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भारतीयता का शृंगार है परिवार

कविता श्रीवास्तव।  स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के अवसर पर ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए हमारे प्रधानमंत्री ने भाई-भतीजावाद और परिवारवाद पर करारा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से राजनीतिक क्षेत्र की परिवारवाद की बुराई ने हिंदुस्थान की हर संस्थाओं में परिवारवाद को पोषित कर दिया है। वह अनेक संस्थाओं को अपने में लपेटे हुए है। उसके कारण देश की प्रतिभाओं को नुकसान होता है। सामर्थ्य को नुकसान होता है, जिनके पास अवसर की संभावनाएं हैं, वो परिवारवाद, भाई-भतीजावाद के कारण बाहर रह जाते हैं।
प्रधानमंत्री जी की चिंता एक विचारणीय विषय है। क्योंकि परिवारवाद तो सचमुच हर क्षेत्र में है। उद्योगपति का बेटा उद्योगपति बनता है। फिल्मी हस्तियों की संतानें फिल्मों में भविष्य बनाती हैं। व्यापारी के बच्चे अपने अभिभावकों का व्यापार संभालते हैं। यह सब पीढ़ी दर पीढ़ी चलता आ रहा है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि कोई अन्य प्रतिभावान व्यक्ति चाहे तो उद्योगपति, फिल्मी हस्ती या व्यापारी नहीं बन सकता। हमारा नियम-कानून, हमारा संविधान तो सबको अपने-अपने भविष्य की राह चुनने और सफल होने की पूरी इजाजत देता है। हमारी व्यवस्थाएं किसी योग्य व्यक्ति को किसी क्षेत्र में सकारात्मक काम करने से नहीं रोकतीं। ऐसे अनगिनत लोग हैं, जिन्होंने अपनी योग्यता और परिश्रम के बल पर लगभग हर क्षेत्र में चोटी का मुकाम बनाया है। उद्योग-धंधे, कला, राजनीति से लेकर शासन-प्रशासन और विदेशों में भी देश का आम इंसान सफलता के शिखर तक पहुंचा है। यदि हम केवल राजनीति की बात भी करें तो ढेर सारे युवा अपने परिवार से ही सीख लेकर नए जोश से सफल हुए हैं। यदि कोई व्यक्ति किसी राजनीतिक परिवार से ही आता है और आम लोग उसे पसंद करके अपना जनप्रतिनिधि चुनते हैं, तो इसमें आपत्ति क्यों? क्या किसी परिवार का हिस्सा होना उसका गुनाह है? जिस क्षेत्र से उसका परिवार जुड़ा है, उसी क्षेत्र में अपना भविष्य बनाना क्या गलत है? किसी व्यक्ति को किसी काम से रोकने का यह तो कारण नहीं होना चाहिए कि इससे उसका परिवार जुड़ा है! यह तो उस व्यक्ति के साथ भी अन्याय ही होगा।
हमारे देश में सदियों से परिवारों की संस्कृति और परंपरा रही है। परिवार का होना अपने आप में सौभाग्य है। परिवार तो भारतीयता का सौंदर्य है। सांस्कृतिक धरोहर है। भारतीय समाज का मजबूत आधार है। परिवार विश्वास है। संस्कृति का पोषक है। हमारा असली दुर्भाग्य तो यह है कि आज के युग में बिखरते परिवार और टूटते पारिवारिक रिश्ते हमारी सामाजिकता की पीड़ा बनते जा रहे हैं। सामाजिक अनुशासन और तहजीब की कमी होने की एक वजह यह भी है। आज हर जगह परिवार के साथ रहने, परिजनों के साथ अधिक समय बिताने, परस्पर स्नेह भाव बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। बड़े-बुजुर्गों का आदर-सत्कार करने की सीख दी जाती है। अच्छे और संयुक्त परिवारों के आपसी तालमेल, परस्पर सामंजस्य और एकता के उदाहरण दिए जाते हैं। ऐसे में परिवारवाद को लेकर प्रधानमंत्री जी की चिंता कुछ और है। उसका मूल राजनीति से ही जुड़ा है। प्रधानमंत्री परिवारवाद को भी भ्रष्टाचार की वजह गिनाते हैं। उनके इस तर्क से कितने लोग सहमत हैं, यह अलग बात है। लेकिन भ्रष्टाचार सच में समूल समाप्त होना चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं है। भ्रष्टाचार को लेकर सबमें नफरत हो यह भी सही बात है। भ्रष्टाचार हमारी जड़ों को खोखला करता जा रहा है। यह हम बचपन से सुनते आए हैं। लेकिन भ्रष्टाचार केवल हिंदुस्थान में है, ऐसा तो नहीं। सारी दुनिया में लोग इससे परेशान हैं। क्योंकि यह मनुष्य की फितरत का एक हिस्सा है। सब भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते जरूर हैं। पर बहुत कम लोग इससे बच पाते हैं। हमारे देश में भ्रष्टाचार का मजबूत बोलबाला है। समय पड़ने पर अपने काम की गति बढ़ाने के