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शिलालेख: सृष्टि आनंद से भरी पूरी है

ह्रदय नारायण दीक्षित 

सत्य, शिव और सौंदर्य अस्तित्व का प्रसाद हैं। प्रसन्न होने के लिए यह सब पर्याप्त है। मनुष्य ने प्रत्यक्ष रूप में बड़ी उन्नति की है। भौतिक ज्ञान व्यापक हुआ है। विज्ञान के क्षेत्र में आश्चर्यजनक शोध हुए हैं। भारतीय दर्शन में आनंदमय चिंतन के शाश्वत सूत्र हैं। कला और सौंदर्यबोध भी शिखर पर हैं। सुख, स्वस्ति और आनंद भी अविरल प्रवाहमान हैं। लेकिन पश्चिम प्रेरित आधुनिकता ने जीवन को प्रतिस्पर्धी बनाया है। प्रतिस्पर्धी जीवन के प्रभाव में आनंद के स्रोत व्यक्ति को आश्वस्ति नहीं देते। प्रसन्न रहना और प्रसन्न होना सभी व्यक्तियों का मौलिक अधिकार है। प्रसन्नता सहज सुलभ है। लेकिन प्रसन्नता के सूचकांक में दुनिया के तमाम देशों की स्थिति चिंताजनक है। पश्चिम प्रेरित आधुनकिता में धन और भौतिक संसाधनों को संग्रह करने की प्रतिस्पर्धा है। व्यक्तिवाद बढ़ा है। सामाजिक उल्लास के लिए सामूहिक जीवन की आवश्यकता होती है। सामाजिक उल्लास की परंपरागत व्यवस्था का नाम उत्सव है। अकेला व्यक्ति प्रसन्न नहीं हो सकता। एकाकी व्यक्ति उत्सवों का आयोजन भी नहीं कर सकता। उत्सवों के आनंद घटे हैं।

जीवन में प्रसाद का अभाव है और अवसाद का प्रभाव। अवसाद वस्तुत: पराजित मानसिकता का परिणाम है। मित्रता सुख देती है। मित्र परस्पर सुख-दुख बांटते हैं। लेकिन मित्रता भी स्वार्थ निरपेक्ष नहीं है। एकाकी होने में दुख है। एकाकी अनुभव होने में और ज्यादा दुख है। बृहदारण्यक उपनिषद में सृष्टि के विकास का सुन्दर वर्णन है। ऋषि कहते हैं, ‘पहले वह अकेला था। अकेला होने के कारण उसे आनंद नहीं मिला। उसे अकेले में आनंद नहीं आया।’ आकार में सबसे बड़ी वृहदारण्यक उपनिषद् शतपथ ब्राह्मण का एक हिस्सा है। इसका अध्ययन विचारोत्तेजक है। इसमें सृष्टि सृजन के सम्बंध में कहते हैं, ‘पहले केवल आत्मा था। वह अकेला था-अह्मस्मि। बताते हैं कि वह भयभीत हुआ। उसने चारों ओर देखा। दूसरा कोई नहीं था। दूसरा कोई नहीं तो डर वैâसा। वह निर्भय हो गया।’ इसका संदेश सुस्पष्ट है। आत्मबोध निर्भय बनाता है। आगे बताते हैं, ‘उस अकेले को आनंद नहीं आया-स वै नैव रैमे तस्मात् एकाकी न रमते।’ वैसे भी अकेले को आनंद नहीं आता। एक कोई और हो तो अच्छा लगता है। उसने एक और की इच्छा की। उसने स्वयं को विभाजित कर दिया। वह एक से दो हो गया।

आत्मविश्वास का संकट भी अंतर्मन को आहत करता है। तनाव भी दुख के लिए उत्तरदायी है। अवसाद से अनेक बीमारियां भी बढ़ती हैं। इसका उल्टा भी होता है। लंबे समय की बीमारी भी अवसाद बढ़ाती है। अवसाद एक विशेष प्रकार की मनोदशा है। इस मनोदशा में स्वयं पर विश्वास नहीं रह जाता। आत्मविश्वास की कमी अवसाद को और भी बढाती है। इसके प्रभाव की गंभीरता को देखते हुए २०२१ में जापान में मिनिस्ट्री ऑफ लोनलिनेस मंत्रालय बनाया गया। इस मंत्रालय का उद्देश्य लोगों को अवसाद की दशा से मुक्त करना था। लेकिन इस सरकारी विभाग के द्वारा किए गए काम कोई परिणाम नहीं दे सके। दरअसल अवसाद जैसी खतरनाक मनोदशा को दूर करने के लिए सरकारी विभाग बना देना पर्याप्त नहीं है। निराशा विशेष प्रकार की मनोदशा है। आशा अभावग्रस्त व्यक्ति को भी दुखी नहीं होने देती। आशा का सीधा अर्थ है कि भविष्य में सब कुछ अच्छा ही होगा। आशा भविष्य पर विश्वास है। निराशा अपने कर्मों पर भी विश्वास नहीं करने देती। मनोचिकित्सकों के लिए यह एक बीमारी है। उनका कहना है कि मस्तिष्क का एक हिस्सा मनुष्य को अपनी सुरक्षा के लिए सावधान करता है और उसके निर्णय लेने की विधि को भी प्रभावित करता है। ऊंचाई से डर लगना या लिफ्ट में घबराहट का अनुभव करना दुख है। अवसाद की स्थिति में मस्तिष्क का यह हिस्सा व्यवस्थित काम नहीं करता। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत अवसाद के मरीजों के मामलों में अग्रणी देशों में है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

