मुख्यपृष्ठस्तंभमध्यांतर : एक बस हादसे ने खोल दी मध्यप्रदेश सरकार की पोल!

मध्यांतर : एक बस हादसे ने खोल दी मध्यप्रदेश सरकार की पोल!

प्रमोद भार्गव
शिवपुरी (मध्य प्रदेश)

यह बस बिना परमिट और फिटनेस के करीब दो साल से सड़क पर चल रही थी। बस भाजपा नेता की थी, इसलिए न तो बस मालिक ने परमिट का नवीनीकरण कराना उचित समझा और महकमा राजनैतिक व्यक्ति होने के कारण बस चलाने पर प्रतिबंध लगाने से बचता रहा। हालांकि, मध्यप्रदेश में ऐसी स्थिति किसी एक बस या मालिक की हो, ऐसा नहीं है। समूचे मध्यप्रदेश में ही सवारी बसों का परिचालन इसी हाल में हो रहा है।

मध्यप्रदेश में परिवहन विभाग की लापरवाही किस हद तक है, इसकी पोल एक सवारी बस हादसे ने खोल दी। दरअसल, प्रदेश का परिवहन विभाग कटरों के हवाले है और विभाग के कर्मचारी व अधिकारी इसे घरों में बैठकर संचालित कर रहे हैं, क्योंकि यह महकमा समूचे तंत्र की नाजायज आय का बड़ा जरिया बना हुआ है। केंद्र सरकार ने वाहन चालकों से जुड़े हिट एंड रन यानी सड़क दुर्घटना कानून बनाकर चालकों पर तो मजबूत शिकंजा कसने का काम कर दिया है, लेकिन वाहन मालिकों और परिवहनकर्मियों की मनमानी पर अंकुश लगाने की कोई पहल नहीं की है। इसी का नतीजा है कि दो-दो साल से सवारी बसों के परमिटों का नवीनीकरण नहीं हुआ है और बसों की फिजीकल फिटनेस का आलम तो पूरी तरह भगवान भरोसे है। लिहाजा चालकों पर नियंत्रण का कानून जो भी बन जाए, एक तो उस पर अमल कठिन है, दूसरे परिवहन विभाग में कोई पारदर्शिता आ जाए, यह भी कहना मुष्किल है।
बीते हफ्ते गुना जिले में गुना से आरोन जा रही एक बस के डंपर से टकरा जाने से भीषण दुर्घटना घटी। टक्कर होते ही बस में आग लग गई, जिसमें १३ लोग भस्मीभूत हो गए। १५ लोग गंभीर रूप से घायल हैं, जिनका गुना, शिवपुरी और ग्वालियर के सरकारी अस्पतालों में इलाज चल रहा है। इनमें से कितने मौत की जंग जीत पाते हैं, यह कहना आसान नहीं है, क्योंकि जले हुए व्यक्ति पर मौत का साया छह माह तक मंडराता रहता है। यह हादसा इतना भीषण था कि कई लाशें जली हुई अवस्था में बस से बाहर निकाली गर्इं। इन लाशों की सीधे-सीधे पहचान नहीं हो पाई। नतीजतन डीएनए जांच से पहचान कराकर परिजनों को लाशें अंतिम संस्कार के लिए एक सप्ताह बाद मिल पार्इं।
हालांकि, नए-नए मुख्यमंत्री बने मोहन यादव ने पर्याप्त सख्ती बरती। गुना पहुंचकर उन्होंने मौका-मुआयना भी किया। इस एक घटना को लेकर उन्होंने पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को बदल दिया। कलेक्टर, एसपी, आरटीओ और यातायात आयुक्त को तत्काल हटा दिया गया। नगरपालिका सीएमओ को सीधे जिम्मेदार नहीं होने के बावजूद इसलिए निलंबित कर दिया, क्योंकि फायर ब्रिगेड समय पर नहीं पहुंची। जबकि घटना गुना से महज १२-१३ किलोमीटर की दूरी पर घटी थी। हादसे की जांच के लिए एक समिति भी गठित करके जांच पूरी कर ली गई है। इस समिति के अध्यक्ष गुना के अपर कलेक्टर मुकेश कुमार शर्मा हैं। अन्य सदस्यों में एसडीएम गुना दिनेश सांवले, ग्वालियर के संभागीय उप परिवहन आयुक्त अरुण कुमार सिंह और गुना के विद्युत सुरक्षा सहायक यंत्री प्राणसिंह राय इस समिति में शामिल रहे हैं। समिति ने दुर्घटना के कारण दुर्घटनाग्रस्त बस और डंपर को मिली अनुमतियां, बस में आग लगने के कारण, जिम्मेदार विभागों की भूमिका जैसे पहलुओं पर जांच की है। लेकिन जांच से सामने आई कमियों पर प्रदेशव्यापी अमल हो पाएगा अथवा नहीं, यह कहना मुश्किल है।
