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साइबर हमलों को लेकर दुश्मनों के निशाने पर हिंदुस्थान! …पिछले दो सालों में २७८ फीसदी की हुई बढ़ोतरी

• हिंदुस्थान की साइबर सुरक्षा साबित हो रही है कमजोर
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
साइबर हमलों को लेकर एक चौकानेंवाली जानकारी सामने आई है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि साइबर हमलों को लेकर भारत विश्व स्तर पर सबसे अधिक लक्षित देश है, जो सभी साइबर हमलों में से १३.७ प्रतिशत का सामना करता है। इस बात का दावा सिंगापुर स्थित साइबर सुरक्षा फर्म साइफर्मा की एक रिपोर्ट में किया गया है। बताया जा रहा है कि साल २०२१ से सितंबर २०२३ के बीच भारत के खिलाफ विदेशी सरकार-प्रायोजित साइबर हमलों में २७८ फीसदी की वृद्धि हुई है, जिसमें सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) और बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग (बीपीओ) फर्मों सहित सेवा कंपनियों में हमलों की हिस्सेदारी सबसे अधिक देखी गई है। हिंदुस्थान में जहां डिजिटलीकरण ने साइबर सुरक्षा की आवश्यकता को तेज कर दिया है, वहीं भारत के साइबर सुरक्षा नियम कमजोर और अपर्याप्त साबित हो रहे हैं।
पाकिस्तान और चीन से हो रहे हैं हमले
साइफर्मा के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी कुमार रितेश कहते हैं कि २०१५-१६ में भारत पर ५८-५९ फीसदी साइबर हमले पाकिस्तान या मध्य पूर्व के ऑपरेटरों से थे। आज केवल ६.४ फीसदी हमले पाकिस्तान या उनके सहयोगियों से हैं, जबकि ७९ फीसदी हमले चीन से हैं। उन्होंने कहा कि जिस तरह के परिष्कृत साइबर अपराधियों के खिलाफ भारत मुकाबला कर रहा है, उसे देखते हुए उसे साइबर सुरक्षा नीतियों के बेहतर कार्यान्वयन और विशेष रूप से एसएमई और स्टार्टअप के बीच अधिक जागरूकता की आवश्यकता है।
भारत की साइबर सुरक्षा कमजोर
इतने हमलों को देखते हुए यह कहा जा रहा है कि भारत की साइबर सुरक्षा कमजोर और नाकाम साबित हो रही है इसे और भी अपग्रेड करने की जरूरत है। पिछले साल ३० नवंबर को इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की वेबसाइट को २४ घंटे में हैकिंग के लगभग ६,००० प्रयासों का सामना करना पड़ा था। यह अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के पांच सर्वरों को रैनसमवेयर द्वारा हैक किए जाने के एक सप्ताह बाद हुआ था। अनुमानित १.३ टेराबाइट डेटा एन्क्रिप्ट किया गया था। हैकर्स ने एम्स के लिए अपने ही डेटा तक पहुंच को असंभव बना दिया था। यही नहीं ३१ अक्टूबर २०२३ को बड़े पैमाने पर हुए एक डेटा उल्लंघन में आईसीएमआर के पास मौजूद ८१.५ करोड़ से अधिक भारतीयों की जानकारी डार्क वेब पर बेच दी गई थी।

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