भारतीय सामाजिक जीवन में प्राचीन काल से ही ईश्वर, देवी, देवता जैसे प्रतीक हैं। आशावादी अपनी आस्तिकता के कारण अपने दुख और अवसाद से छुटकारा पाने के लिए देव शक्तियों पर विश्वास करते हैं। पश्चिम प्रेरित सभ्यता इसे अंधविश्वास कहती है। लेकिन ऐसे देव विश्वास मनुष्य शरीर की रासायनिक क्षमता को आशावादी बनाते हैं और विषाद प्रसाद में बदल जाता है। भारतीय दर्शन परंपरा में परम सत्ता को समूचे अस्तित्व के लिए कर्ता धर्ता बताया गया है। भारतीय संस्कृति में यथार्थवाद की अनेक धाराएं हैं। चार्वाक मत न ईश्वरीय सत्ता मानता है और न पुनर्जन्म। उसकी घोषणा मजेदार है, ‘जब तक जियो सुख से जियो। उधार लो और घी खाओ-यावत् जीवेत्, सुखम् जीवेत्। ऋणम् कृत्वा, घृतम् पीवेत्।’ इस देह और संसार के परे कुछ भी नहीं है। इसे नास्तिक दर्शन माना जाता है। लेकिन यह दर्शन सुख की गारंटी देता है। ऋग्वेद से लेकर समस्त वैदिक साहित्य में आनंद प्राप्ति का दर्शन है। मनुष्य निराशा में आनंदित नहीं होता और दुख में भी नहीं। जीवन दृष्टि को आनंदमार्गी बनाना जरूरी है। आशा में आश्चर्यजनक ऊर्जा होती है। छांदोग्य उपनिषद की कथा के अनुसार सम्पूर्ण वैदिक साहित्य और भौतिक विज्ञान की सभी शाखाएं पढ़ लेने के बाद भी नारद अशांत थे। वे उस समय के प्रतिष्ठित विद्वान सनत् कुमार के पास गए। सनत् कुमार ने उनके द्वारा पढ़ी संपूर्ण विद्या को अपर्याप्त बताया है और कहा कि आशा में बल है। इसमें सुख है। नारद ने पूछा, यह सुख क्या है? सनत् कुमार ने बताया, ‘जो पूर्ण है, वही सुख है। जो अपूर्ण है वही दुख है।’ ऋषि ने अन्य उपनिषद में पूर्ण का अस्तित्व समझाते हुए कहा है, ‘यह पूर्ण है। वह पूर्ण है। उस पूर्ण से यह पूर्ण प्रकट हुआ है। पूर्ण से पूर्ण घटाओ तो पूर्ण ही बचता है।’ पूर्णता पूर्ण अनुभूति देती है। ब्रह्म पूर्ण है। ब्रह्मविद ब्रह्म अनुभूति पाते हैं। ब्रह्म अनुभूति में ब्रह्मानंद है।

सृष्टि आनंद से भरी पूरी है। देखने की सकारात्मक दृष्टि होनी चाहिए। नदी तट पर खड़े होकर जल प्रवाह देखना आनंद है। नदी की लहरों का नाद संगीत सुनना आनंद है। संगीत के सात सुरों को ध्यान से सुनना भी आनंददायी है। कलाओं का दर्शन आनंददाता है। प्रकृति बहुरुपिया है। सर्वत्र रूप ही रूप हैं। माता-पिता का आशीर्वाद प्राप्त करना भी आनंद है। स्वयं को प्रकृति सृष्टि का अविभाज्य अंग जानना भी आनंद है। प्रकृति में यत्र तत्र सर्वत्र आनंद के प्रोत्साहक रूप हैं। उन्हें देखना सुनना भी आनंद है। आनंद रस आपूरित जीवन दृष्टि में समूचा ब्रह्मांड आनंद से भरा पूरा छलकता अमृतघट होता है। यह सहज सुलभ है। तब विषाद की कोई स्थिति नहीं होती। आनंदमयता में जीवन प्रसाद से भर जाता है।

(लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)

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