उन्हें ही देखा करती थी!- सई ताम्हणकर

बेहद खूबसूरत और टैलेंटेड अभिनेत्री सई ताम्हणकर के अभिनय करियर को २० वर्ष हो चुके हैं। इन २० वर्षों में सई ने हिंदी के अलावा मराठी, तमिल, तेलुगू, मलयालम फिल्मों में भी काम किया है। बोल्ड एंड ब्यूटीफुल सई के बारे में कहा जाता है कि सई की जो जुबान पर है, वही उनके दिल में है। रेड चिलीज के निर्माण में बनी ‘जी फाइव’ पर रिलीज हुई फिल्म ‘भक्षक’ में सई नजर आ रही हैं, जिसमें भूमि पेडणेकर और संजय मिश्रा अहम किरदार निभा रहे हैं। पेश है, सई ताम्हणकर से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-
कैसा रहा आपके लिए पिछला वर्ष?
पिछला वर्ष मेरे लिए बहुत शानदार रहा। फिल्म ‘मिमी’ के लिए काफी प्रशंसा मिलने के साथ ही मुझे पुरस्कार भी मिला। कई अच्छी मराठी फिल्में भी मैंने कीं। मनचाहा फ्लैट खरीदने के बाद मैं अपने सपनों के घर में शिफ्ट हो गई। कुल मिलाकर, मेरे लिए पिछला वर्ष बहुत सुखद रहा।
इस वर्ष के लिए आपके क्या रेजोल्यूशंस हैं?
मैं रेजोल्यूशन पर विश्वास नहीं करती। मैं मानती हूं कि जिस बात का हम संकल्प लेते हैं, उसके लिए अनुशासन की बड़ी आवश्यकता होती है। हम जो कुछ भी पाना चाहते हैं, उसके लिए हमें कड़ी मेहनत के साथ ही संघर्ष भी करना होगा। महज इसलिए काम नहीं करना कि हमने संकल्प किया है। ऐसा वक्त जीवन में आना ही नहीं चाहिए कि हमें संकल्प करना पड़े। सच कहूं तो संकल्पों पर मेरा विश्वास नहीं।
फिल्म ‘भक्षक’ आपने क्यों साइन की?
फिल्म ‘भक्षक’ की निर्माता हैं गौरी खान। पुलकित ने इसे निर्देशित किया है। मेरा किरदार डैशिंग पुलिस ऑफिसर जसमीत गौर का है। पहली बार मुझे एक डैशिंग तेज-तर्रार पुलिस अफसर निभाने का मौका मिला है। ‘भक्षक’ को इनकार करने की कोई वजह ही नहीं बनती है।
इस किरदार को निभाने के लिए क्या आपने होमवर्क किया?
निर्देशक ने हमें पूरा सेटअप दिया कि किस तरह का किरदार होगा, क्या विशेषता होगी और किस टाइप की बॉडी लैंग्वेज होगी? किरदार किस टोन में बात करेगा? जब हम कलाकारों को पूरी प्लेट यूं सजाकर दी गई तो अलग से होमवर्क करने की गुंजाइश ही नहीं बचती। जब कहानी और किरदार के सारे इनपुट्स दिए गए हों तो होमवर्क कैसा?
पुलिस अफसर जसमीत और सई में कितनी समानता है?
असमानता पहले कहूंगी, क्योंकि हमारे पेशे अलग हैं। मैं अभिनेत्री हूं और जसमीत पुलिस अफसर। हमारे काम और हमारी बैकग्राउंड भिन्न है। समानता यह कि जसमीत जो चाहती है, उसे पाकर रहती है। अपने काम, अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटती। जसमीत वाकई बॉस है और मैं खुद अपने काम में बॉस हूं। मैं खुद भी ऐसी हूं, जो ठान लेती हूं उससे पीछे नहीं हटती।
भूमि पेडणेकर और संजय मिश्रा के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
जब तक हम किसी व्यक्ति से रू-बरू बात नहीं करते, तब तक हमें ऐसा लगता है कि वो नॉन अप्रोचेबल है। इस फिल्म से पहले भूमि से कभी बात या मुलाकात नहीं हुई थी। लेकिन ‘भक्षक’ के दौरान एक स्नेह की भावना निर्माण हुई। संजय मिश्रा बहुत ही सहज और नैचरल एक्टर हैं। मैं सेट पर उन्हें ही देखा करती थी।
क्या आपके जीवन में भी कोई भक्षक है?
मैं ट्रोलर्स को अपने जीवन का भक्षक मानती हूं। ट्रोलर्स कुछ इस तरह परेशान करते हैं, मानो वो अपनी शर्म और हया बेच चुके हैं। हालांकि, मैं उन्हें इग्नोर ही करती हूं और यही सही उपाय है। लेकिन ट्रोलर्स से सभी परेशान हैं।
अपनी अभिनय जर्नी पर आप क्या सोचती हैं?
मराठी नाटक, मराठी धारावाहिक, हिंदी और साउथ की फिल्मों और फिर ओटीटी मैं सीढ़ी दर सीढ़ी आगे बढ़ती गई। महाराष्ट्र के छोटे शहर सांगली में हम रहते थे। स्कूल-कॉलेज के समय से मैं स्कूल के नाटकों में अभिनय करती रही। मुंबई आने के बाद मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। बहुत कम समय में मुझे मराठी फिल्मों में नंबर वन अभिनेत्री कहा जाने लगा। रीजनल में शुरू हुआ यह सफर आज ओटीटी तक आ पहुंचा है। लोग कहते हैं इंडस्ट्री में गॉडफादर होना जरूरी है, लेकिन मैंने अपना रास्ता अकेले ही तय किया है।
क्या आपको लगता है कि आपके संघर्ष का दौर खत्म हो चुका है?
दो दशक से मैं अभिनय की दुनिया में काम कर रही हूं। हर शो, फिल्म के जरिए मैं सीख रही हूं। हर किरदार जीवन का मूल्य सिखाता है। अगर ऑडिशन देते रहना संघर्ष है तो मुझे खुद को स्ट्रगलर कहना गलत नहीं लगता। किसी भी किरदार को निभाने के लिए ऑडिशन देना मैं गलत नहीं मानती। ऑडिशन देने से एक पॉजिटिव और कॉम्पिटिटिव फीलिंग आती है। कोई भी किरदार अगर ऑडिशन पास होने के बाद मिलता है तो रेस में जीतने का सुकून मिलता है।

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