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‘इंडिया’ ने मारी जबरदस्त बाजी :  सपा, टीएमसी, कांग्रेस और जेएमएम की जीत … भाजपा के ताबूत में एक और कील!


•  उपचुनाव में ही उखड़ी पार्टी

• प्रधानमंत्री की लगातार १० वीं हार
• घोसी में कमल ने चाटी धूल
• पश्चिम बंगाल में दीदी ने दिया दम
• केरल और झारखंड में भी जमींदोज
• त्रिपुरा और उत्तराखंड ने बचाई लाज
• लगातार हार से बगावत की सुगबुगाहट

सामना संवाददाता / नई दिल्ली
छह राज्यों की सात विधानसभा सीटों के लिए हुए उपचुनाव के परिणाम कल सामने आ गए। केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की तानाशाही के खिलाफ एकजुट हुए देश के २८ प्रमुख विपक्षी दलों के ‘इंडिया’ गठबंधन की पहली चुनावी परीक्षा माने जा रहे इस चुनाव में इंडिया गठबंधन को उल्लेखनीय सफलता मिली। इन उपचुनावों में परिणाम ४-३ से ‘इंडिया’ गठबंधन के पक्ष में रहा! इसमें ‘इंडिया’ गठबंधन ने जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए ४ सीटें जीतीं जबकि एनडीए को ३ सीटें मिलीं। उपचुनाव में भाजपा उखड़ गई। ये उपचुनाव २०२४ में होनेवाले आम चुनावों की तैयारियों में लगी भाजपा के ताबूत में एक और कील माने जा रहे हैं।
बता दें कि यूपी, प. बंगाल, झारखंड़, उत्तराखंड और केरल की एक-एक जबकि त्रिपुरा की दो विधानसभा सीटों के लिए हुए उपचुनाव के तहत मंगलवार को हुए मतदान के बाद कल नतीजे घोषित किए गए। इन उप चुनावों के परिणामों को साल के अंत तक संभावित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव और २०२४ के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के खिलाफ विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन की परीक्षा के तौर पर देखा गया था। इस उपचुनाव में पश्चिम बंगाल में टीएमसी ने भाजपा से सीट छीनी तो वहीं यूपी में सपा अपनी सीट (घोसी) बरकरार रखने में सफल रही। इसी तरह केरल में कांग्रेस पार्टी ने और झारखंड में जेएमएम ने जीत दर्ज करके भाजपा को उसकी हैसियत बता दी। हालांकि, उत्तराखंड और त्रिपुरा में भाजपा अपनी एक-एक सीट बचाने में सफल रही तो वहीं त्रिपुरा में ही सीपीआई (एम) से एक सीट भाजपा ने छीन ली। यूपी के घोसी निर्वाचन क्षेत्र में उपचुनाव में ‘इंडिया’ ने संयुक्त मोर्चा बनाया था। घोसी विधानसभा उपचुनाव में सपा के सुधाकर सिंह ने भाजपा के दारा सिंह चौहान को रिकॉर्ड ४२,७५९ वोटों से शिकस्त दी। अखिलेश यादव ने इस जीत को जनता की जीत बताया है। २०२२ में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान सपा के टिकट से विजयी हुए प्रमुख ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) नेता दारा सिंह चौहान के हाल ही में भाजपा में शामिल होने और पार्टी की सदस्यता से त्यागपत्र देने के कारण घोसी सीट खाली हुई थी। भाजपा ने उपचुनाव में दारा चौहान को ही अपना उम्मीदवार बनाया, जबकि सपा ने सुधाकर सिंह को मैदान में उतारा था। घोसी विधानसभा क्षेत्र का उपचुनाव विपक्षी दलों के समूह ‘इंडिया’ के गठन के बाद राज्य में होने वाला पहला चुनाव है, इसलिए इसे अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव का पूर्वाभ्यास भी माना जा रहा है। केरल में कांग्रेस के चांडी ऑमान ने ३७,००० से ज्यादा वोटों के अंतर से ण्झ्घ् (श्) के जैक सी थॉमस को पुथुपल्ली सीट से हरा दिया। कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री ओमान चांडी के निधन के बाद यह सीट खाली हुई थी। कांग्रेस ने इस सीट पर ओमान चांडी के बेटे चांडी ऑमान को मैदान में उतारा था।
इसी तरह डुमरी विधानसभा में ‘इंडिया’ और एनडीए के बीच सीधी टक्कर देखने को मिली। अप्रैल में पूर्व शिक्षा मंत्री और जेएमएम विधायक जगरनाथ महतो की मृत्यु के बाद इस सीट पर उपचुनाव कराने की जरूरत पड़ी है। महतो २००४ से ही इस सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। डुमरी विधानसभा सीट पर विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की उम्मीदवार बेबी देवी का सीधा मुकाबला एनडीए की उम्मीदवार यशोदा देवी से माना जा रहा था। जेएमएम के इस दावे के बीच कि ‘इंडिया’ अपनी जीत की यात्रा डुमरी से शुरू की, यह सीट दोनों गठबंधनों के लिए प्रतिष्ठा का विषय बन गई थी। वैâबिनेट मंत्री चंदन रामदास का इस साल अप्रैल में बीमारी के कारण निधन हो जाने की वजह से इस सीट पर उपचुनाव कराया गया। उपचुनाव में प्रदेश में दो राजनीतिक दलों भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिला। भाजपा ने यहां चंदन राम दास की पत्नी पार्वती दास को उम्मीदवार बनाया, जबकि कांग्रेस ने बसंत कुमार को अपना प्रत्याशी बनाया।
इसी तरह कम्युनिस्टों के गढ़ रहे त्रिपुरा की धानपुर और बोक्सानगर विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुआ। भाजपा के तफ्फजल हुसैन का अल्पसंख्यक बहुल बोक्सानगर निर्वाचन क्षेत्र में सीपीएम के मिजान हुसैन से मुकाबला था। हुसैन फरवरी में विधानसभा चुनाव में इस सीट से हार गए थे। यह सीट अब भी वामदल की मजबूत पकड़ मानी जाती है। धानपुर निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा के बिंदु देबनाथ और सीपीएम के कौशिक देबनाथ के बीच सीधा मुकाबला हुआ है। बोक्सानगर विधानसभा सीट पर उपचुनाव माकपा विधायक समसुल हक के निधन के बाद जरूरी हो गया। वहीं, केंद्रीय मंत्री प्रतिमा भौमिक के धानपुर के विधायक पद से इस्तीफा देने के बाद इस सीट पर उपचुनाव कराने पड़े। धुपगुड़ी विधानसभा सीट पर विपक्षी गठबंधन की एकजुटता देखने को मिली।
नहीं चली राष्ट्रवाद भुनाने की चाल
धर्म और राष्ट्रवाद के नाम पर भावनाओं को भुनाने में माहिर भाजपा की चाल प. बंगाल में नहीं चली। विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन को धुपगुड़ी विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव में महत्वपूर्ण परीक्षा का सामना करना पड़ा, क्योंकि इसके अहम घटक टीएमसी और कांग्रेस-सीपीएम गठजोड़, भाजपा से उत्तर बंगाल की इस ग्रामीण सीट को छीनने के लिए एक-दूसरे के खिलाफ लड़ रहे थे। इस साल की शुरुआत में भाजपा विधायक बिशु पदा रे के निधन के बाद हो रहे उपचुनाव उपचुनाव तीनों राजनीतिक दलों के लिए परीक्षा की तरह थे, जिसमें भाजपा को अपने वोट प्रतिशत में गिरावट को रोकने और सीट बरकरार रखने की उम्मीद है। वहीं, टीएमसी का लक्ष्य आदिवासी बहुल विधानसभा क्षेत्र पर कब्जा करना है और सीपीएम-कांग्रेस गठबंधन को अपनी पारंपरिक सीट दोबारा हासिल करने की उम्मीद थी। हालांकि भाजपा ने आतंकी हमले के शहीद जगन्नाथ राय की पत्नी तापसी को टिकट दिया था। इसके बाद भी टीएमसी ने प्रोफेसर निर्मल चंद्र
रॉय को उम्मीदवार बनाया था। सीपीएम ने पेशे से शिक्षक ईश्वर चंद्र रॉय को इस सीट से मैदान में उतारा था।

