मुख्यपृष्ठस्तंभशिक्षा के क्षेत्र में राजनीति न हो!

शिक्षा के क्षेत्र में राजनीति न हो!

योगेश कुमार सोनी

यूपी की शिक्षा प्रणाली बेहद कमजोर व बच्चों को तनाव देने वाली बनती जा रही है। यूपी बोर्ड ने १२वीं की परीक्षा को भी इस बार १२ दिनों में ही खत्म करने की तैयारी की है। पिछले वर्ष १२वीं की परीक्षा १४ दिन में पूरी हुई थी। उस समय भी परीक्षाओं में अंतर न होने से परीक्षार्थी तनाव में थे। दरअसल, मामला यह है कि १२वीं कक्षा की परीक्षा हमेशा सबसे कठिन मानी जाती है और हर पेपर के बीच में एक अंतराल दिया जाता रहा है। हर पेपर के बीच कम से कम तीन से चार दिन का अंतर होता था, जिससे विघार्थियों को अगले पेपर के लिए रिवीजन करने का मौका मिल जाता था। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नियम में बदलाव से बीते वर्ष भी बच्चों को कई तरह की कठिनाइयों व चुनौतियों का सामना करना पड़ा और नतीजतन बच्चों के नंबर कम आए और राज्य का रिजल्ट खराब हुआ था। ऐसा ही इस वर्ष भी करने की तैयारी हो रही है। जैसा कि हम देखते हैं कि बोर्ड परीक्षाओं के नजदीक आते ही परीक्षार्थियों के दिल की धड़कन बढ़ने लगती है। परीक्षा नजदीक आने के साथ ही मानसिक दबाव तेजी से बढ़ता है। कई बार इस मानसिक दबाव का असर उनके परीक्षा परिणाम पर भी साफ दिखता है। कम नंबर आने पर स्टूडेंट्स डिप्रेशन में चले जाते हैं। अच्छी तैयारी के लिए परीक्षाओं के बीच में अंतर परीक्षार्थियों की तैयारी के लिए बेहतर होता है। हालांकि, यूपी बोर्ड के परीक्षा कार्यक्रम में ऐसा दिखाई नहीं दे रहा है। इसे लेकर स्टूडेंट्स का कहना है कि दो परीक्षाओं के बीच में अंतर मिलने से तैयारी में आसानी रहती है, जबकि इस बार पिछली बार की तरह मुश्किल होगा। जैसा कि १२वीं के विद्यार्थी पहले एक बार कक्षा दसवीं में इसका अनुभव महसूस कर चुके होते हैं तो ऐसी स्थिति में उन पर १२वीं के छात्रों के मुकाबले कम दबाव होता है। ऐसे में एक ही दिन में दो मुख्य विषयों की परीक्षा १२वीं के विद्यार्थियों के लिए किसी संघर्ष से कम नहीं होगी। विधार्थियों का यह भी कहना है कि वह पूरे वर्ष सभी विषयों की पढ़ाई करते हैं लेकिन परीक्षा के बीच में थोड़ा समय मिलने से वे सब कुछ रिवीजन नहीं कर पाते हैं। आजकल वैसे ही अच्छे नंबर लाने की होड़ है और बच्चे बहुत प्रेशर लेते हैं और वहीं समय कम मिलने से वे बेहतर नहीं कर पाते हैं। यहां उत्तर प्रदेश सरकार को बच्चों के भविष्य को लेकर बदलाव की जरूरत है, क्योंकि ये मामला एक नहीं लाखों बच्चों के भविष्य से जुड़ा है। शिक्षा के क्षेत्र में राजनीतिज्ञों की नहीं शिक्षाविदों की राय के हिसाब से चीजें होनी चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार, आजकल कुछ बच्चे तनाव में आकर आत्महत्या तक का भी प्रयास करते हैं। शिक्षा प्रणाली को सुगम बनाने की बजाय कठिन बनाया जा रहा है, लेकिन यह स्पष्ट तौर पर गलत है। बिना वजह गुणवत्ता खराब होने से सरकार को यह समझना होगा कि शिक्षा ही एकमात्र वह हथियार है जिससे देश का भविष्य संवर सकता है। आप इस ही पर डाका डालोगे तो यह देश के नौनिहालों के साथ बेईमानी होगी। बच्चों की डिमांड रहती है कि परीक्षा के बीच का अंतराल अधिक हो। बहरहाल, उत्तर प्रदेश सरकार को इस बदलाव को करके बच्चों का तनाव कम करना चाहिए।

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