मुख्यपृष्ठस्तंभशिलालेख : सृष्टि रहस्य का अमर गीत है श्रीमद्भगवद्गीता!

शिलालेख : सृष्टि रहस्य का अमर गीत है श्रीमद्भगवद्गीता!

 हृदयनारायण दीक्षित

अस्तित्व परम उल्लास का काव्य है। सघन उल्लास से आच्छादित हैं हम सब। भीतर भी, बाहर भी। अस्तित्व का अणु-परमाणु गतिशील है, नियमबद्ध, लयबद्ध, छन्दस् और काव्यमय भी। विश्व ‘यूनीवर्स’ है-नियमबद्ध कविता। रूप उगते हैं, विदा होते हैं। सूर्य प्रकाश रूप हैं, उदय होते हैं, अस्त होते हैं। चंद्र खिलते हैं, बढ़ते हैं, पूर्ण होकर पूर्णिमा और अवसान में अमावस्या। व्यक्त अव्यक्त हो रहा है प्रतिपल और अव्यक्त प्रत्यक्ष हो रहा है। दिक्काल के खेल रम्य हैं। जड़ में चेतन है, चेतन जड़ रूप होकर ही दिक्काल में आता है। जीवन दीप उगता है, बुझता है, फिर-फिर उगता है। प्रकृति सृष्टि के इस विज्ञान कर्म को कैसे कहें? कैसे जानें? जानें भी तो जाने हुए को कैसे समझाएं? तुलसीदास भी इस सीमा से परिचित थे। उन्होंने गाया ‘तदपि कहे बिनु रहा न जाई।’ अस्तित्व रहस्यों को गाया ही जा सकता है। गीत को गद्य की तरह नहीं। गीत का गद्य प्राणहीन काया होता है। गीत सप्राण अस्तित्व है। हिंदुस्थान ने अस्तित्व के गीत काव्य को गाकर ही उल्लास पाया। अस्तित्व के इसी गीत का नाम है-गीता। श्रीमद्भगवद्गीता। गीता सृष्टि रहस्य का अमर गीत है।
कब लिखा गया यह गीत? कब छपा? महाभारत का अंश था? क्या बाद में जोड़ा गया? ऐसे प्रश्न पोस्टमार्टम रिपोर्ट में काम आते हैं। जीवंत अस्तित्व के लिए इनका कोई मतलब नहीं। गुठली का परीक्षण बुरा नहीं लेकिन यह वनस्पति विज्ञानी के लिए ही उपयोगी है। मधुरस के लती आनंद अभीप्सु के लिए आम्ररस और आम्रमंजरी का गंधमादन प्यार ही वरीयान है। गीता की विषयवस्तु ध्यान देने योग्य है। संविधान के अधिकृत हिंदी अनुवाद में ‘धर्म निरपेक्ष’ शब्द नहीं है। सेकुलर का अनुवाद पंथ निरपेक्ष ही किया गया है। धर्म निरपेक्ष का अर्थ पंथ निरपेक्ष नहीं होता। धर्म गुण है और पंथ आस्था। गीता का दर्शन आस्था नहीं है। यहां वैज्ञानिक विवेक है और शुद्ध दर्शन के तर्क वितर्क। गीता कर्मकाण्ड का ग्रंथ नहीं है।
जिज्ञासु अंधविश्वासी नहीं होते। गीता में सतत् कर्म और आत्मबोध पर जोर है। श्रीकृष्ण जनक का उदाहरण देते हैं, ‘जनक को भी कर्म से पूर्णता मिली।’ फिर ज्ञानी के लिए कहते हैं कि ‘वह कर्म में आसक्त अज्ञानी को विचलित न करे। जैसे अज्ञानी आसक्त होकर कर्म करते हैं, उसी प्रकार ज्ञानी को अनासक्त होकर कर्म करना चाहिए, क्योंकि ‘यद्यदाचरिति श्रेष्ठस्त देवेतरो जन।’ जैसा आचरण श्रेष्ठजन करते हैं, बाकी लोग भी वैसा ही करने लगते हैं।’ गीता कर्म को अनिवार्य बताती है। संसार को सुंदर बनाने के लिए कर्म और ज्ञान की महत्ता बताती है। विश्व को एक इकाई बताती है। समत्वयोग की दृष्टि देती है। गीताकार की दृष्टि सामाजिक भेदभाव के विरूद्ध तीखी है। कृष्ण कहते हैं, ‘पंडितजन ज्ञान के कारण विद्वान, ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता और चांडाल को समभाव से देखते हैं।’ यहां समभाव से देखने ‘समदर्शिनि’ शब्द का प्रयोग उल्लेखनीय है। मनुष्य से लेकर पशुओं तक में समता की दृष्टि गीता का क्रांतिकारी पक्ष है।
