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मैं थोड़ी नर्वस थी!-विद्या बालन

बॉलीवुड की ‘शेरनी’, ‘लेडी अमिताभ’ और ‘वन वुमन आर्मी’ के नाम से मशहूर ‘संपूर्ण अभिनेत्री’ के रूप में मशहूर विद्या बालन की ‘अमेजॉन प्राइम’ पर फिल्म ‘जलसा’ रिलीज हो चुकी है। विद्या बालन और शेफाली शाह की मुख्य भूमिकाओं वाली इस फिल्म को फिल्म ‘तुम्हारी सुलु’ को निर्देशित करनेवाले सुरेश त्रिवेणी ने निर्देशित किया है। पेश है, विद्या बालन की पूजा सामंत से हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

पहली बार शेफाली शाह से आपका मिलना कब हुआ?
शेफाली शाह से मेरी पहली मुलाकात एबुंशिया के ऑफिस में हुई। इससे पहले मैंने कभी शेफाली के साथ काम नहीं किया, लिहाजा मैं थोड़ी नर्वस थी। अपने को-स्टार रहे मानव कौल से मैंने शेफाली के बारे में जानना चाहा तब मानव ने कहा, शेफाली के साथ फिल्म करना बेहद खुशगवार अनुभव होगा। स्टार कास्ट की मीटिंग में शेफाली ने मिलते ही मुझे गले से लगा लिया। ९० के दशक में हमने एक टीवी शो के लिए साथ में काम किया था, जिसमें बहुत ज्यादा इंटरैक्ट करने का मौका नहीं मिला था।
इस बात में कितनी सच्चाई है कि आपने फिल्म ‘जलसा’ को रिजेक्ट कर दिया था?
ये बिल्कुल सच है कि सुरेश त्रिवेणी द्वारा पहली बार ‘जलसा’ का ऑफर मिलने पर मैंने फिल्म को रिजेक्ट कर दिया था। इस फिल्म का ऑफर उन्होंने मुझे २०२० में दिया था। कोरोना, लॉकडाउन के उस दौर में इस निगेटिव किरदार को करने के लिए मेरा मन ही नहीं हुआ। बाद में हमने कुछ डिस्कशंस और बदलाव किए, तब जाकर मैंने ‘जलसा’ में माया का किरदार स्वीकार किया।
पत्रकार माया के किरदार के लिए आपने किस तरह की तैयारियां कीं?
फिल्म ‘जलसा’ महामारी के दौरान मुझे ऑफर हुई थी। महिला पत्रकार वैâसे होती हैं, वैâसे दिखती हैं, वैâसे काम करती हैं, इसका अंदाजा मुझे है। निर्देशक सुरेश त्रिवेणी ने भी माया के किरदार के साथ ही उसका ग्राफ मुझे समझाया था। स्क्रिप्ट और अपनी नॉलेज के आधार पर मैंने माया का किरदार निभाया।
जब कोई अभिनेता निगेटिव किरदार निभाता है, तो उसकी तारीफ होती है। अगर अभिनेत्री निगेटिव रोल करे तो क्या उसकी तारीफ नहीं होगी? क्या इसमें लिंग भेद वाला मामला है?
शायद नहीं। हालांकि मैंने इस मुद्दे पर सोचा नहीं। लेकिन कई बार मुझे लगता है कि एक स्त्री कलाकार होने के नाते दर्शक मुझे पसंद करें। सच तो यह है कि फिल्में हों या ओटीटी प्लेटफॉर्म, महिलाओं के लिए यह बहुत सुनहरा दौर है। उन्हें अच्छे और सशक्त किरदार मिल रहे हैं, उन्हें ध्यान में रखकर किरदार और कहानियां लिखी जा रही हैं। शायद इससे पहले ऐसा नहीं हुआ था। हमारे हीरो इस दौर में कहां हैं? मैं उनका कोई अनादर नहीं कर रही हूं, पर आज का दौर यही सच्चाई बयान कर रहा है। अभिनेत्रियों को मुश्किल और गंभीर परतों वाले किरदार मिल रहे हैं। हम अब तथाकथित हीरोइन टाइप रोल नहीं, किरदार निभाते हैं।
शाहरुख खान, सलमान खान, आमिर खान, हृत्विक रोशन जैसे ‘ए’ लिस्टर स्टारों के साथ फिल्में न करने की क्या वजह रही?
मुझे आज तक किसी भी ‘ए’ लिस्टर स्टार के साथ कभी कोई फिल्म ऑफर ही नहीं हुई। हां, अक्षय कुमार जरूर अपवाद रहे। उनके साथ मैंने ‘हे बेबी’ और ‘मिशन मंगल’ जैसी दो फिल्में कीं। ‘ए’ लिस्टर स्टारों के साथ फिल्म न करने से न उन्हें फर्क पड़ा और न मुझे। मुझे अच्छी फिल्में मिलने के साथ ही उम्दा कंटेंट और एक से बढ़कर एक किरदार मिल रहा है। मुझे दिमाग में रखकर स्क्रिप्ट्स लिखी जाती हैं। इससे बढ़कर अच्छा दौर किसी भी अभिनेत्री के लिए और क्या हो सकता है?
फिल्म इंडस्ट्री को पुरुष प्रधान इंडस्ट्री कहा जाता है?
फिल्म इंडस्ट्री पुरुष प्रधान है लेकिन वक्त के साथ फिल्मों और समाज का माहौल बदलता जा रहा है। इसीलिए तो मैंने कहा कि टीवी, फिल्म्स और ओटीटी सभी जगह स्त्री केंद्रित किरदार लिखे जा रहे हैं। अच्छा बदलाव आने और दिखने में वक्त लगता है। मीना कुमारी, नर्गिस, हेमा मालिनी, रेखा, श्रीदेवी, जया बच्चन इन सभी के साथ नई पीढ़ी में तापसी, कंगना, दीपिका, आलिया इन सभी नायिकाओं ने इसी हीरो डॉमिनेटेड इंडस्ट्री में अपना मकाम बनाकर दिखाया।

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