मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनापारंपरिक कृतियों के सर्जक!

पारंपरिक कृतियों के सर्जक!

पंकज तिवारी। `कोई चीज जो हमारे हाथ से छूट जाती है, अमूल्य एवं महान हो जाती है। जब तक हमारे पास होती है, आसानी से उपलब्ध होती है। उसकी उपयोगिता कम ही आंकी जाती है, लोग उसके महत्व को कम समझ पाते हैं। मिनिएचर पेंटिंग (लघु चित्रकारी) के साथ भी कुछ ऐसा ही है। समय चक्र घूमता रहता है मिनिएचर का समय जल्द ही फिर लौटेगा।’ पारंपरिक मिनिएचर कलाकार परिवार से संबंध रखनेवाले वीरेंद्र बन्नू के ये वाक्य वाकई विचार करने योग्य हैं। हम अपनी विरासत को संभाल पाने में इतने कमजोर क्यों हैं? अपनों से दूरी का कारण क्या है? जबकि वही बाहरी हेतु अमूल्य है। वीरेंद्र बन्नू अपने मिनिएचर कला के पारंपरिक कलाकार परिवार में सातवीं पीढ़ी पर हैं और निरंतर सृजनशील हैं। उनके पिता बेदपाल शर्मा जो बन्नू जी के नाम से प्रसिद्ध हुए, को मिनिएचर का गुरु कहा जाता था, जिन्होंने मिनिएचर में नए-नए प्रयोग किए, एक नई शैली ‘बन्नू शैली’ को जन्म दिया। उनके परदादा मोहनलाल जी जयपुर दरबार से सेवानिवृत्त होनेवाले आखिरी कलाकार रहे, पहले भी उनके परिवार के लोग राज दरबार में चित्रकार हुआ करते थे।
मिनिएचर का काम इस समय लगभग कम हो गया है। कारण यह काम बहुत ही धीरज का होता है। इसमें रंग, पेपर आदि के बारे में गहरी जानकारी होनी चाहिए। पेंसिल, ब्रश चलाना आना चाहिए, उसका चुनाव आना चाहिए। इसे सीखने के साथ ही रियाज में भी पर्याप्त समय चाहिए, जो आज लगभग नए लोगों के पास नहीं है। पहले मिनिएचर का काम जहां होता था, उसे कारखाना बोला जाता था जहां पर मुख्य कलाकार ड्राइंग बनाता था। कोई दूसरा उसमें रंग भरता था, कोई उसमें पेड़ बना रहा होता था, कोई शरीर में रंग भर रहा होता था, कोई कपड़ा, ऐसा करते हुए फिर अंत में मुख्य कलाकार के पास आता था, वह उसमें फाइनल टच देता था। इस तरह कई हाथों से गुजरने के बाद कलाकृति पूरी होती थी इसीलिए उसे कारखाना बोला जाता था।
बचपन से ही पिता जी को पेंटिंग करते हुए देखना साथ ही रंग घोंटना, ट्रेस करना, कह सकते हैं कि उनकी ट्रेनिंग बचपन से ही शुरू हो चुकी थी। बड़ी-बड़ी ओरिजनल कृतियों को हाथ में लेकर देखना कितनी खुशी भर जाता था, कहना मुश्किल है। राजस्थान कॉलेज ऑफ आर्ट में दाखिला के बाद मॉडर्न आर्ट की तरफ लोगों का रुख देखने के बाद भी मिनिएचर पर ही अडिग रहना और उसमें भी बहुत कुछ नया करना, विशेषत: आकृतियों के आभूषणों में, आपके लिए बहुत फायदेमंद रही। हालांकि कोर्स वर्क करने का फायदा ये रहा कि वहां से कुछ विशेष वे अपने कृतियों में ला सके हैं। उनके विषय अधिकतर पुराने हैं, पर आधुनिकता के साथ हैं। कृति ‘आधुनिका’ में केश, आभूषण के साथ ही चश्मे का संयोजन समय के साथ हो रहे नयेपन को दर्शाता है जबकि ‘लेडीज फर्स्ट’ में अब तक के हुए सबसे बड़े बदलाव को दिखाया गया है, गाड़ी नायिका चला रही है और नायक पीछे बैठा हुआ है वो भी नींबू-मिर्च के संयोजन के साथ। उनकी कृतियां मिनिएचर होते हुए भी संदेशप्रद हैं। लघु को दीर्घाकार में भी करने का प्रयास वे लगातार करते रहे हैं। हालांकि उनके पहले पीढ़ी में भी हुआ था। छ: से आठ फीट बड़े चित्र प्राकृतिक रंगों के साथ ही तैल रंगों में भी वे बनाते रहे हैं। कॉटन के कपड़े पर खड़िया के साथ तैयार पेपर पर तैल से पारंपरिक मिनिएचर के काम करना आपकी विशेषता है। एक्रेलिक, ऑयल, वैâनवास, पेपर, कपड़े, शीशे लगभग हर विधा और हर धरातल पर उन्होंने काम किया है। कई बड़े होटल्स में उनके काम प्रदर्शित हैं। माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा उनकी कृतियां दूसरे देशों में उपहार स्वरूप भेंट की गई हैं, जो भारतीय संस्कृति की झलक के साथ निर्मित थीं। २५ जनवरी १९६४ को जयपुर में पैदा हुए वीरेंद्र बन्नू की कृतियां `चाइना आर्ट फेस्टिवल’, २०१५ में प्रदर्शित हुर्इं, पहले अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर कला और संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित `योग चक्र’ प्रदर्शनी में भी प्रदर्शित हुर्इं। उनके द्वारा तैयार झांकी को २६ जनवरी १९९६ में दिल्ली में प्रदर्शित किया गया, जहां वो पुरस्कृत भी हुई। राजस्थान ललित कला अकादमी, जयपुर कला मेला, जवाहर कला केंद्र, जहांगीर आर्ट गैलरी आदि जगहों पर आप प्रदर्शित एवं पुरस्कृत भी हुए। कुवैत संग्रहालय, सिख संग्रहालय ओंटारियो, नेपाल आर्ट गैलरी सहित उनकी कृतियां भारतीय एवं विदेशी संग्रह में संरक्षित हैं।

अन्य समाचार