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मध्यांतर : भाजपा, उम्मीदवारों की घोषणा और बगावत!

प्रमोद भार्गव
शिवपुरी (मध्य प्रदेश)

आखिरकार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कर्नाटक की हार से सबक लेते हुए विधानसभा चुनाव में मतदान के तीन माह पहले ३९ उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी। ये सभी सीटें भाजपा एक से ज्यादा बार कांग्रेस या अन्य दल के प्रत्याशियों से हार चुकी है। इनमें से ३८ सीटें कांग्रेस के पास है और एक सीट बहुजन समाज पार्टी के खाते में है। इनमें सात पूर्व मंत्रियों समेत २८ ऐसे चेहरे हैं, जो पिछली बार चुनाव हारे थे। जल्दबाजी में की गई इस चुनावी युद्ध की रणभेरी में बगावत के सुर तो उठते दिखाई दे ही रहे हैं, जातिगत ध्रुवीकरण के समीकरण भी प्रबल रूप लेते दिखाई दे रहे हैं। अतएव यह घोषणा चौंकानेवाली जरूर लग रही है, लेकिन हकीकत में पार्टी में अंदरूनी स्तर पर और विपक्षी दलों को घोषित प्रत्याशी की लानत-मलामत करने का मौका हाथ लग गया है। इसलिए यह कहना भी जल्दबाजी होगा कि तीन माह में ये उम्मीदवार जीत के लिए कोई चमत्कार कर दिखाएंगे।
भोपाल उत्तर से आलोक शर्मा और मध्य सीट से ध्रुवनारायण सिंह पर भरोसा जताया है। आलोक शर्मा २००८ में इसी सीट से चुनाव हार गए थे, लेकिन भोपाल की जनता ने उन्हें महापौर के पद पर विजयश्री दिला दी थी। ध्रुवनारायण का २०१३ में टिकट काट दिया गया था। इस पहली सूची के आने से सबसे बड़ा झटका २०१८ में हारी हुई भाजपा की २०२० में सरकार बनवाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को लगा है। उनके नुमाइंदे रणवीर जाटव का टिकट आरक्षित सीट सबलगढ़ से काट दिया गया। अब यहां से सरला रावत प्रत्याशी हैं। टिकट नहीं मिलने पर रणवीर के बेटे ने बयान देकर नाराजगी जताई है। हालातों को समझते हुए सिंधिया मौन हैं, क्योंकि सिंधिया जान रहे हैं कि यही हश्र उनके अनेक नुमाइंदों का होने जा रहा है।
भाजपा ने पिछोर विधानसभा सीट से उन प्रीतम लोधी को भी टिकट दे दिया, जो ब्राह्मणों पर अनर्गल टिप्पणी करके देशव्यापी चर्चा में आ गए थे। उन्हें भाजपा से निष्कासन का दंड भी झेलना पड़ा था। उनके नाम की घोषणा होते ही लोधी बनाम अन्य जातियां ध्रुवीकृत होने लगी हैं। प्रीतम के पक्ष में २१ अगस्त को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की रैली और सभा हुई। इस सभा में शिवपुरी के विधायक और खेल एवं युवा कल्यण मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया का नहीं आना लोगों को नागवार गुजरा। क्योंकि जिस १४५.४५ करोड़ की लागत से बनने वाले सनघटा बांध का भूमिपूजन किया, वह शिवपुरी विधानसभा में आता है। ऐसे में यशोधरा की अनुपस्थिति किस नाराजगी का कारण बनी, यह विचारणीय बिंदु बन गया है।
इस कार्यक्रम में लोधी समाज का जिस तरह से जमघट लगा, उसकी परछाई में अन्य समाज के लोग ध्रुवीकृत होने की मंशा बनाने लगे हैं। इस इलाके में लोधी को एक आक्रामक जाति माना जाता है। ऐसे में बाहुबली प्रीतम को जीत का मौका मिल जाता है तो जातियों में परस्पर टकराव के हालात बनने की आशंकाएं जताई जाने लगी हैं। यहां सबसे ज्यादा ६० हजार लोधियों के वोट हैं। बावजूद छह बार से लगातार जीत रहे केपी सिंह की विधायकी एक बार फिर बरकरार रहने की उम्मीद है। वैसे भी केपी भाजपा के उन सभी दिग्गजों को धूल चटाने में कामयाब रहे हैं, जिन्हें भाजपा क्षेत्र का सिरमौर मानती रही है। मध्य प्रदेश विधानसभा में सबसे ज्यादा पांच बार जीतने वाले राजस्व मंत्री रहे लक्ष्मीनारायण गुप्ता को केपी ने पहली बार की उम्मीदवारी में ही शिकस्त दे दी थी। इसके बाद पूर्व मंत्री भैया साहब लोधी, उमा भारती के भाई स्वामी प्रसाद लोधी, जगराम सिंह यादव और फिर प्रीतम लोधी को दो बार पराजित किया, जबकि कांग्रेस में रहते हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया भी इस कोशिश में लगे रहे हैं कि केपी पराजित हो जाएं। दरअसल, केपी दिग्विजय सिंह समर्थक रहे हैं। केपी क्षेत्र में निरंतर सक्रिय रहते हुए, गांव-गांव जाकर सीधा जनसंपर्क करते हैं। केपी विवाह, बीमारी और अन्य प्राकृतिक आपदा आने पर लोगों की आर्थिक मदद विधायक निधि के साथ स्वयं के धन से भी करते हैं।
कमजोर सीटों पर समय से पहले नामों की घोषणा भाजपा के लिए बालाघाट में भी महंगा सौदा साबित होता दिख रहा है। जिले की लांजी विधानसभा सीट पर आम आदमी पार्टी के नेता राजकुमार करहे को उम्मीदवार घोषित करने के विरोध में समूची भाजपा सड़क पर उतर आई। पार्टी के कार्यकर्ताओं ने घोषित उम्मीदवार को बुलाए बिना ही एक बड़ा कार्यकर्ता सम्मेलन किया। इसमें पूर्व विधायक रमेश भटेरे को टिकट नहीं दिए जाने के विरोध में १० हजार से ज्यादा कार्यकर्ता इकट्ठे हुए। इस सम्मेलन में भटेरे ने टिकट काटे जाने के विरोध में पार्टी नेतृत्व की जमकर फजीहत करके अपनी भड़ास निकाली। हालांकि, ये कार्यक्रम भाजपा की जीत की रणनीति बनाने के उद्देश्य से तय किया था लेकिन पार्टी के घोषित उम्मीदवार के विरोध तक सीमित रह गया।
बताते है यह सूची अमित शाह ने पार्टी स्तर पर कराए सर्वे के आधार पर जारी की है। गृहमंत्री शाह के सर्वे में जिन दावेदारों के नाम कार्य और व्यवहार के आधार पर चयनित होकर आए थे, उन्हें ही टिकट दिया गया है। अब तीन महीने पहले प्रत्याशियों की घोषणा के पीछे तर्क दिया जा रहा है कि इस बहाने कार्यकर्ताओं की नाराजगी और असमंजस दूर करने के प्रयास होंगे। प्रत्येक सीट पर १० से १२ दावेदार टिकट की दौड़ में थे। इससे टिकट को लेकर मतभेद बढ़ रहे थे। नतीजतन, चुनाव में पार्टी को नुकसान होने की आशंकाएं भी बढ़ रही हैं। इस कारण पार्टी ने तीन माह पहले प्रत्याशियों की घोषणा करके कांग्रेस को आरंभिक चुनौती पेश कर दी है।
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

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