मुख्यपृष्ठनए समाचारअधूरे मंदिर का उद्घाटन अशुभ! ... लोगों को मूर्ख बना रही भाजपा

अधूरे मंदिर का उद्घाटन अशुभ! … लोगों को मूर्ख बना रही भाजपा

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की दो टूक
रामलला की प्राण प्रतिष्ठा में नहीं जाएंगे चारों शंकराचार्य
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
अयोध्या में २२ जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा है। भव्य कार्यक्रम हो रहा है और देश-विदेश से साधु-संत व अन्य गणमान्य लोग आ रहे हैं। वहीं दूसरी ओर चारों शंकराचार्यों ने इस कार्यक्रम की रूपरेखा पर सवाल उठाते हुए दूरी बना ली है। उनका कहना है कि पौष के अशुभ महीने में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा करना अशुभ है। पुरी पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती के बाद अब द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इस कार्यक्रम का खुले तौर पर विरोध किया। उत्तराम्नाय ज्योतिषपीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज ने राम मंदिर पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि राम मंदिर के उद्घाटन समारोह में चारों शंकराचार्य नहीं जाएंगे। मंदिर अभी पूरी तरह से बना नहीं है, इसलिए आधे-अधूरे मंदिर में भगवान को स्थापित किया जाना धर्म सम्मत नहीं है। उन्होंने कहा, ‘चारों शंकराचार्य वहां नहीं जा रहे हैं। ऐसे किसी राग द्वेष के कारण नहीं, बल्कि शंकराचार्य का यह दायित्व है कि वह शास्त्र विधि का पालन करें और करवाएं।’
दूसरी ओर हिंदू महासभा उत्तर प्रदेश ने शृंगेरी मठ के शंकराचार्य जगत्गुरु स्वामी भारती तीर्थ के हवाले से एक वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड किया है। इस वीडियो में दावा किया गया है कि शंकराचार्य रामलला की प्राण प्रतिष्ठा में नहीं जा रहे हैं। इसमें कहा गया है कि हिंदू समाज को मूर्ख बनाने और लोकसभा चुनाव से पहले प्रोपेगंडा खड़ा करने के लिए यह भाजपा का प्रायोजित कार्यक्रम है। इसी क्रम में एक वीडियो ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरा नंद का भी वीडियो सामने आया है।

शंकराचार्य ने उठाए सवाल
पौष के अशुभ महीने में क्यों हो रही प्राण प्रतिष्ठा?
चारों पीठों के शंकराचार्यों को कोई राग द्वेष नहीं है, लेकिन उनका मानना है कि शास्त्र सम्मत विधि का पालन किए बिना मूर्ति स्थापित किया जाना सनातनी जनता के लिए उचित नहीं है। महाराज ने कहा कि पूर्व में तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए बिना मुहूर्त के राम की मूर्ति को सन् १९९२ में स्थापित किया गया था, लेकिन वर्तमान समय में स्थितियां अनुकूल हैं। ऐसे में उचित मुहूर्त और समय का इंतजार किया जाना चाहिए। शंकराचार्य ने कहा कि निर्मोही अखाड़े को पूजा का अधिकार दिए जाने के साथ ही रामानंद संप्रदाय को मंदिर व्यवस्था की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए।

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