मुख्यपृष्ठस्तंभमध्यांतर : भाजपा की खुल गई पोल; कलेक्टर ने किया `झोल'!

मध्यांतर : भाजपा की खुल गई पोल; कलेक्टर ने किया `झोल’!

  • प्रमोद भार्गव
  • मध्य प्रदेश में जिला प्रशासन और पुलिस सत्तारूढ़ दल के पक्ष में किस तरह से काम कर रहे हैं, कुछ समय से इसकी बानगियां लगातार देखने में आ रही हैं। ग्राम पंचायत और नगरीय चुनाव में प्रशासन का यह दखल खुले रूप में देखने में आया है। यहां तक कि जबलपुर उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल ने एक मामले की सुनवाई करते हुए खुली अदालत में बेहद तल्ख टिप्पणी की है। उन्होंने सख्त लहजे में कहा है कि पन्ना के जिला निर्वाचन अधिकारी एवं कलेक्टर संजय कुमार मिश्रा ने ग्राम पंचायत चुनाव में सरकार के राजनीतिक एजेंट की तरह काम किया है। लिहाजा, उन्हें पद पर बने रहने का अधिकार नहीं है। उनके रवैये से ऐसा जाहिर हुआ है कि उन्हें नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत पर भरोसा नहीं है और मनमानी ही उनका आचरण है। हाईकोर्ट ने पन्ना के कलेक्टर द्वारा चुनाव याचिका जैसे गंभीर मामले में नियम विरुद्ध तरीके से निर्णय लेने के रवैये पर नाराजगी जताई है। इसी के साथ कलेक्टर संजय कुमार मिश्रा को नोटिस जारी कर पूछा है कि क्यों न भविष्य में उन्हें चुनाव से जुड़ी इस तरह के गंभीर प्रकरणों की सुनवाई से अलग रखा जाए ? क्यों न ऐसी अनुशंसा भारत निर्वाचन आयोग, राज्य निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं को भी प्रेषित की जाए? कलेक्टर को इस सिलसिले में व्यक्तिगत रूप से उच्च न्यायालय में उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देने को आदेशित किया है। इसके लिए वे आगामी १७ अगस्त २०२२ को अदालत के समक्ष व्यक्तिगत रूप से हाजिर होंगे। साथ ही आगामी आदेश तक कलेक्टर द्वारा चुनाव याचिका पर दिए गए फैसले पर भी रोक लगा दी गई है। कोर्ट के आदेश से जहां एक ओर भाजपा की पोल खुल गई, वहीं दूसरी ओर कलेक्टर ने `झोल’ किया है यह भी स्पष्ट हो गया।
    पन्ना जिले के गुन्नैर जनपंचायत से विजयी सदस्य परमानंद शर्मा ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर बताया था कि २७ जुलाई को उन्हें उपाध्यक्ष पद पर विजयी घोषित करके प्रमाण पत्र भी जारी कर दिया गया था। जनपद पंचायत के कुल २५ सदस्यों में से १३ वोट शर्मा को मिले थे, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी राम शिरोमणि मिश्रा को १२ वोट मिले थे। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज शर्मा, समदर्शी तिवारी, काजी फखरुद्दीन व कमलनाथ नायक ने न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल के समक्ष प्रस्तुत होकर बताया कि २७ जुलाई को विजयी परमानंद शर्मा से पराजित हुए प्रत्याशी राम शिरोमणि ने पन्ना कलेक्टर एवं जिला निर्वाचन अधिकारी संजय मिश्रा के समक्ष एक चुनाव याचिका प्रस्तुत की। इस याचिका पर तत्काल सुनवाई करते हुए उसी दिन निराकरण भी कर दिया। कलेक्टर ने आदेश में लिखा की एक वोट विवादित था इसलिए २८ जुलाई को लॉटरी के माध्यम से उपाध्यक्ष पद के लिए चुनाव होगा। वकीलों ने दलील दी कि कलेक्टर का पैâसला नैसर्गिक न्याय के सवर्था विरुद्ध है। आरोप लगाया कि कलेक्टर ने स्वतंत्र