भाजपा को हराया जा सकता है
इन उपचुनावों ने एक बार फिर यह साबित किया है कि भाजपा को हराया जा सकता है। साम, दाम, दंड़, भेद की नीति अपनाकर तथा विपक्ष के नेताओं को केंद्रीय एजेंसियों के जरिए बदनाम करने, जेल में डालने का डर दिखाकर तोड़ने और अपने साथ मिलाने या खत्म करनेवाली भाजपा भले ही दुनिया और देश की सबसे बड़ी सियासी पार्टी बन गई है लेकिन इन उपचुनावों से यह साबित हो गया है कि भाजपा को भी हराया जा सकता है। इससे पहले पंजाब, कर्नाटक विधानसभा चुनाव, जबकि इसी साल के प्रारंभ में महाराष्ट्र के पुणे की कस्बापेठ, पश्चिम बंगाल की सागरदीघी सीट, तमिलनाडु: ईरोड सीट पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। तब पांच राज्यों में ६ सीटों पर हुए उपचुनावों में कांग्रेस को सिर्फ २ सीटो से सतोष करना पड़ा था। भाजपा के लिए सबसे शर्मनाक साबित हुए दिल्ली नगर निगम का चुनाव, जिसके लिए भाजपा ने बहुतेरे प्रपंच रचे थे। भाजपा में पीएम मोदी के बाद नंबर दो की हैसियत रखनेवाले केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सदन में खड़े होकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को चुनौती दी थी।

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