मुख्यपृष्ठस्तंभअंदर की बात:कोटा में प्रवासी पक्षी

अंदर की बात:कोटा में प्रवासी पक्षी

रमेश सर्राफ धमोरा
झुंझुनू

कोटा में प्रवासी पक्षी
जैसे ही सर्दी शुरू होती है, वैसे ही कोटा में विदेशी पक्षियों का आना भी शुरू हो जाता है। जैसे ही तापमान बढ़ने लगता है, वापस अपने देश में लौट जाते हैं। कुछ पक्षी तो ऐसे हैं, जो सदा के लिए कोटा संभाग अर्थात हाडौती के होकर रह गए। उनकी यहां सैकड़ों बस्तियां बस गई हैं। नदी, तालाब, जलाशय में उन्होंने अपना स्थाई डेरा बसा लिया है। कोटा शहर से २० किलोमीटर दूर राजपुरा के तालाब में जांघिल, पेंटेड स्ट्रॉक पक्षियों ने डेरा डाला है। कोटा के अलग-अलग क्षेत्रों में कोमन कूट, सुरखाब, नार्दन पावलर सरीखे कई पक्षी यहां आए हैं। ये पक्षी यूरोप, चाइना, साइबेरिया और लद्दाख से यहां आते हैं। यहां पानी की भरपूर मात्रा, तालाब, चंबल, जंगल और कीट पतंगों की भरमार होने से उन्हें ये क्षेत्र रास आता है। कोटा और आस-पास के क्षेत्र में पूरे साल पानी रहता है। राजपुरा के लोग बताते हैं कि किशनपुरा-बालापुरा लिफ्ट की वजह से राजपुरा तालाब में साल भर पानी रहता है। भरपूर आहार मिल जाता है। अक्टूबर में इन पक्षियों ने अंडे दिए थे, जिनसे अब चूजे निकल आए हैं। यहां जन्मे पेंटेड स्टॉर्क हाडौती में ही नहीं आस-पास के जिलों में भी प्रजनन कर रहे हैं।
गाड़िया लोहारों का होगा भला
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने गाड़िया लोहार जनजाति के विकास के लिए बड़ा फैसला लेते हुए ‘गाड़िया लोहार कल्याण बोर्ड’ के गठन के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। इसके तहत उन्हें मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने और समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जाएगा। प्रस्तावित बोर्ड का काम गाड़िया लोहार समाज के विकास एवं कल्याण के लिए विभिन्न योजनाएं प्रस्तावित करना, इस समुदाय को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए स्थायी निवास उपलब्ध कराने तथा उनके लिए संचालित विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के लिए विभिन्न विभागों से समन्वय स्थापित करना होगा। प्रस्ताव में कहा गया है कि गाड़िया लोहार समाज के परंपरागत व्यवसाय के तौर-तरीकों में वर्तमान आवश्यकताओं के अनुसार बदलाव, आर्थिक उन्नयन और रोजगार को बढ़ावा देने के साथ-साथ समुदाय में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सरकार को सुझाव देने जैसे कार्य बोर्ड की ओर से किए जाएंगे। मुख्यमंत्री की ओर से गठित इस बोर्ड में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और ५ सदस्य सहित कुल ७ सदस्य होंगे। साथ ही सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग इस बोर्ड का प्रशासनिक विभाग होगा।
राहुल से मिले जोशी
राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष सीपी जोशी महाराष्ट्र जाकर राहुल गांधी की भारत जोड़ो पदयात्रा में शामिल हुए तथा उनसे राजस्थान की राजनीति को लेकर विस्तृत चर्चा की। राहुल गांधी के साथ दो दिनों तक पैदल चले सीपी जोशी के साथ उनके समर्थक मंत्री लालचंद कटारिया, उदयलाल आंजना, राजेंद्र यादव, विधायक दिव्या मदेरणा, रोहित बोहरा भी साथ थे। सीपी जोशी राजस्थान के वरिष्ठ नेता हैं। राजस्थान व केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव रहते उनके पास दस प्रदेशों का प्रभार रहा था। राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष रहते हुए एक वोट से विधानसभा का चुनाव हारने के कारण जोशी मुख्यमंत्री बनने से चूक गए थे। जोशी के पास राजस्थान के ८२ विधायकों द्वारा दिए गए इस्तीफे अभी तक पेंडिंग पड़े हैं, जिस पर उनको फैसला लेना है। पिछले दो महीनों से राजस्थान कांग्रेस में चल रहे घटनाक्रम से अवगत कराने के लिए संवैधानिक पद पर रहते हुए भी जोशी राहुल गांधी के साथ पदयात्रा में शामिल हुए। अशोक गहलोत मुख्यमंत्री पद से हटते हैं तो उनके स्थान पर मुख्यमंत्री बनने वालों में जोशी का नाम प्रथम स्थान पर है। जोशी का राहुल गांधी से मिलना नई राजनीति का संकेत दे रहा है।
भाजपा में अटकी नियुक्तियां
राजस्थान में भाजपा नेताओं के संगठन विस्तार का इंतजार अभी तक खत्म नहीं हुआ है। भाजपा गुटबाजी और आंतरिक क्लेश से उबर नहीं पाई है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भाजपा में लगभग १३ ऐसे जिलाध्यक्ष बदलने को लेकर कवायद पूरी हो चुकी है, जो २०२३ में चुनाव लड़ना चाहते हैं या जो नॉन परफॉर्मिंग रहे हैं। ऐसे जिलाध्यक्षों को पार्टी बदल रही है। इसके लिए भाजपा ने पांच वरिष्ठ नेता सुनील कोठारी, नारायण पंचारिया, वासुदेव देवनानी, हिरेंद्र शर्मा और शैलेंद्र भार्गव को जिम्मेदारी दी थी। पांचों नेताओं ने अपनी रिपोर्ट भी संगठन को दे दी, मगर इसके बावजूद अब तक इन नामों पर निर्णय नहीं हो सका है। माना जा रहा है कि पार्टी में ऊपर से भले सब सामान्य दिखता हो, मगर अंदरूनी कलह है। कई नेताओं की रुचि अलग-अलग इलाकों में अपने वफादार नेताओं को पद दिलवाने की है। इसके चलते भाजपा में भी मुश्किलात पैदा हो रही हैं। राजस्थान में दिसंबर २०२३ में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में जो भी बदलाव होने हैं, वो चुनाव से सालभर पहले हो जाने चाहिए, ताकि नए पदाधिकारी को काम करने को कम से कम एक साल का समय मिले।

(लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं। इनके लेख देश के कई समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते हैं।)

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