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2024 में उत्तर भारत से भाजपा के सफाये की नींव पड़ी! …यूपी की 80 और बिहार की 40 लोकसभा सीट की लड़ाई के समीकरण बदले!

मनोज श्रीवास्तव / लखनऊ।

लखनऊ। बिहार में सत्ता से बाहर हुई भाजपा की यूपी इकाई में भी हड़कम्प मच गया है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 8वीं बार राज्य की कमान मिलने के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा कि 2024 में अब भाजपा नहीं आने पायेगी। वहीं उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और यूपी के महामंत्री संगठन सुनील बंसल के वर्चस्व की लड़ाई में आज पार्टी के लिये बहुत कठिन दिन रहा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खेमे के खास सिपहसालार निवर्तमान प्रदेश अध्यक्ष व जलशक्ति मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह को विधानपरिषद में नेता सदन के पद से हटा दिया गया। उनके स्थान पर उपमुख्यमंत्री व राज्य के उपमुख्यमंत्री नंबर एक केशव मौर्य को विधानपरिषद में नेता सदन नियुक्ति किया गया।

पिछली सरकार योगी पार्ट-1 में उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिये पार्टी की आंतरिक राजनीति में सबसे बड़े सिरदर्द थे। उनकी नियुक्ति ने योगी खेमे की चिंता बढ़ा दिया था। स्वतंत्रदेव के हटने और केशव मौर्य की नियुक्ति की खबर आग की तरह फैल गयी। चूंकि महीने भर पहले परम्परा के विपरीत स्वतंत्र देव सिंह से प्रदेश अध्यक्ष से त्यागपत्र ले लिया गया था। अमूमन भाजपा में ऐसा होता नहीं।भाजपा में नये अध्यक्ष के आने के बाद पुराने अध्यक्ष का कार्यकाल स्वतः समाप्त हो जाता है। लेकिन तीन वर्ष के कार्यकाल की समाप्ति को आधार बना कर उनसे इस्तीफा लिया गया। अब बारी थी योगी खेमे के ऐक्शन में आने की। जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समर्थक संघ के प्रचारकों ने दबाव बढ़ाया तो उनका कड़ा रुख देखते हुए सुनील बंसल को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के तौर पर छुट्टी दे दी गयी। लेकिन भाजपा की केंद्रीय टीम में सुनील बंसल की मजबूत दखल होने के चलते उन्हें यूपी भाजपा के महामंत्री संगठन के पद से हटाने के साथ-साथ पार्टी का राष्ट्रीय महामंत्री बना दिया गया। आनन-फानन में बंसल को पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और तेलंगाना का प्रभार भी सौंप दिया गया। सुनील बंसल यूपी में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के सबसे करीबी व्यक्ति थे।

2014 से दोनों की एक साथ यूपी की राजनीति में इनट्री हुई थी। उस समय के प्रदेश अध्यक्ष डॉ लक्ष्मीकान्त बाजपेयी के संघर्ष से उपजे लहर को शाह-बंसल की जोड़ी ने अच्छा उपयोग किया। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय करके राज्य में फायरब्रांड हिंदुत्व की नई लाइन खीच दी। योगी कभी सुनील बंसल को नहीं भाये, सत्ता के साथ ही इन दोनों के बीच दरार की भी नींव पड़ गयी। बताते हैं बुधवार को भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने जैसे ही सुनील बंसल को पार्टी से सीधे जोड़ते हुए राष्ट्रीय महासचिव बनाया वैसे यह आम चर्चा बन गया कि जल्द ही बंसल को वाई श्रेणी की सुरक्षा से लैस के बंगाल, उड़ीसा और तेलंगाना के दौरे पर भेज दिया जायेगा। यह काम अमितशाह के हाथ में है। पार्टी के जानकारों के अनुसार बंसल के जाने के बाद उत्तर प्रदेश भाजपा में जिले-जिले जूतमपैजार मचना तय है। जिसे संभालना मुश्किल हो जायेगा। बंसल को हटा कर मुख्यमंत्री खेमा भले विजयी मान रहा है लेकिन इसी के साथ अब यूपी में मोदी की मुश्किलें बढ़ेंगी। योगी आदित्यनाथ टीम गुजरात के लिये ऐसा चारा बन गये हैं जो न निगला जाये, न उगला जाय। हिंदुत्व पर अडिग रहने और अपने फायरब्रांड बुल्डोजर छवि के कारण दिन ब-दिन केदारनाथ के चट्टान की तरह जमते जा रहे हैं।

2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा ने 80 के 80 लोकसभा सीट जीतने का लक्ष्य रखा है। चूंकि योगी अपने चेहरे पर विधानसभा 2022 का चुनाव जीत चुके हैं इस लिये यदि 80 में 80 लोकसभा भाजपा जीतती है तो मोदी को योगी का लोहा मानना पड़ेगा। योगी शिवराज चौहान, वसुंधरा राजे सिंधिया, देवेंद्र फडणवीस की तरह नरम चारा नहीं हैं। उनका कद बहुत बढ़ा है। प्रदेश के बाहर भी योगी की बहुत मांग रहती है। बड़ी विजय मिलते ही योगी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बाद भाजपा के सबसे ताकतवर नेता हो जायेंगे। यदि किसी कारण उत्तर प्रदेश का परिणाम नहीं हुआ तो देश के सबसे बड़े प्रदेश से भाजपा की गणित बिगाड़ने के जिम्मेदार योगी आदित्यनाथ के साथ टीम गुजरात भी होगी। ऐसे में सुनील बंसल की जगह आये नये महामंत्री संगठन डॉ धर्मपाल सिंह के लिये प्रदेश भाजपा को अनुशासित रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी। भाजपा की अंतरिम लड़ाई में भले कुछ लोग इसे योगी के जीत में देख रहें हैं लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव की दृष्टि से यह परिवर्तन मोदी के लिये बड़ी कठिनाई लेकर आया है। अब यूपी की 80 और बिहार की 40 लोकसभा सीट की लड़ाई भाजपा के लिये टेढ़ी खीर होती दिखने लगी है। अभी भाजपा खेमा यही कह रहा है कि यूपी में विपक्ष नहीं है। फिर भी यदि विपक्ष एकजुटता बनाने में कामयाब हुआ तो देश के सबसे बड़े हिंदी भाषी राज्य से भाजपा के सफाये की शुरूआत होगी।

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