मुख्यपृष्ठस्तंभइनसाइड स्टोरी: फूटने लगा है स्टार्टअप का गुब्बारा!

इनसाइड स्टोरी: फूटने लगा है स्टार्टअप का गुब्बारा!

– पिछले दो वर्षों में एक लाख से अधिक स्टार्टअप कर्मचारियों की हुई छंटनी
– विदेशी पूंजी निवेश घटने से कंपनियां खर्च-कटौती के लिए विवश

एसपी यादव

भारत में एक समय तेजी से उभर रहा स्टार्टअप तंत्र उम्मीद से कहीं अधिक गंभीर नौकरी संकट का सामना कर रहा है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो साल में २५ से २८ हजार स्टार्टअप कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया है। लेकिन प्लेसमेंट कंपनियों का दावा है कि इन आंक़ड़ों से कम से कम तीन गुना अधिक कर्मचारियों की छंटनी हुई है। टेक-केंद्रित हायरिंग फर्म टॉपहायर के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले २४ महीनों में १,४०० से अधिक कंपनियों ने लगभग ९१ हजार कर्मचारियों को पिंक स्लिप थमाई है। इस लिहाज से प्रत्येक कंपनी से औसतन ६५ कर्मचारियों को नौकरी से निकाला गया है। यदि छंटनी के छिपे आंकड़ों पर गौर किया जाए, तो पिछले दो साल में लगभग एक लाख २० हजार स्टार्टअप कर्मचारी नौकरी से हाथ धो बैठे हैं।

बड़ी कंपनियों ने छोटी की अपनी टीम
हालांकि, छंटनी के ये आंकड़े उन प्रमुख कंपनियों के हैं, जिनमें यूनिकॉर्न या १ बिलियन डॉलर या उससे अधिक मूल्य के स्टार्टअप शामिल हैं। इससे पता चलता है कि बायजू, अनएकेडमी, ब्लिंकिट, मीशो, वेदांतु, ओयो, ओला, कार्स२४ और उड़ान जैसे स्टार्टअप्स ने अपने कर्मचारियों की टीम का आकार छोटा कर दिया है।

छंटनी के आंकड़ों से अस्थायी कर्मचारी गायब
क्वेस कॉर्प के कार्यबल प्रबंधन के अध्यक्ष लोहित भाटिया ने कहा कि स्टार्टअप बड़ी संख्या में ऐसे कर्मचारियों को रोजगार देते हैं, जो उनके पेरोल पर नहीं होते हैं, जिनमें निश्चित अवधि के कर्मचारी, गिग वर्कर (काम के बदले भुगतान के आधार पर रखे गए कर्मचारी) और प्रâीलांस पेशेवर शामिल होते हैं। स्टार्टअप कंपनियां छंटनी के जो आंकड़े बताती हैं, उनमें ऐसे अस्थायी कर्मचारियों की गिनती नहीं होती है।

निकल रही है गुब्बारे से हवा
भारत में स्टार्टअप कंपनियों का एक मजबूत तंत्र तैयार करने के लिए १६ जनवरी २०१६ को स्टॉअप इंडिया मिशन लॉन्च किया गया था। इसका मकसद देश में होनेवाले इनोवेशन (नवाचार) को आगे बढ़ाना था। स्टार्टअप के मामले में १५ हजार ५७१ स्टार्टअप के साथ महाराष्ट्र सबसे आगे है। इसके बाद ९,९०४ स्टार्टअप की संख्या के साथ कर्नाटक दूसरे और ९,५८८ की संख्या के साथ दिल्ली तीसरे स्थान पर है। वहीं उत्तर प्रदेश के ७,७१९ स्टार्टअप और गुजरात के ५,८७७ स्टार्टअप को भी सरकार से मान्यता मिली है। देश में ३० नवंबर २०२२ तक सरकार से मान्यता प्राप्त कुल स्टार्टअप की संख्या ८४ हजार ०१२ दर्ज की गई। लेकिन छंटनी के आंकड़ों पर गौर करें, तो स्पष्ट होता है कि स्टार्टअप के गुब्बारे की हवा निकल रही है।

निवेशकों ने मुंह फेरना शुरू किया
अमेरिका और चीन के बाद भारत का स्टार्टअप तंत्र सबसे बड़ा है, लेकिन लगातार घट रहे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रकोप इस क्षेत्र को भी झेलना पड़ रहा है। कोविड महामारी से उपजी नकारात्मक अर्थव्यवस्था के चलते निवेशकों ने बड़े यूनिकॉर्न की जगह छोटे स्टार्टअप में रुचि लेना शुरू किया था लेकिन वैश्विक मंदी और महंगाई के कारण निवेशकों ने इससे भी मुंह फेरना शुरू कर दिया है।

फंड के अभाव में निष्क्रिय हो रहे हैं स्टार्टअप
निवेश घटने के कारण यूनिकॉर्न की संख्या लगातार सिमट रही है, वहीं भारी तादाद में छोटे स्टार्टअप फंड के अभाव में निष्क्रिय हो रहे हैं। देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) प्रवाह चालू वित्त वर्ष में ३४ प्रतिशत घटकर १०.९४ अरब डॉलर रह गया है। पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में यह १६.५८ अरब डॉलर रहा था। उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से जून तक विदेशी निवेश घटकर ३.६ अरब डॉलर रह गया है। लगता है जैसे निवेश के अभाव में भारतीय स्टार्टअप का स्वर्णिम दौर अब थम सा गया है। जो भारतीय स्टार्टअप पहले से हैं उनके लिए विदेशी फंडिंग में भारी कमी आई है।

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