हम सब कर्मफल चाहते हैं। गीता के अनुसार कर्म अपरिहार्य हैं। प्रकृति की सभी शक्तियां कर्म परत हैं। उनकी कोई इच्छा नहीं दिखाई पड़ती। कर्मफल दुखदायी है। गीता इस इच्छा की समाप्ति का उपाय भी बताती है। गीता कर्म योग का ग्रंथ है। कर्म जरूरी है लेकिन कर्म का फल ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियों के योग से आता है। मनुष्य ही कर्मफल का कारण नहीं है। श्रीकृष्ण का निर्देश है कि आसक्ति त्यागकर समुचित कर्म करो, यही योग है। कैसे करो? उत्तर है ‘बुद्धियोगाद्धनंजय’-बुद्धियोग से धनंजय। बुद्धियुक्त मनुष्य ही शुभ-अशुभ कर्म से ऊपर उठता है। योग कर्म की ही कुशलता है।’ श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘बुद्धियुक्त कामों से ही बड़े ऋषि-मुनि कर्मफल चिंता से मुक्त रहते हैं।’ ज्ञान प्राप्ति के लिए बुद्धि की महत्ता है। गीता में एक प्यारा शब्द इस्तेमाल हुआ है, ‘व्यावसायत्मिका बुद्धि’। इसका तात्पर्य अखण्ड बुद्धि / एकाग्र बुद्धि है। कृष्ण बताते हैं ‘हे कुरूनंदन, जो दृढ़ प्रतिज्ञ नहीं है, उनकी बुद्धि विभक्त रहती है। बुद्धिविभक्त लोग वेदों के उद्धरण देते हैं। पूजा पाठ करते हैं। इंद्रिय भोग के प्रति आसक्त रहते हैं। वे मोहग्रस्त होते हैं।’ ‘बुद्धि की महत्ता’ गीता के वैज्ञानिक दृष्टिकोण का साक्ष्य है।
विश्व की अधिकांश जनसंख्या आस्था वाली है। लेकिन बहुमत जनसंख्या अपनी आस्था से संवाद नहीं बनाती। वह आंख मूंदकर उसे जस का तस स्वीकार करती है। ऐसी आस्था अंधविश्वास होती है। वैज्ञानिक निष्कर्षों का जन्म प्रयोगशालाओं में होता है। वैज्ञानिक अनुसंधान जारी रखते हैं। नए निष्कर्ष आते हैं। पहले वाले निष्कर्ष बेकार हो जाते हैं। ‘आस्था’ भी ऐसा ही निष्कर्ष है। किसी विशेष ‘देश-काल’ में विज्ञान या दर्शन के प्रयोगों से कोई विशेष निष्कर्ष आते हैं। अंतस् विज्ञानी घोषणा करता है। हम उसे देवदूत/महान आत्मा/ऋषि वगैरह जान लेते हैं, उसकी बातें मान लेते हैं। उसकी घोषणा उस ‘देशकाल’ के लिए अंतिम होती है। समय बदलता है, विज्ञान आगे बढ़ता है। मनुष्य चेतना नई ऊचाइयां नापती है। आस्था से भी संवाद की जरूरत होती है। दुनिया के सभी मत, पंथ, मजहब और रिलीजन आस्था वाले हैं। उनकी आस्था अतर्क्य है लेकिन प्रकृति की समूची गतिविधि ‘दिक्काल’ में ही होती है। आस्था भी ‘दिक्काल’ के भीतर है। वह समय-निरपेक्ष नहीं हो सकती, इसलिए उससे लगातार संवाद जरूरी है। हिंदुस्थान की आस्था प्रश्नों से परे नहीं है। यहां आस्था से सतत् संवाद राष्ट्रजीवन की प्राचीन परंपरा है। उपनिषदें के बाद भी दर्शन दिग्दर्शन की तमाम पद्धतियां उगी। हिंदुस्थान का ज्ञान, विज्ञान और दर्शन समूचे आकाश में पंख पैâलाकर उड़ा। निर्बन्ध होकर। गीता आस्था से संवाद का ही विश्वविख्यात ग्रंथ है। गीता का जोर सतत् कर्म पर है। स्वामी विवेकानंद ने कहा है ‘गीता पुष्पमाला के सर्वोत्तम चुने हुए फूलों के गुलदस्ते के समान है।’ उन्होंने युवकों से कहा, ‘यदि दुनिया को यह संदेश पहुंचा सको कि क्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते-तो ये सारे रोग, शोक, पाप और विषाद तीन दिन में धरती से निर्मूल हो जायें। दुर्बलता के ये सब भाव कहीं नहीं रह जायेंगे।’ तुम सर्वशक्तिमान हो-तोप के मुंह तक जाओ, डरो मत।’ पंथनिरपेक्षता हिंदुस्थानी दर्शन की प्राचीन अनुभूति है। यही अनुभूति गीता में भी है। यहां बोध के शिखर पर सर्वधर्म परित्यजन की घोषणा है।

(लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)

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