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मुफ्तखोरी बढ़ाएं नहीं कम करें

कविता श्रीवास्तव

हाल ही में केंद्र सरकार ने लगभग ८१ करोड़ देशवासियों को ५ किलो राशन हर माह मुफ्त देने की योजना को अगले पांच वर्षों तक जारी रखने की घोषणा की है। वर्तमान में भी इतनी बड़ी जनसंख्या को प्रतिमाह मुफ्त राशन दिया जा रहा है। यानी हमारे देश में दो तिहाई नागरिक गरीब हैं और वह सरकार की मुफ्त रसद पर अपना परिवार चलाते हैं। कागजों और आंकड़ों का सत्य तो यही है। लेकिन क्या वास्तव में इतनी बड़ी जनसंख्या गरीब है या यह वोटों की राजनीति का एक हिस्सा है, जो मुफ्तखोरी को बढ़ावा दे रहा है? वैसे मुफ्तखोरी कोई अनहोनी बात नहीं है। यह मनुष्य का स्वभाव है। कामचोरी और मुफ्तखोरी एक-दूसरे के पूरक भी समझे जाते हैं और यही हमारे विकास की बाधा भी है, जिसे राजनीतिक प्रश्रय मिलता रहता है। लेकिन यह बात सब पर लागू नहीं होती। देश में वास्तव में बहुत बड़ी जनसंख्या गरीब भी है। खासकर, ग्रामीण व आदिवासी इलाकों में आज भी विकास का अभाव, संसाधनों की कमी और गरीबी चिंतनीय है। कई जगह दौरे में मैंने गाय और भैंस के तबेलों से निकलने वाले गोबर को धोकर और छानकर लोगों को गेहूं के दाने निकालते हुए देखा है। अनाज पाने के लिए इस तरह के प्रयास से अधिक दयनीय अवस्था और क्या हो सकती है? केवल ग्रामीण इलाकों में ही नहीं शहरों में भी अत्यंत ही गरीब लोग रहते हैं। मुंबई में वर्षों पहले जब हम चालियों की बस्ती में रहते थे, तब अमूमन सबके पास राशनकार्ड होते थे। उस दौर में राशन की सरकारी दुकानों के भरोसे ही अधिकांश घरों की रसोई चला करती थी। उस जमाने में रसोई गैस भी नहीं थी। जब सरकारी दुकानों पर चावल की कोई बोरी खुलती थी तो पूरी बस्ती में खबर हो जाती थी कि अच्छा चावल आया है। लोग राशनकार्ड लेकर कतारों में लग जाया करते थे, तब निर्धारित मात्रा में कुछ-कुछ चावल सबके घर पहुंच जाता था। इसी तरह अन्य अनाज भी लोगों के घर आते थे। मुझे याद है कि तीज-त्योहारों के अवसर पर सरकार की घोषणाएं होने के बाद एकाध किलो रवा और मैदा मुफ्त भी मिल जाती थी। दिवाली या अन्य त्योहार मनाने के लिए इतना ही पर्याप्त होता था। उसी से पकवान बना लिए जाते थे। इसी तरह शक्कर, दाल, गेहूं भी सरकारी राशन की दुकान पर मिल जाया करता था। उस जमाने में पामतेल भी बहुत कीमती समझा जाता था। सबसे ज्यादा कतार और नोक-झोंक होती थी घासलेट के लिए। क्योंकि र्इंधन का सबसे बड़ा साधन केवल घासलेट ही हुआ करता था। ये सारी सामग्रियां रियायती दरों पर लेने की हमेशा से होड़ सी मची रहती थी। मैंने तो मुंबई में घासलेट के लिए तीन दिनों तक लाइन लगाने के बाद ५ लीटर घासलेट पाने का पराक्रम भी किया है। राशन की दुकानों पर तब इसी तरह की प्रतिस्पर्धा हुआ करती थी। सीमित सरकारी आपूर्ति में सभी को सामग्रियां उपलब्ध नहीं हुआ करती थीं। लेकिन आज के दौर में जब हम मेगा मॉल, डिपार्मेंटल स्टोर्स और ढेर सारी रिटेल शॉप्स पर खरीदी करते हैं, तब राशन की दुकानों की ओर जाती भीड़ हमें वह अंतर दर्शाती है जिसे गरीबी-अमीरी कहा जाता है। आज पढ़े-लिखे लोगों की संख्या बढ़ गई है और रोजगार के ढेर सारे विकल्प खुले हुए हैं। यह अलग बात है कि सबको उनकी योग्यता के अनुसार काम नहीं मिलता है। लेकिन फिर भी हर हाथ में रोजगार मिलने लगा है और लोग घर चलाने लायक तो कमा ही लेते हैं। फिर भी ढेर सारे अशिक्षित, अयोग्य और मजबूर लोग आज भी सरकार के मुफ्त राशन के भरोसे अपनी आजीविका चलाने के लिए आतुर रहते हैं। मुझे याद है कि कोई चार दशक पहले लोग अपने आसपास के गरीबों को मदद करने के लिए हाथ हमेशा आगे बढ़ाया करते थे। लेकिन आज के दौर में चैरिटी और मदद के लिए वास्तविक भावना से कहीं ज्यादा फोटो खिंचवाने की आतुरता देखी जाती है। इसलिए सरकार की ओर से जारी की गई मुफ्त अनाज की योजना वास्तविक गरीबों के लिए निश्चित ही आवश्यक है। किंतु इसकी आड़ में ढेर सारे लोग कागजों में गरीब बनकर इस मुफ्तखोरी का अनावश्यक लाभ न लेने पाएं इसके लिए भी सरकार को उपाय करना चाहिए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि लोगों को उनकी योग्यता के अनुसार रोजगार मिले। उनके आय का स्रोत बढ़े। वे सरकार की मुफ्त योजनाओं की ओर ताकने की बजाय अपनी कर्मठता के दम पर अपनी आजीविका शान से चलाएं और देश के विकास में योगदान दें।
(लेखिका स्तंभकार एवं सामाजिक, राजनीतिक मामलों की जानकार हैं।)

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