मुख्यपृष्ठस्तंभमध्यांतर : सिंधिया ने खेल-खेल में बिगाड़ा मूल भाजपाइयों का खेल!

मध्यांतर : सिंधिया ने खेल-खेल में बिगाड़ा मूल भाजपाइयों का खेल!

प्रमोद भार्गव
शिवपुरी (मध्य प्रदेश)

इसे कहते हैं बदलाव का फेर या फिर प्रारब्ध की महिमा! ग्वालियर अंचल के हों या फिर राज्यस्तरीय, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया सब पर भारी पड़ते दिखाई दे रहे हैं। आजकल सिंधिया ‘राज्यसभा सदस्य खेल महोत्सव’ के बहाने अपने परंपरागत लोकसभा क्षेत्र गुना, शिवपुरी में युवाओं से लेकर आम मतदाता से जुड़ रहे हैं। इस महोत्सव में सरकारी स्तर पर केवल परंपरागत खेल खिलाए गए। इन खेलों में कबड्डी, खो-खो, सितौलिया, गिल्ली-डंडा और बॉलीवाल जैसे ग्रामीण इलाकों में खेले जाने वाले साधारण खेल शामिल थे। सिंधिया ने ये खेल केवल मंच पर बैठे रहकर नहीं देखे, बल्कि खेल मैदान में पहुंचकर सिंधिया ने भी डंडा मारकर गिल्लियां आकाश में उछालीं और गेंद मारकर सितौलिया की गोटियां जमींदोज कीं। भला युवाओं से जुड़ने के लिए खेल से इतर और क्या माध्यम हो सकता है? इधर सिंधिया जिन मार्गों से शिवपुरी में गुजरे, उन मार्गों को अपने अनुयायियों से कहकर बैनर-पोस्टरों से पटवा दिया। इस खेल महोत्सव के बहाने सिंधिया ने जता दिया कि इस अंचल के वही एकमात्र नेता हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को ही लें तो पाते हैं कि वे भी प्रभावशून्य हो रहे हैं। बीते सप्ताह उनका ग्वालियर से लौटते हुए, शिवपुरी और फिर गुना आना हुआ। शिवपुरी में वे किसी परिचित के घर गए थे, वहीं जिला भाजपा अध्यक्ष राजू बाथम और शिवपुरी विधायक देवेंद्र जैन अपने चंद साथियों के साथ पहुंच गए, लेकिन कार्यकर्ताओं की भीड़ नहीं जुटी। यही गुना में भी हुआ। यहां वे अपने एक परिचित के यहां गमी में शामिल होने पहुंचे थे। खबर मिलते ही अनेक भाजपाई उनसे मिलने पहुंचे, लेकिन गुना के भाजपा विधायक पन्नालाल शाक्य नदारद रहे, जबकि शाक्य को टिकट दिलाने में मुख्य भूमिका शिवराज सिंह चौहान की ही थी। लेकिन चतुर शाक्य ने अनुभव किया कि आज कल केंद्रीय नेतृत्व शिवराज सिंह चौहान को नजरअंदाज कर रहा है। ऐसे में उनसे दूरी बनाए रखने में ही अपने भविष्य की बेहतरी है। यही स्थिति भाजपा के अन्य दिग्गजों की है, फिर चाहे वे वर्तमान सरकार में अहम पद पर पदासीन हों या फिर पद पर न भी हों। यही नहीं ग्वालियर अंचल में जो भी कांग्रेस के छोटे बड़े नेता भाजपा का रुख कर रहे हैं, वे सब बरास्ता महाराज यानी सिंधिया आ रहे हैं।
ग्वालियर अंचल में विधानसभा चुनाव से पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, मध्य प्रदेश के पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा, पूर्व मंत्री जयभान सिंह पवैया और अनूप मिश्रा जैसे दिग्गज सकते में हैं। नरेंद्र सिंह को ही लें, केंद्र में खनिज और कृषि मंत्रालय संभालते हुए अपने नेतृत्व कुशलता का परिचय दे चुके हैं। लेकिन सांसद और मंत्री रहते हुए उन्हें मुरैना जिले की दिमनी विधानसभा का उम्मीदवार बना दिया। कड़े मुकाबले में उन्होंने जीत भी हासिल कर ली और उन्हें विधानसभा अध्यक्ष बनाकर संवैधानिक मर्यादा के खूंटे से बांध दिया गया, उन्हें बहुत सोच समझकर काम करना पड़ रहा है। कार्यकर्ता और क्षेत्र की जनता अनुभव कर रही है कि अब उनका दायरा सीमित है। लिहाजा, भाजपा व अन्य दलों के नेता सिंधिया की शरण में जाते दिख रहे हैं।