रूप से काम नहीं करते हुए सत्ताधारी राजनीतिक दल के एजेंट के रूप में काम किया है। इसलिए उन्हें जिला निर्वाचन अधिकारी के पद से हटा देना चाहिए। इस पैरवी के बाद अदालत ने कहा कि यह मामला अत्यंत गंभीर है, इसलिए कलेक्टर संजय मिश्रा को व्यक्तिगत रूप से पक्षकार बनाया जाए। इसकी सूचना कलेक्टर को भेजी जाए। अब इस मामले में अगली सुनवाई १७ अगस्त को होनी है। लेकिन अदालत ने कलेक्टर की इस मनमानी पर जिस तरह की तीखी टिप्पणी की है, इससे साफ है कि प्रदेश के ज्यादातर उच्च अधिकारी निष्पक्ष एवं ईमानदारी से काम नहीं कर रहे हैं।
    इसी तरह का मामला भोपाल में जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव के समय भी देखने में आया था। कांग्रेस के जिला पंचायत सदस्यों द्वारा पाला बदलने की संदिग्ध भूमिका पर जब पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी ने हस्तक्षेप किया तो पुलिस के उच्च अधिकारी से दिग्विजय सिंह की तीखी नोक-झोंक हुई थी। पुलिस अधिकारी ने पूर्व मुख्यमंत्री के प्रोटोकॉल का लिहाज तक नहीं किया। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा था कि ‘हे, ज्ञान के देवताओं पुलिस-प्रशासन की जबरदस्ती, सत्ता की सीना-जोरी आपको नहीं दिख रही है। ये कैसे विधायक हैं, जो सदस्य को ले जाने के लिए धक्का-मुक्की कर रहे हैं और हमें रोक रहे हैं।’ दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भाजपा की मनमानी को लोकतंत्र का कलंक मानते हुए कहा था कि ‘भाजपा ने पुलिस प्रशासन, पैसा और बेइमानी का जिस हद तक का इस्तेमाल किया है, वह मध्यप्रदेश के लोकतांत्रिक इतिहास पर कलंक है।’
    भोपाल में साम, दाम, दंड और भेद की जो चाणक्य नीति अपनाई गई उसी को हथियार ग्वालियर-अंचल के श्योपुर जिला पंचायत का अध्यक्ष बनने के लिए बनाया गया। यहां पुलिस के सीधे दखल और मेहरबानी से भाजपा समर्थित गुड्डीबाई आदिवासी आखिरकार अध्यक्ष पद के लिए चुन ली गईं। उन्होंने मात्र एक वोट से अपनी प्रतिद्वंद्वी गीताबाई को पराजित किया। इस जीत-हार में प्रमुख बात यह रही कि जिन दो जिला पंचायत सदस्यों संदीप शाक्य और गिरधारी बैरवा का पुलिस द्वारा हिरासत में लेकर गायब करने के आरोप कांग्रेसी लगा रहे थे, वह मतदान के दिन मतदान करने पहुंच ही नहीं पाए। उनके परिजनों ने पुलिस को शिकायत भी की लेकिन कोई परिणाम निकलना हीं नहीं था, सो नहीं निकला। निर्वाचन प्रक्रिया के दौरान जिला पंचायत के भवन के बाहर कांग्रेसियों ने धरना एवं प्रदर्शन भी किया। अंततः हालात यह बने कि पुलिस ने कांग्रेस के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष रामनिवास रावत, विधायक बाबू जंडेल सिंह और श्योपुर के जिला अध्यक्ष अतुल चौहान समेत पचास कांग्रेसियों को हिरासत में लेकर पुलिस लाइन स्थित खुली जेल भेज दिया। इस तरह निर्विघ्न चुनाव प्रक्रिया पुलिस का गलत इस्तेमाल करके पूरी कराई गई।
