मुख्यपृष्ठस्तंभमध्यांतर : खतरे में सिंधिया का गढ़!

मध्यांतर : खतरे में सिंधिया का गढ़!

प्रमोद भार्गव
शिवपुरी (मध्य प्रदेश)

मध्य प्रदेश में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव निकट आ रहे हैं, वैसे-वैसे दल-बदल का खेल तो तेज होता जा रहा है। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन सिंह ग्वालियर के गढ़ पर काबिज होकर ज्योतिरादित्य सिंधिया को जबरदस्त चुनौती दे रहे हैं। हाल ही में शिवपुरी के खांटी भाजपाई जितेंद्र जैन गोटू कांग्रेस में शामिल हुए हैं। उन्होंने भोपाल में कमलनाथ से कांग्रेस की सदस्यता लेने के बाद शिवपुरी में एक नुक्कड़ सभा आयोजित करके सीधे ग्वालियर-चंबल अंचल के नेतृत्वकर्ता मानें जानेवाले ज्योतिरादित्य सिंधिया और यशोधरा राजे सिंधिया का नाम लिए बिना ऐसे-ऐसे आरोप लगाए, जिन्हें लगाने की हिम्मत पहले किसी नेता ने नहीं की। इसी के एक दिन बाद भाजपा से कांग्रेस में आए पूर्व सिंधिया निष्ठों ने कोलारस विधानसभा क्षेत्र के कस्बे बदरबास में जयवर्धन का ऐसा अभूतपूर्व स्वागत किया। जैसा पहले कभी ज्योतिरादित्य का देखने में नहीं आया। एक विशाल जुलूस निकालकर जयवर्धन पर पुष्प वर्षा की और फिर गुढाल के हनुमान मंदिर पर विशाल भंडारा इस स्वागत की खास बात रही कि कांग्रेस की फूट नजर नहीं आई। कुछ समय के भीतर कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ता बन जानेवाले बैजनाथ सिंह यादव, रघुराज सिंह धाकड़, राकेश गुप्ता और गोटू ने जयवर्धन के सत्कार में अपनी पूरी ताकत लगा दी।
शायद इस स्वागत से ही प्रफुल्लित होकर जयवर्धन ने पत्रकारों से बात करते हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया को जनता के मत का लुटेरा तक कह दिया। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि विधायकों के नाम पर ३५-३५ करोड़ रुपए लिए और इस धनबल के बूते सत्ता परिवर्तन कराया। जयवर्धन की एक खास बात है कि वे बेहद सधे शब्दों में अपनी बात तो कहते ही हैं, तनावग्रस्त भी नहीं होते। उनके इस सहज और सरल स्वभाव के चलते कार्यकर्ता उन्हें बाबा साहब कहते हुए अपना अभिन्न सहयोगी मानने लगे हैं। भाजपा से आए नेता भी एक-दो मुलाकातों में ही उन्हें अपना आत्मीय मानने लगे हैं। यही वजह है कि जो भी नेता दल-बदल करके कांग्रेस में आ रहा है, वह कमलनाथ और दिग्विजय सिंह से तो संपर्क साधता ही है, इस फेरबदल में जयवर्धन से भी खुली बातचीत करता है। इन तीनों नेताओं की सहमति से ही ग्वालियर अंचल में दलबदल के खेल में तेजी आई हुई है।
सिंधिया का वर्चस्व माने जानेवाले ग्वालियर के गढ़ के कंगूरे गिरने के संकेत तो तभी मिल गए थे, जब ग्वालियर और मुरैना के महापौर के पदों पर कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार जिताकर बिठा दिए थे। यह प्रक्रिया निर्वाचन का हिस्सा थी, जिसमें जनता के मत की महिमा रहती है। गोया, इन जीतों का संकेत यह भी था कि सिंधिया ने कांग्रेस को दगा देकर जो घात किया है, वह मतदाता को नहीं सुहाया। इसके बाद इस गढ़ के क्षरण की शुरुआत ही हो गई।