नरेंद्र सिंह तोमर के कार्यक्षेत्र मुरैना को ही लें! यहां के पूर्व विधायक एवं कांग्रेस नेता राकेश मावई दिल्ली में सिंधिया दरबार में उपस्थित होकर सिंधिया से भाजपा का दुपट्टा गले में पहन आए। जबकि भाजपा संगठन में जब किसी दूसरे दल के नेता को शामिल किया जाता है तो उसे एक प्रक्रिया से गुजरना होता है। जिला अध्यक्ष उसे बाकायदा सदस्यता दिलवाते हैं। लगता है यह परंपरा अब दम तोड़ रही है। सिंधिया के बढ़ते वर्चस्व के आगे औपचारिक मान्यताएं गौण हो गई हैं। इसी तर्ज पर मुरैना नगर निगम की कांग्रेसी महापौर शारदा सोलंकी भाजपा का दामन थामने की फिराक में हैं, इस सिलसिले में वे दिल्ली जाकर सिंधिया से मनुहार भी कर आर्इं। दरअसल वे जाति प्रमाण पत्र को लेकर अदालत में बताई जाति के सत्य होने की लड़ाई लड़ रही हैं। चुनाव में उनकी प्रतिद्वंद्वी रहीं मीना मुकेश जाटव ने उनकी जाति को चुनौती देते हुए अदालत में एक याचिका दायर की है, जिसमें उनकी दसवीं की अंक सूची में जो जाति दर्शाई है, उस आधार पर वे मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति के आरक्षित वर्ग में नहीं आती हैं। हालांकि, उन्होंने चुनाव मुरैना में ही बने नए जाति प्रमाण पत्र के आधार पर लड़ा और जीतीं। परंतु अब इस प्रमाण पत्र की जांच राज्य की उच्चस्तरीय समिति कर रही है। जाति प्रमाण पत्र के संदेह में आ जाने के कारण वे अब सत्ता की शरण में जाकर मजबूत सुरक्षा- कवच प्राप्त कर लेने की जुगत में हैं। तात्कालिक परिस्थितियों में उन्हें तोमर से कहीं ज्यादा सिंधिया ताकतवर लग रहे हैं। सिंधिया के साथ उनकी तस्वीर सामने आने के बाद ये अटकलें तेज हो गई हैं कि वे जल्द भाजपा में आ जाएंगी।
विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा छोड़ कांग्रेस में गए ज्यादातर नेता सिंधिया के जरिए या तो भाजपा में आ गए हैं या आने की कतार में हैं। राकेश मावई की तर्ज पर पोहरी से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े प्रधुम्न वर्मा ग्वालियर में सिंधिया द्वारा आयोजित हुए एक कार्यक्रम में शामिल हो गए। यही तरीका कांग्रेस में गए जितेंद्र जैन गोटू ने अपनाया। भरोसे के सूत्र बताते हैं कि भाजपा से कांग्रेस में जाकर कोलारस से चुनाव लड़े बैजनाथ सिंह यादव, राकेश गुप्ता और वीरेंद्र रघुवंशी भी जल्द फिर से भाजपा के भगवा रंग में दिखाई दे सकते हैं। अतएव सिंधिया जिस तरह से अपने हारे हुए लोकसभा क्षेत्र में सक्रिय हुए हैं और बड़ी संख्या में उनके अनुयायियों की फौज नए सिरे से तैयार हो रही है, उससे लगता है कि वे गुना से चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। यदि वे चुनाव लड़े तो भाजपा के वे सभी दिग्गज जो उनका विरोध करते रहे हैं। प्रचार करते दिखाई देंगे। वर्तमान सांसद केपी यादव को दोहराया नहीं जाएगा। नरोत्तम मिश्रा जो गुना से टिकट की फिराक में थे, उनके मंसूबों पर भी पानी फिर जाएगा।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

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