    मध्य-प्रदेश में उच्च अधिकरियों की इस तरह की उद्दंडता पहली बार सत्तारूढ़ भाजपा सरकार के दौरान देखने में आई हो, ऐसा नहीं है। प्रदेश में जब मुख्यमंत्री कमलनाथ थे, तब राजगढ़ जिले के ब्यावरा नगर में संशोधित नागरिकता कानून के पक्ष में प्रदर्शन कर रहे भाजपा नेताओं को जिलाधीश और उप-जिलाधीश ने चांटे जड़ दिए थे। जबकि टीवी समाचारों में घटनाक्रम के दृश्य देखने पर ऐसा कहीं नहीं लगता कि प्रदर्शन उग्र व हिंसक होने की स्थिति में आ रहा था। बल्कि जो पुलिसकर्मी भीड़ को थामे हुए थे, वे कलेक्टर निधि निवेदिता व एसडीएम प्रिया वर्मा की संवाद संप्रेशणीयता पर मुस्कुरा रहे थे। साफ है कि स्थिति गंभीर नहीं थी और दोनों नौकरशाहों ने महज अहंकार तुष्टि के चलते कार्यकर्ताओं के साथ निरंकुशता बरती। इसीलिए मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव केएस शर्मा ने कहा भी था कि इन दोनों अधिकारियों का यह आचरण नागरिक सेवा के विपरीत है। उनके द्वारा स्वयं भीड़ में पहुंचकर मारपीट करना दंडनीय अपराध है। यदि इस अवसर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही भीड़ अनियंत्रित हो जाती तो ऐसी स्थिति में नागरिक और अधिकारी दोनों के लिए ही इसे अवांछनीय व दंडनीय कृत्य माना जाता। यह कृत्य सिविल सेवा का उल्लंघन है, इसलिए जिलाधीश और अधीनस्थों के खिलाफ कार्यवाही हो सकती है। चूंकि दोषी लोग उच्च अधिकारी थे इसलिए कार्यवाही होने की कोई उम्मीद नहीं थी, सो हुई भी नहीं थी। जाहिर है, मध्य प्रदेश में ही नहीं पूरे देश में आईएएस की मनमानियां बढ़ रही हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि प्रदेशों की सरकारें जिला प्रशासन द्वारा चलाई जा रही हैं।
    जिला प्रमुख ‘कलेक्टर’ नाम से वह अर्थ और ध्वनि नहीं निकलते हैं, जो उनकी कार्यशैली और कार्य क्षेत्र का हिस्सा है। कलेक्टर का सामान्य अर्थ, संग्राहक, संग्रहकर्ता, संकलनकर्ता, एकत्रित करनेवाला अथवा कर उगाहने वाला होता है। जबकि हमारे यहां पदनाम का दायित्व जिले की कानून व्यवस्था और प्रशासनिक दायित्व से जुड़ा है। इसलिए कलेक्टर को डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट अर्थात जिला दंडाधिकारी भी कहा जाता है। कलेक्टर को जिलाधिकारी अथवा जिलाधीश के पदनामों से भी जाना जाता है, किंतु कलेक्टर पदनाम इतना प्रचलित और प्रभावशील हो गया है कि जो भी आईएएस बनते हैं, उन्हें सबसे ज्यादा गौरव का अनुभव कलेक्टर बनने या कलेक्टर कहलाने में ही होता है। कलेक्टर हो या कोई अन्य लोकसेवक उसकी गुणवत्ता का मापदंड, उसकी दक्षता, ईमानदारी, कार्यक्षमता और कार्य के प्रति प्रतिबद्धता से होती है। नीतियों व कार्यों पर यदि ठीक से अमल नहीं होता है तो गुणवत्ता ध्वस्त हो जाती है। प्रत्येक राज्य सरकार अनेक श्रेष्ठ नीतियां गरीब, वंचित और किसानों के हित में बनाती हैं लेकिन प्रशासनिक अकुशलता और भ्रष्टाचार के चलते परिणाम के स्तर पर अमल दोषपूर्ण रहता है। यही वजह रही कि मध्य प्रदेश में क्लर्क से लेकर आईएएस तक जिन अधिकारियों के यहां लोकायुक्त पुलिस ने छापे डाले हैं, उनके यहां से करोड़ों की चल-अचल संपत्तियां बरामद हुई हैं। रंगे हाथों पकड़े जाने के बावजूद ये लोकसेवक धनबल व अपनी पहुंच के जरिए बेदाग बच निकलते हैं। बहरहाल यदि यही राग चलता रहा तो वह समय दूर नहीं जब सरकारी मशीनरी के अराजक होने की अशंकाएं बढ़ जाएंगी।
  • (लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)
  • (उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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