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टीबी से बचना है तो सब्जी खाओ यारों! … द लांसेट का `पौष्टिक’ अनुसंधान

सामना संवाददाता / मुंबई
पूरक प्रोटीन ने इस कदर कमाल किया है कि हिंदुस्थान में टीबी की बीमारी के मामले काफी कम सामने आ रहे हैं। पूरक प्रोटीन और मल्टीविटामिन के समावेश वाली मासिक आहार योजना के चलते हिंदुस्थान में टीबी के रोगियों की होनेवाली मौतों के मामले घटे हैं। इतना ही नहीं उनके परिवार के सदस्यों में भी योजना ने बीमारी के खतरे को आधा कर दिया है। यह जानकारी वैश्विक स्वास्थ्य पत्रिका ‘द लांसेट’ में प्रकाशित अनुसंधान में सामने आई है। लांसेट के इस `पौष्टिक’ अनुसंधान से एक बात साफ हो गई है कि टीबी से बचना है तो सब्जी खानी पड़ेगी।
शोधकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने झारखंड के चार जिलों में अध्ययन किया। राष्ट्रीय टीबी रोग उन्मूलन कार्यक्रम में फेफड़े की टीबी के २,८०० रोगियों के परिवार के सदस्यों को शामिल किया गया। मरीजों को छह महीने तक मासिक दस किलोग्राम राशन जिसमें चावल, दाल, दूध पाउडर, तेल और पूरक मल्टी विटामिन दिया गया। इसके साथ ही परिवार के सदस्यों को प्रतिमाह ५ किलो चावल और १.५ किलो दाल का राशन दिया गया। नई डाईट शुरू होने के बाद टीबी मरीजों के परिजनों की जांच की गई। सभी प्रतिभागियों का ३१ जुलाई २०२२ तक सक्रिय रूप से अध्ययन किया गया, ताकि यह अध्ययन किया जा सके कि क्या वे रोगी के संपर्क में आने के कारण टीबी से संक्रमित हुए हैं। अध्ययन में शामिल लगभग दो-तिहाई लोग संथाल, होस, ओरांव और भूमिज जैसे स्वदेशी समुदायों से थे और लगभग ३४ प्रतिशत यानी १०,३४५ में से ३,५४३ कुपोषित थे।

टीबी के उपचार में जीवन बचाने और रोगियों के स्वास्थ्य में सुधार के लिए आहार महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कुपोषित रोगियों में टीबी के उच्च प्रसार और गंभीरता से मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए भारतीय संदर्भ में पोषण रोगी की देखभाल का एक अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए।
-अनुराग भार्गव, शोधकर्ता

पोषण के सकारात्मक प्रभाव
अध्ययन में पाया गया कि पोषण आहार प्राप्त करने के बाद फेफड़े के टीबी रोगियों की संख्या में ४० प्रतिशत, जबकि संक्रामक टीबी के मामलों की संख्या में ५० प्रतिशत की कमी आई। इतना ही नहीं मृत्यु दर ३५ से ५० प्रतिशत थी। लगभग आधे रोगियों का बॉडी-मास-इंडेक्स (बीएमआई) १६ से कम था। पौष्टिक आहार से पहले दो महीनों में उनका वजन बढ़ा और मृत्यु दर में ६० प्रतिशत की कमी आई।

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