मुख्यपृष्ठस्तंभमध्यांतर : कर्ज में दबा मध्य प्रदेश! ...मामा की रेवड़ियों का क्या?

मध्यांतर : कर्ज में दबा मध्य प्रदेश! …मामा की रेवड़ियों का क्या?

प्रमोद भार्गव
शिवपुरी (मध्य प्रदेश)

मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार आजकल ‘मृग मरीचिका’ के भ्रम का शिकार होती दिखाई दे रही है। हम जानते हैं कि रेगिस्तान में दूर हिरण को पानी दिखाई देता है। वह उसे पीने को दौड़ लगाता है, लेकिन निकट पहुंचने पर वह पानी उतना ही दूर हो जाता है। यह भ्रम प्रकाश के पूर्ण आंतरिक परावर्तन की घटना के कारण होता है। अतिरिक्त महत्वाकांक्षी इंसान की तुलना भी हिरण की तरह मृग मरीचिका के इस भ्रामक भटकाव से की जाती है। आजकल मध्य प्रदेश में कुछ ऐसा ही देखने में आ रहा है। चार्वाक के भोगवादी दर्शन को सरकार जनता पर थोपने में लगी है। इस दर्शन के अनुसार, शारीरिक सुख के लिए कर्ज लेकर घी पीना पड़े तो पी जाइए। इसी कहावत को चरितार्थ करने में राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह करने में लगे हैं। विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़ी सरकार पहले से ही कर्ज के बोझ से आकंठ डूबी हुई है। बावजूद वह ४,६८५ करोड़ रुपए का ऋण लेने जा रही है। यह कर्ज प्रदेश के छह शहरों में रिंग-रोड व सड़कों के निर्माण हेतु मोटे ब्याज पर लिया जा रहा है। यह भविष्य में घाटे का सौदा तय होगा।
मध्य प्रदेश में चार माह बाद होनेवाले चुनाव के लिए कर्ज लेने का सिलसिला निरंतर जारी है। इस चुनाव में मुफ्त की रेवड़ियां बांटने और सरकारी कर्मचारियों को सुविधाएं देने के लिए कर्ज-दर-कर्ज लिया जा रहा है। प्रदेश का कुल बजट तीन लाख १४ हजार करोड़ रुपए का है, जबकि सरकार इससे कहीं ज्यादा कर्ज ले चुकी है। जुलाई माह में ही २,००० करोड़ रुपए कर्ज बाजार से लिया है। इसका संपूर्ण भुगतान १० साल बाद किया जाना है। इसके पहले सरकार ने इसी साल २४ मार्च को १ हजार करोड़ रुपए का कर्ज लिया था। ३० मई, २०२३ की तारीख तक सरकार के सिर पर ३ लाख ३१ हजार करोड़ रुपए का कर्ज चढ़ा हुआ था, जो अब और बढ़ गया है।
सत्तारुढ़ दल भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज यह कर्ज स्थाई और बुनियादी विकास से कहीं ज्यादा मुफ्त की रेवड़ियां बांटने में खर्च कर रहे हैं। सवा करोड़ लाडली बहनों के खाते में प्रतिमाह १,००० रुपए डालने का सिलसिला शुरू हो गया है। इसमें दो किश्तें देने तक दो मापदंड बदले गए हैं। अब २१ से २३ साल की उन बेटियों को भी इस योजना में भागीदार कर दिया है, जो विवाहित हैं। साथ ही जिन परिवारों के पास ट्रैक्टर हैं, उन घरों की महिलाएं भी ‘लाडली बहना’ योजना के लिए पात्र कर दी हैं। इसके पहले इस योजना में २३ से ६० साल की महिलाएं पात्र थीं। साफ है, शिवराज ने इस योजना की लोकप्रियता को देखते हुए नियम बदले हैं, ताकि इन महिलाओं के वोट भी भाजपा को मिल जाए, साथ ही शिक्षित बेरोजगार युवाओं के लिए ‘मुख्यमंत्री सीखो-कमाओ’ योजना की शुरुआत की गई है। इसके अंतर्गत आठ से दस हजार रुपए बतौर छात्रवृत्ति मिलेंगे। मुख्यमंत्री ने यह वादा भी कर दिया है कि आगे यह राशि ३,००० रुपए तक बढ़ा दी जाएगी।
यही नहीं बहनों को स्व-सहायता समूह से जोड़कर लखपति बना देने का भरोसा भी चतुर शिवराज ने जता दिया। १२ हजार करोड़ रुपए प्रतिमाह लाडली बहनों को देकर शिवराज कितने मतदाताओं को लुभा पाएंगे यह तो फिलहाल भविष्य के गर्भ में हैं, लेकिन इस बंदरबांट के जरिए उन्होंने यह तो तय कर दिया कि जो राज्य फिलहाल तीन लाख करोड़ से ज्यादा के कर्ज में डूबा है, यह लोक-लुभावन योजना उसे और ज्यादा कर्ज में डुबो देगी। हालांकि, इस योजनाएं से लाभान्वित होनेवाली सभी महिलाएं भाजपा को वोट देंगी, यह कहना मुश्किल है। मुस्लिम महिलाओं के वोट तो विपक्ष की झोली में गिरेंगे ही, अनुसूचित जाति की महिलाओं के वोट भी बसपा के हाथी पर गिरेंगे। जिस जाति समूह का विपक्ष का प्रत्याशी होगा, उसके पक्ष में उस जाति के अधिकांश वोट गिरेंगे। इसलिए यदि शिवराज सिंह इस योजना को सत्ता की पुनर्बहाली का तुरुप का इक्का मानकर चल रहे हैं तो यह उनका भ्रम है।
दरअसल, प्रदेश में कांगे्रस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी ने लाडली बहना योजना के तोड़ की दृष्टि से सरकार बनने के बाद पांच लोक-लुभावन गारंटियां मतदाता को दे दी हैं। एक-महिलाओं को १,५०० रुपए प्रतिमाह, दो- रसोई गैस सिलिंडर में ५०० रुपए की छूट, तीन- १०० यूनिट बिजली माफ, २०० यूनिट हाफ, चार- पुरानी पेंशन योजना की बहाली के साथ पांचवीं गारंटी किसानों की कर्जमाफी भी करने की दी है। मुफ्त की इन मुनादियों से जनता को कितना और कब तक लाभ मिलेगा, यह तो संदेह के घेरे में है, लेकिन इतना तय है कि इन योजनाओं पर अमल पूरी तरह कर दिया गया और आगे पांच साल निरंतरता बनी रही तो प्रदेश इस कर्ज के जंजाल से उबर ही नहीं पाएगा। यहां तक कि कर्मचारियों को वेतन भी समय पर मिलना मुश्किल हो जाएगा। गोया, मतदाता को लालच की मृग मरीचिका दिखाने की बजाय यह भी सोचने की जरूरत है कि इन योजनाओं के लिए अमल में लाने के लिए धन कहां से आएगा?
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार हैं।)

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