लिए, निजी लाभ के लिए अथवा व्यवस्था से कुछ अलग पाने के लिए लोग अपना आचरण भ्रष्ट करने से नहीं चूकते। परिवारवाद इसका एक कारण हो सकता है। लेकिन भ्रष्टाचार का वह अकेला कारण नहीं होगा। यह भी दावा नहीं किया जा सकता है कि परिवारवाद खत्म होने से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। हां, यह जरूर होगा कि जो पारिवारिक सौंदर्य हम समाज में देखते हैं, बारंबार मुद्दा उछालने से उसमें शक की सुई घुस जाएगी। इसी से परिवार शक के घेरे में आएंगे और यही राजनीति का दांव है। हमारे देश में परिवारों ने देश पर शासन भी किया है और देश को बहुत कुछ दिया भी है। हर क्षेत्र में अच्छे परिवार गिनाए जा सकते हैं, जिनका देश के विकास और आम जनता की उन्नति में मजबूत योगदान है। हम ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की संस्कृति का अनुसरण करते आए हैं। इसका अर्थ है- पूरी धरती ही एक परिवार है। यही हमारी परंपरा है और यही हमारी विचारधारा का आधार है। हमारी भारतीय सांस्कृतिक परंपरा और वेद पुराण, उपनिषद, श्रुतियां हमारी जीवनशैली के प्रेरणास्रोत हैं।
उपनिषद में श्लोक है…
अयं बंधुरयं नेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम।।
यह श्लोक कई ग्रंथों में लिपिबद्ध भी है। यही हमारे देश के संसद के प्रवेश कक्ष पर भी अंकित है। इसका अर्थ है- यह अपना मित्र है और यह नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वाले लोगों की तो संपूर्ण धरती ही परिवार है। यह हमारा है, यह पराया है। ऐसा सोचना संकुचित विचार है। उदारवादियों के लिए तो अखिल विश्व परिवार है।
यदि हम व्यक्ति आधारित आकलन करें तो समाज में हर किसी का जन्म और पालन-पोषण किसी परिवार में होता है। उसमें संस्कार, आचार, व्यवहार उसके परिवार की सीख से आते हैं। हमारी सांस्कृतिक विरासत अगली पीढ़ी को हस्तांतरित होती है। व्यक्ति का परिचय भी उसके परिवार और कुल के आधार पर होता है। पारिवारिक पृष्ठभूमि से व्यक्ति एक अनुशासन व्यवस्था में समूह के रूप में रहने की सीख पाता है।
ताजा सवाल यह है कि लोकतांत्रिक पद्धति से चलने वाले देश में परिवारवाद या वंशवाद हो या नहीं? लोकतांत्रिक ढांचे के अनुसार परिवारवाद होने की कोई संवैधानिक रोक नहीं है। हिंदुस्थान ही नहीं अनेक मुल्कों में राष्ट्राध्यक्ष या वहां की सरकार में प्रमुख पदों पर एक ही परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी रहे हैं। लेकिन वे विधिवत चुनाव जीतकर आते रहे हैं। क्या लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुनकर आया हुआ वह परिवारवाद या वंशवाद भी अवैध है? भारतीय लोकतंत्र में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व अन्य पदों के लिए चुनाव की व्यवस्था है। हमारे राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री अपने पद पर किसी परिवार या वंश के प्रतिनिधि नहीं होते। वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने जाते हैं। संसद में भी लोग आम जनता द्वारा चुनकर ही भेजे जाते हैं। फिर भी, यह सच है कि देश की विभिन्न पार्टियों में परिवारवाद हावी है। राजनीति से जुड़े कई परिवारों का वंशवाद हम देखते आ रहे हैं। अन्य दलों की छोड़िए स्वयं भारतीय जनता पार्टी के अनेक बड़े नेताओं की अगली पीढ़ी भी सक्रिय राजनीति में है। पार्टी ने उन्हें भी पद और प्रतिनिधित्व दिया है। यह भी तो परिवारवाद है। जरूरी यह है कि विश्लेषण इस पर हो कि राजनीति में रहकर लोक कल्याण और राष्ट्रीय विकास हेतु समर्पित सेवा करने का किसका दावा कितना सही है। कोई अकेले आए या राजनीतिक परिवार से आए कोई हर्ज नहीं। वह केवल अपने परिवार का न होकर अपनी आम जनता का सच्चा प्रतिनिधि सिद्ध हो यह आवश्यक है। देश में ऐसा ही माहौल बने। स्वार्थ और द्वेष की राजनीति से हम बचें। क्योंकि लोकतंत्र का मूल उद्देश्य ही जन-कल्याण ही है।
(लेखिका स्तंभकार एवं सामाजिक, राजनीतिक मामलों की जानकार हैं।)

(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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