मुख्यपृष्ठस्तंभमध्यांतर : बागियों से मुश्किल में प्रमुख दल

मध्यांतर : बागियों से मुश्किल में प्रमुख दल

प्रमोद भार्गव
शिवपुरी (मध्य प्रदेश)
मध्यप्रदेश में चुनावी माहौल चरम पर पहुंच चुका है। प्रचार में भाजपा भले ही आगे दिख रही है, लेकिन सत्ता विरोधी रुझान के चलते भाजपा से सीधे मुकाबले में अब कांग्रेस नजर आ रही है। बावजूद कांग्रेस और भाजपा से निकलकर जो कद्दावर नेता सपा, बसपा और आप से चुनाव लड़ रहे हैं, उनमें से करीब आधा दर्जन प्रत्याशियों का चुनाव जीतना तो तय है ही, अलबत्ता बागी उम्मीदवार करीब तीन दर्जन सीटों पर भाजपा या कांग्रेस का खेल बिगाड़ने में सफल हो सकते हैं। ऐसे में दोनों प्रमुख दलों को स्पष्ट बहुमत मिलने में मुश्किल पेश आएगी? जिन सीटों पर बड़ी जाति समूह के दो प्रत्याशी मैदान में हैं, वहां जातीय आधार खेल बिगाड़ने का काम प्रमुखता से कर रहा है।
२०१८ के विधानसभा चुनाव में कांटे की टक्कर के चलते भाजपा को १०९ और कांग्रेस को ११४ सीटें मिली थीं। इस कड़ी टक्कर का परिणाम था कि ३७ सीटें ऐसी थीं, जहां बसपा, सपा और गौणवाना गण्तंत्र पार्टी ने निर्णायक वोट लेकर प्रदेश की राजनीतिक तस्वीर बदलने का काम कर दिया था। तीसरे मोर्चे के ये घटक दल कई जगह वोट हासिल करने के मामले में दूसरे नंबर पर रहे, तो कहीं हार-जीत के अंतर से भी अधिक मत लेकर बड़े दलों का चुनावी गणित बिगाड़ने में कामयाब रहे थे। इन सीटों में से सबसे अधिक १८ ग्वालियर-चंबल अंचल में थीं, तो वहीं छह बुंदेलखंड में और सात विंध्य क्षेत्र में थीं। बाकी सीटें मालवा और महाकौशल इलाकों में थीं। इस बार प्रत्याशी चयन और उसकी घोषणा के बाद सामने आई बगावत में भाजपा और कांग्रेस के कई दिग्गजों ने इन वैकल्पिक दलों का टिकट लेकर खुद को सबक सिखाने के लक्ष्य से दांव पर लगा दिया है।
इन बागियों के चलते कई मंत्रियों की साख दांव पर लगी है। पोहरी विधानसभा से कांग्रेस के प्रबल दावेदार रहे प्रद्युम्न वर्मा की जगह कैलाश कुशवाहा को टिकट दे दिया गया। कैलाश दो बार बसपा से उम्मीदवार बनकर दूसरे नंबर पर रहे हैं। उनकी इसी योग्यता के बूते कांग्रेस ने उन्हें अपने दल में शामिल किया और टिकट भी दे दिया। कैलाश को पार्टी में स्वयं प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने पोहरी विधानसभा क्षेत्र की उपतहसील बैराड़ में छह माह पहले एक विशाल आमसभा आयोजित कर शामिल किया। तभी से वैâलाश चुनाव प्रचार में लगे हैं। यहां से ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक एवं पीडब्लूडी राज्य मंत्री सुरेश धाकड़ राठखेड़ा भाजपा के उम्मीदवार हैं। उनके कार्यकाल से जनता कतई प्रसन्न नहीं है। लिहाजा ऐन वक्त पर इसी समाज के प्रद्युम्न वर्मा बसपा से चुनावी संग्राम में कूद पड़े। प्रद्युम्न पोहरी जनपद पंचायत के अध्यक्ष रह चुके हैं और उनकी जनता में अच्छी छवि है। प्रद्युम्न के मैदान में उतरने से सीधा नुकसान सुरेश को हो रहा है। यहां करीब पचास हजार