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महंगाई ने किया पस्त : आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया!

-घट रही है परिवारों की जमा पूंजी
-२०२३ में २.१ प्रतिशत की गिरावट दर्ज

देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती के दावे और ५ ट्रिलियन की इकोनॉमी बनाने के दावे के बीच हिंदुस्थानी परिवारों की कमाई घट रही है। बढ़ते खर्च के बीच अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए ये परिवार उधारी ले रहे हैं। हालांकि, उधार लेना कोई नई बात नहीं है पर इस साल यह उधारी काफी बढ़ गई है। दूसरी तरफ कमोबेश परिवारों में बचत करने की आदत भी काफी पहले से है। मगर हाल ही में आई एक वित्तीय रिपोर्ट बताती है कि परिवारों द्वारा की जानेवाली बचत में काफी गिरावट आई है। अगर पूरे देश में परिवारों द्वारा की जानेवाली बचत पर गौर करें तो यह कई लाख करोड़ रुपए होता है। मगर इस वक्त पारिवारिक बचत दशकों के निचले स्तर पर पहुंच गई है।
बढ़ती महंगाई ने हर किसी को परेशान कर दिया है। आमदनी के मुकाबले खर्चे काफी बढ़ गए हैं। जरूरी खाने-पीने के सामान के दाम रोजाना बढ़ रहे हैं। अनाज से लेकर सब्जियों तक के दाम असमान पर हैं। हालत यह है कि लोगों को घर चलाना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में आम परिवारों के लिए जिंदगी की जद्दो-जेहद काफी बढ़ गई है। उन्हें अपने आवश्यक खर्चे पूरे करने के लिए उधारी लेनी पड़ रही है। इसका असर परिवारों द्वारा किए जानेवाली बचत पर पड़ा है।
आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक, पारिवारिक बचत वित्त वर्ष २०२३ में जीडीपी के ५.१ फीसदी पर पहुंच गई, जबकि यह वित्त वर्ष २२ में ७.२ प्रतिशत थी। यानी इस साल इसमें २.१ प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। उधर परिवारों की सालाना वित्तीय देनदारियां बढ़कर वित्त वर्ष २३ में जीडीपी की ५.८ प्रतिशत पर पहुंच गई जबकि यह वित्त वर्ष २०२२ में ३.८ प्रतिशत थी। वित्त वर्ष २१ में पारिवारिक शुद्ध बचत २२.८ लाख करोड़ रुपए थी। यह वित्त वर्ष २०२२ में गिरकर १६.९६ लाख करोड़ हो गई थी और फिर वित्त वर्ष २३ में गिरकर १३.७६ लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गई। इसके वितरीत पारिवारिक उधारी में वृद्धि हुई। वित्तीय देनदारी के रूप में मापे जाने वाला परिवार का कर्ज उल्लेखनीय रूप से उच्च स्तर पर बना हुआ है। यह वित्त वर्ष २३ में जीडीपी के ३७.६ प्रतिशत पर पहुंच गया था जो वित्त वर्ष २२ में ३६.९ प्रतिशत था। इससे यह संकेत मिलता है कि परिवार अपनी उपभोक्ता जरूरतों को पूरा करने के लिए उधारी को बढ़ा रहे हैं। आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक स्वतंत्रता के बाद दूसरी बार बीते वित्त वर्ष में वित्तीय देनदारियों का प्रतिशत बढ़ा था और इससे पहले २००६-०७ में ६.७ प्रतिशत था। बचत कम होने और उधारी बढ़ने का प्रमुख कारण बढ़ती महंगाई की तुलना में पारिवारिक आमदनी का स्थिर या कम होना है।
३२ घरेलू बैंकों ने बढ़ाया कर्ज पर ब्याज दर
आरबीआई जब भी रेपो रेट बढ़ाती है, कर्ज का बोझ बढ़ जाता है। महंगे कर्ज का भार ग्राहकों को उठाना पड़ता है। रेपो रेट में वृद्धि के कारण ३२ घरेलू बैंकों ने कर्ज पर ब्याज दर बढ़ाया है। गौरतलब है कि नीतिगत दर में मई २०२२ से लगातार वृद्धि हो रही है। ऐसे में ८ प्रतिशत से कम ब्याज वाले कर्ज का प्रतिशत तेजी से गिरा है। आरबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक ८ प्रतिशत से कम ब्याज पर मार्च २०२२ में ५३ प्रतिशत ऋण था, जो जून २०२३ में घटकर १८ प्रतिशत रह गया। बैंकों के ऋण में १० प्रतिशत या इससे ज्यादा ब्याज दर वाले ऋण की हिस्सेदारी इस अवधि के दौरान २२ प्रतिशत से बढ़कर ३४ प्रतिशत हो गई है। इससे मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) द्वारा नीतिगत रेपो रेट में २५० आधार अंक की बढ़ोतरी के असर का पता चलता है। रेपो रेट में वृद्धि के कारण ३२ घरेलू बैंकों ने कर्ज पर ब्याज दर बढ़ाया है, जो उनके रेपो से जुड़े बाहरी मानक पर आधारित उधारी दर से संबंधित था और उसी के अनुपात में दर में बढ़ोतरी कर दी गई है। इसके साथ ही ७ प्रतिशत और इससे ज्यादा ब्याज वाली सावधि जमा की पेशकश बढ़ी है। परिणामस्वरूप सावधि जमा की वृद्धि को बल मिला है और बचत खातों में राशि कम हुई है। मई २०२२ और जुलाई २०२३ के बीच जब इन बदलावों पर नजर डालें तो पता चलता है कि सरकारी बैंकों ने रुपए में नई जमा के लिए भारित औसत घरेलू सावधि जमा दर और रुपए में नए कर्ज पर भारित औसत उधारी दर में ज्यादा वृद्धि की है।

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