ग्वालियर क्षेत्र में सिंधिया को बड़ा झटका अशोकनगर जिले के कद्दावर नेता यादवेंद्र सिंह यादव के कांग्रेस में आने के साथ लगा है। कांग्रेस प्रमुख कमलनाथ ने उन्हें भोपाल में पार्टी की सदस्यता दिलाई। इस मौके पर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और विधायक जयवर्धन सिंह मौजूद थे। इस इलाके को ज्योतिरादित्य सिंधिया का गढ़ माना जाता है। अशोकनगर में यह चर्चा खुलेआम हो रही थी कि भाजपा के कद्दावर नेता रहे स्वर्गीय देशराज सिंह यादव के बेटे और भाजपा नेता यादवेंद्र सिंह कांग्रेस में जा सकते हैं। दरअसल, देशराज भाजपा के ऐसे बुनियादी नेताओं में रहे हैं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन कांग्रेस का विरोध करते हुए भाजपा को खड़ा करने में खपा दिया था। देशराज जनता में भी खासे लोकप्रिय नेता थे। ज्योतिरादित्य के कांग्रेस में रहने के दौरान ज्योतिरादित्य से मुकाबला करने में भी उन्होंने कभी पीठ नहीं दिखाई थी। उनकी मृत्यु के बाद यादवेंद्र भी इसी परिपाटी पर चलते रहे। साफ है, सिंधिया के भाजपा में आने के बाद यादवेंद्र को उनसे कदम से कदम मिलाना मुश्किल तो लग ही रहा था, यह भी उम्मीद नहीं थी कि २०२३ के चुनाव में उन्हें भाजपा का टिकट मिल पाएगा? यादवेंद्र ने कहा भी कि वे सिंधिया के भाजपा में आने के बाद से ही खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे थे।
इसके बाद तो जैसे दलबदल का तांता ही लग गया। दतिया के भाजपा नेता अवधेश नायक और राजू दांगी कांग्रेस में शामिल हो गए। नायक मध्य प्रदेश पाठ्य पुस्तक निगम के अध्यक्ष भी रहे हैं। शिवपुरी जिले में तो जैसे दलबदल की बाढ़ ही आ गई। बैजनाथ सिंह यादव, रघुराज सिंह, राकेश गुप्ता और जितेंद्र जैन तो सिंधिया को अंगूठा दिखाकर कांग्रेस में आए ही आगे भी कुछ और भाजपाई कांगे्रस में जाने की तैयारी में हैं। इनमें भाजपा के कोलारस विधायक वीरेंद्र रघुवंशी का नाम भी लिया जा रहा है। रघुवंशी दो बार विधायक रहे चुके हैं। एक समय वे सिंधिया की उंगली पकड़कर ही कांग्रेस में राजनीति के सिरमौर बन गए थे। साधारण महिला जूली आदिवासी को जिला पंचायत की अध्यक्ष बनवाकर उन्होंने अपनी राजनीति का डंका पीट दिया था। लेकिन बाद में सिंधिया से अनबन के चलते रघुवंशी भाजपा में शामिल हो गए और कोलारस से विधायक भी बन गए। अब सिंधिया के हस्तक्षेप के चलते ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि कोलारस से सिंधिया उनकी बजाय महेंद्र यादव के लिए टिकट की पैरवी कर रहे हैं। अतएव रघुवंशी कांग्रेस में आकर शिवपुरी में सिंधिया की बुआ यशोधरा राजे सिंधिया के विरुद्ध चुनाव लड़ना चाहते हैं। कांग्रेस उनके जैसा प्रत्याशी शिवपुरी में उतारने की इच्छुक है। बहरहाल, सिंधिया अपने ही गढ़ में बुरी तरह घिरकर निहत्थे होते जा रहे हैं, उनकी गति उस आटे के दिए जैसी हो रही है, जिसे छत पर रखें तो कौवे खा जाते हैं और घर में रखे तो चूहे खा जाते हैं।
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

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