वोट धाकड़ समाज के हैं। ये अब धु्रवीकृत होकर प्रद्युम्न के पक्ष में आ रहे हैं। लिहाजा कांग्रेस की जीत की उम्मीद बढ़ गई है। अपने चहेते सुरेश की जीत के लिए सिंधिया और शिवराज सिंह चौहान कई सभाएं कर चुके हैं, लेकिन हाथी का पांव विचलित नहीं हो रहा है। इस स्थिति को समझते हुए एक आमसभा में सुरेश रो-रोकर जनता से वोट की भीख तक मांगते हुए मंच पर ही दंडवत हो गए। सुरेश अब इस हद तक उतर आए कि अपने जातीय समुदाय से कहने लग गए कि यदि धाकड़ बंट गए तो कुशवाह जीत जाएगा।
यही हाल कोलारस विधानसभा में सिंधिया समर्थक महेंद्र यादव का हो रहा है। यहां सिंधिया पर भाजपा के ही लोग आरोप लगा रहे हैं कि वे लगातार एक ही परिवार के व्यक्ति को लाभ पहुंचाने में लगे हैं। महेंद्र से पहले वे उनके पिता रामसिंह यादव को कांग्रेस में रहते हुए टिकट देकर विधायक बनवा चुके हैं। इसके बाद महेंद्र की बेटी नेहा यादव को जिला पंचायत अध्यक्ष बनवाने में भी सिंधिया की भूमिका रही है। हालांकि, यहां से कांग्रेस के उम्मीदवार सिंधिया समर्थक बैजनाथ सिंह यादव हैं। सिंधिया के साथ वे कांग्रेस से भाजपा में गए थे, लेकिन कोई महत्व नहीं मिलने के कारण कांग्रेस में वापिस होकर टिकट पाने में सफल हो गए। एक ही जाति के ये दोनों उम्मीदवार दल से कहीं ज्यादा धन के बूते चुनाव की वैतरणी पार करने में लगे हैं। ऐसे में इन दोनों का खेल बिगाड़ने की भूमिका बसपा से उम्मीदवार बनकर नवल धाकड़ ने रच दी है। इस विधानसभा क्षेत्र में जाटव समाज के सर्वाधिक वोट हैं। इस वोट को बसपा का प्रतिबद्ध वोट माना जाता है, यदि ये मतदाता हाथी पर सवार होते हैं तो कांग्रेस का खेल बिगड़ सकता है।
सपा, बसपा उन विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस और भाजपा का खेल बिगाड़ने की स्थिति में है, जो विधानसभाएं उत्तर प्रदेश की सीमा से सटी हैं। ग्वालियर, चंबल और बुंदेलखंड में सपा, बसपा का प्रभुत्व रहा है तो गोंगपा का प्रभुत्व विंध्य और महाकौशल के आदिवासी इलाकों में रहा है। आदिवासी वोट इस बार ३५ से ज्यादा सीटों पर प्रभाव डालने की स्थिति में है। एक समय यह वोट कांग्रेस का परंपरागत वोट रहा है, लेकिन अब इसमें बहुत बड़ी सेंध लाडली बहना योजना का लाभ देकर भाजपा ने लगा दी है। प्रदेश में सपा के कुल ६९ उम्मीदवार मैदान में हैं। तो वहीं बसपा ने १७५ सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। दोनों प्रमुख दलों को चुनौती देने के नजरिए से बसपा ने गोंगपा के साथ गठबंधन भी किया है। गोया, ५४ सीटों पर गोंगपा के प्रत्याशी किस्मत आजमा रहे हैं। आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार भी मैदान में हैं, लेकिन दिल्ली में आप के नेताओं की गिरफ्तारी के चलते प्रदेश में यह पार्टी फिलहाल कमजोर दिखाई दे रही है। लिहाजा इस पार्टी के उम्मीदवार कोई करिश्मा दिखा पाएंगे, फिलहाल ऐसा नहीं लग रहा है।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

अन्य समाचार