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बढ़ते कैदी, घटते कैदखाने, हाउसफुल हैं देश की जेलें! …नई जेलों के निर्माण पर सरकार का नहीं है ध्यान

यूपी और उत्तराखंड की हालत सबसे ज्यादा खराब
हिंदुस्थान में तेजी से विकास हो रहा है। नए घर, सड़कें, अस्पताल, कॉलेज, आदि पता नहीं क्या-क्या बन रहे हैं। पर कानून के शिकंजे में आए वैâदियों की दशा काफी बुरी है। इसका कारण है कि देश में पिछले कुछ समय में वैâदियों की संख्या तो काफी बढ़ी है पर वैâदखानों की संख्या घटी है। जी हां, आपने सही पढ़ा, जेलों की संख्या पहले की अपेक्षा घट गई है। सरकार ने इस ओर कोई ध्यान ही नहीं दिया।
गौरतलब है कि हिंदुस्थानी जेलें हमेशा खचाखच भरे होने के लिए जानी जाती हैं। मगर उनकी स्थिति और भी बदतर हो रही है। कुछ जेलों में तो अब क्षमता से दोगुना से भी अधिक वैâदी रखे जा रहे हैं। ‘प्रिजन स्टैटिस्टिक्स इंडिया’ की रिपोर्ट के हालिया आंकड़े दर्शाते हैं कि जेलों की निर्धारित क्षमता के मुकाबले कैदियों की मौजूदगी यानी ऑक्यूपेंसी रेट पिछले पांच वर्षों में बढ़ गई है। नतीजतन, जेल के कैदियों के खर्च में भी ४२ फीसदी का इजाफा हुआ है, जो साल २०१८-१९ के १,७७६ करोड़ रुपए से बढ़कर साल २०२२-२३ में २,५२८ करोड़ रुपए हो गया। कुल मिलाकर जेलों में औसत ऑक्यूपेंसी रेट वर्ष २०१८ में ११७.६ फीसदी से बढ़कर २०२२ में १३१.४ फीसदी हो गई। जिला कारागारों की स्थिति और भी बदतर है, जहां इस अवधि के दौरान ऑक्यूपेंसी रेट १३३ फीसदी से बढ़कर १५६.५ फीसदी हो गई। सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि यूपी के जिला कारागार सबसे ज्यादा भरे हुए हैं और वहां वैâदियों की संख्या साल २०१८ के १८३ फीसदी से बढ़कर साल २०२२ में २०७.६ फीसदी हो गई। इसके बाद उत्तराखंड आता है, जहां ऑक्यूपेंसी रेट १८२.४ फीसदी है। उसके बाद पश्चिम बंगाल (१८१ फीसदी), मेघालय (१६७.२ फीसदी), मध्य प्रदेश (१६३ फीसदी) और जम्मू-कश्मीर (१५९ फीसदी) का स्थान है। भले ही इन पांच वर्षों में कैदियों की संख्या २३ फीसदी बढ़कर ५,७३,००० हो गई मगर जेलों की संख्या १,३३९ से घटकर १,३३० हो गई है। जेलों में बंद महज कुछ वैâदी ही सजायाफ्ता हैं या जिन्हें दोषी ठहराया गया है। तीन चौथाई या हर १० में से ८ वैâदी विचाराधीन हैं। साल २०२२ में सरकार ने सभी कैदियों पर २,५२८ करोड़ रुपए खर्च किए। उनमें से १९१६.५ करोड़ रुपए विचाराधीन कैदियों पर खर्च किए गए थे।

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