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दया याचिका ठुकराई तो सीधे लगेगी फांसी! …‘केंद्र’ के नए ‘बीएनएसएस’ विधेयक में नया प्रावधान

•  कोर्ट नहीं जा पाएंगे दोषी
• राष्ट्रपति का निर्णय होगा अंतिम

सामना संवाददाता / नई दिल्ली
मौत की सजा पाए वैâदी की अंतिम उम्मीद राष्ट्रपति होते हैं। वे वहां दया याचिका दायर करते हैं। यदि राष्ट्रपति उसे ठुकरा देते हैं तो फिर वे सुप्रीम कोर्ट में अपील करते हैं। पर अब ऐसा नहीं हो पाएगा। राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका ठुकराए जाने के बाद, उसे अंतिम माना जाएगा और वे सुप्रीम कोर्ट नहीं जा पाएंगे। इस पैâसले को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। केंद्र सरकार ने मानसून सत्र में पारित भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता विधेयक (बीएनएसएस) में इसका प्रावधान किया है। इस विधेयक ने राष्ट्रपति को बहुत सारी शक्तियां दे दी हैं। इसके अनुसार, अगर कोई वैâदी राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर करता है, तो राष्ट्रपति के पास उसे माफ करने या न करने की शक्ति है, लेकिन देश की कोई भी अदालत राष्ट्रपति द्वारा लिए गए पैâसले पर सुनवाई नहीं कर सकती है।
नहीं दी जा सकेगी चुनौती
इससे पहले, मौत की सजा पाने वाले वैâदी को राष्ट्रपति से दया की गुहार लगानी पड़ती थी और अगर राष्ट्रपति उसकी सजा कम कर देते थे, तो उन्हें अदालत को इसका कारण बताना पड़ता था। लेकिन अब, अगर राष्ट्रपति मौत की सजा को उम्रवैâद में बदल देते हैं, तो उन्हें अदालत के सामने इसका कारण बताने की जरूरत नहीं है। साथ ही राष्ट्रपति के पैâसले को चुनौती भी नहीं दी जा सकती।
अंतिम विकल्प राष्ट्रपति
राष्ट्रपति के निर्णय पर कोई भी सवाल देश की किसी भी अदालत में समीक्षा के लिए नहीं उठाया जा सकता। इसका सीधा असर मौत की सजा पाए वैâदियों पर पड़ेगा। राष्ट्रपति और राज्यपाल के पास क्षमादान देने की शक्ति है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पहले कहा था कि अगर उन्हें लगता है कि मौत की सजा पाए किसी दोषी की दया याचिका पर जवाब देना अनुचित है या राष्ट्रपति दया याचिका खारिज कर देते हैं, तो वैâदी को अदालत जाने का अधिकार है, लेकिन बीएनएसएस कानून के कारण वैâदी का यह विकल्प भी बंद होने वाला है।

 

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