यह बस बिना परमिट और फिटनेस के करीब दो साल से सड़क पर चल रही थी। बस भाजपा नेता की थी, इसलिए न तो बस मालिक ने परमिट का नवीनीकरण कराना उचित समझा और महकमा राजनैतिक व्यक्ति होने के कारण बस चलाने पर प्रतिबंध लगाने से बचता रहा। हालांकि, मध्यप्रदेश में ऐसी स्थिति किसी एक बस या मालिक की हो, ऐसा नहीं है। समूचे मध्यप्रदेश में ही सवारी बसों का परिचालन इसी हाल में हो रहा है। हालांकि, मुख्यमंत्री की कठोर कार्यवाही से प्रशासन सकते में है और सवारी बसों से लेकर स्कूल बसों की जांच में महकमा जुट गया है। बावजूद दुर्घटना को लेकर सवाल यह भी खड़ा होता है कि अवैध बसों का परिचालन केवल परिवहन विभाग की महरबानी पर निर्भर नहीं है। संबंधित पुलिस थानों का भी महिना इन बसों से बंधा होता है। राजस्व और न्यायिक अधिकारी भी बसों की जांच करने का अधिकार रखते हैं। लेकिन जब पूरे कुएं में भांग घुली हो, तो किसी एक को जिम्मेदार वैâसे ठहराया जाए। हालांकि, मुख्यमंत्री की कार्यवाही के संदर्भ में माना जा रहा है कि ये तेवर पूरे पांच साल दिखाई देते रहेंगे। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार में जो हुआ वह बीत गया, लेकिन आगे ऐसी लापरवाही नहीं चलेगी। बावजूद लगाम लग ही जाएगी, यह एकाएक नहीं कहा जा सकता है।
दरअसल, मध्यप्रदेश में करीब २५ लाख व्यावसायिक वाहन हैं। इनमें से १ लाख से ज्यादा वाहन सड़कों पर चलाने लायक नहीं हैं। बिना अनुज्ञा पत्र और बीमा के भी वाहन दौड़ रहे हैं। परिवहन विभाग के पास कर्मचारियों की कमी है, इसे नकारा नहीं जा सकता। लेकिन जो हैं, वे अपना दायित्व ईमानदारी से निभा रहे हैं, यह भी नहीं कहा जा सकता। प्रदेश में बड़ी संख्या में सवारी बसें सत्ताधारी नेताओं, विधायकों और पुलिस व परिवहन कर्मचारियों की हिस्सेदारी में चल रही हैं। इसलिए कानून पर अमल नहीं हो पा रहा है। यही नहीं, हालात इतने बद्तर हैं कि प्रदेश की राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तरप्रदेश की सीमा से जुड़े जितने भी नाके हैं, उन पर सभी प्रकार के वाहनों से वसूली के काम ग्वालियर, मुरैना और भिंड जिलों के कटर करते हैं। ये कटर सरकारी कर्मचारी नहीं होते हैं। बल्कि आपराधिक प्रकृति के दबंग होते हैं। इनसे लड़ना आम वाहन चालक के बस की बात नहीं होती है। परिवहन विभाग के कर्मचारी अधिकारी जिला और संभाग मुख्यालयों पर रहकर परिवार के साथ ठाठ की जिंदगी बिता रहे होते हैं। ये केवल कागजी खानापूर्ति के लिए हफ्ते में एक या दो बार नाके पर जाते हैं। इस वसूली में कटरों का वेतन नहीं, बल्कि हिस्सेदारी होती है। इसलिए जबरन अधिकतम वसूली करते हैं। सभी नाकों पर कर्मचारियों के सपरिवार रहने का उत्तम आवासीय प्रबंध है, लेकिन प्रदेश में एक भी कर्मचारी नाके पर नहीं रहता है। मुख्यमंत्री मोहन यादव यदि वाकई परिवहन विभाग को दुरुस्त करना चाहते हैं, तो सबसे पहले उन्हें कटरों की व्यवस्था को खत्म करने की जरूरत है।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

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