मुख्यपृष्ठस्तंभमध्यांतरः एमपी में गुटबाजी का `राज' मुसीबत में शिवराज!

मध्यांतरः एमपी में गुटबाजी का `राज’ मुसीबत में शिवराज!

प्रमोद भार्गव

मध्य प्रदेश में इस समय क्षेत्रीय क्षत्रपों की गुटबाजी सभी जगह बढ़ती दिखाई दे रही है। ब्राह्मणों पर अनर्गल बयानबाजी करनेवाले प्रीतम लोधी को भाजपा ने निष्कासित कर बाहर का रास्ता क्या दिखाया, वे जातिगत आधार पर एक नई पार्टी खड़ी करने के मंसूबे पालने लग गए। प्रीतम प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के नुमाइंदे माने जाते हैं। बड़वानी में गुटबाजी इस हद तक देखने में आ रही है कि सेंधवा में जब प्रदेश सरकार में पशुपालन एवं डेयरी मंत्री प्रेम सिंह पटेल के बेटे अपने काफिले के साथ गुजर रहे थे, तब पूर्व मंत्री अंतर सिंह आर्य के समर्थकों ने उन्हें काले झंडे दिखाए, पीटने का प्रयास किया और काफिला रोक भी लिया। लोग उनकी गाड़ी पर चढ़ गए। इसी तरह ज्योतिरादित्य सिंधिया कुछ इस करिश्माई अंदाज में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से असंतुष्ट क्षेत्रीय कद्दावर नेताओं को लुभाने में लगे हैं, जो उनके लिए प्रदेश की राजनीति में उद्धारक साबित हों। सिंधिया मुख्यमंत्री बनने का स्वप्न पाले हुए हैं। दरअसल इस गुटबाजी में दो कारणों से उबाल आया हुआ है। हाल ही में शिवराज सिंह को भाजपा संसदीय बोर्ड से बाहर किया गया है। इस सिलसिले में शिवराज समर्थकों का मानना है कि उन्हें इसलिए इस बोर्ड से मुक्त किया गया है, जिससे वे अपना पूरा समय २०२३ के विधानसभा चुनाव को जिताने में लगा दें। हालांकि शिवराज की कुछ ऐसी प्रकृति है कि अपने अब तक के मुख्यमंत्री बने रहने के कार्यकाल में वे हमेशा ही चुनावी स्थिति में रहे हैं और उन्होंने जिन नीतिगत योजनाओं का निर्माण किया, उन्हें अमल में लाने के लिए जो भी अभियान चलाए, अंततः वे चुनावी मुहिम के रूप में ही पेश आए हैं। इस कारण शिवराज अपना वोट बैंक बनाने में भी खास मजबूत नहीं हुए हैं। उनका जातिगत समीकरण तो उनके पक्ष में है लेकिन सरकारी कर्मचारियों को भाजपाई वोट में नहीं बदल पाए हैं। जो आदिवासी समुदाय कांग्रेस का बड़ा वोट बैंक माना जाता था, उसे भी उन्होंने एक रुपए किलो गेहूं और नमक देकर भाजपा के पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं। लिहाजा खेमेबाजी में तात्कालिक उभार भले ही नजर आए, वह अपना निजी वजूद भी कायम कर ले, यह मुश्किल नहीं है। दूसरे नगरीय निकाय और पंचायत चुनावों में गुटबाजी को बढ़ावा देने का आधार भाजपा नेताओं को मिला है। इस गुटबाजी की ताजा तस्वीर सेंधवा में बलवंत पटेल के काफिले पर हुए हमले के रूप में देखने में आई है। दरअसल बड़वानी जिला पंचायत चुनाव में अध्यक्ष पद के लिए भाजपा के ही दो कद्दावर नेताओं के रिश्तेदार मैदान में थे। इनमें से एक अंतर सिंह आर्य की बहू कविता आर्य थीं और दूसरे पशुपालन मंत्री प्रेम सिंह पटेल के बेटे बलवंत पटेल ने बागी होकर यह चुनाव लड़ा और जीता। बलवंत को १४ में से ९ और कविता आर्य को पांच वोट मिले थे। बेटे बलवंत की जीत और पार्टी से बगावत के सवाल पर प्रेम सिंह पटेल ने कहा था कि अब हम चुनाव जीत चुके हैं, अतएव हम सब एक हैं। किंतु चुनाव जीतने के बाद पहली बार जब बलवंत सेंधवा आए तो कविता आर्य के समर्थकों ने उत्पात मचाकर गुटबाजी का स्वर मुखर कर दिया। देखना है अब भोपाल में बैठे भाजपा के वरिष्ठ नेता क्या कार्रवाई करते हैं? इतना तो तय है कि गुटबाजी के इस `राज’ से शिवराज मुश्किल में हैं।
इधर प्रीतम लोधी लगातार पिछड़ा वर्ग बनाम लोधी समाज की रैलियां निकालकर व आम सभाएं करके मुख्यमंत्री शिवराज और भाजपा की नाक में दम किए हुए हैं। वे बिना किसी अनुमति के जुलूस निकालने के साथ आम सभाएं कर रहे हैं। इस कारण उनकी इन गैर-कानूनी पहलों से प्रशासन का भी दम फूल रहा है। प्रीतम लोधी ब्राह्मणों के खिलाफ अनर्गल प्रलाप के बाद चर्चा में बने हुए हैं। उन्होंने शिवपुरी जिले के ग्राम खरह में ब्राह्मणों के संदर्भ में कहा था कि इनसे पूजा-पाठ कराने की जरूरत नहीं है क्योंकि ये स्वयं भावनागत रूप से पवित्र नहीं हैं। उनके इस बयान से समाज गुस्से में आ गया और प्रतिकार स्वरूप करीब दो दर्जन एफआईआर भी प्रीतम के विरुद्ध दर्ज करा दी गर्इं। ब्राह्मणों की नाराजी दूर करने के लिए भाजपा के प्रदेश संगठन ने प्रीतम को बाहर का रास्ता दिखा दिया। प्रीतम पिछोर विधानसभा सीट से दो बार भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़कर हार चुके हैं। उनका मुकाबला कांग्रेस के कद्दावर नेता केपी सिंह से होता है।
प्रीतम को जब अपनी गलती का अहसास हुआ, तब उन्होंने सार्वजनिक रूप से ब्राह्मणों से माफी भी मांगी। लेकिन इस विवाद की आग में घी डालने का काम बागेश्वर धाम के संत धीरेंद्र शास्त्री ने कर दिया। यहां तक कि उन्होंने संत होते हुए भी प्रीतम को मसल देने की बात कह दी। इससे प्रीतम भड़क गए और उन्होंने अपनी जातीय राजनीतिक ताकत दिखाने का सिलसिला शुरू कर दिया। २५ अगस्त को भिंड जिले के मेहगांव में प्रीतम ने एक बड़ी रैली निकाली और महासभा की। इन दोनों कार्यक्रमों की अनुमति भी नहीं ली गई थी। इसके बावजूद प्रशासन ने मेहगांव से भिंड जाने का रास्ता तय कर दिया था। किंतु प्रीतम का काफिला तय मार्ग पर चलने की बजाय मनमर्जी से चलने लगा। इसे जब पुलिसकर्मियों ने रोका तो भीड़ ने पुलिस वाहनों पर पथराव के साथ तोड़-फोड़ भी शुरू कर दी। करीब आठ पुलिसकर्मी घायल हुए। प्रधान आरक्षक गजेंद्र सिंह सिकरवार को ज्यादा चोटें आईं। पूरे जिले का पुलिस बल बुलाकर रैली को नियंत्रित कर गंतव्य तक पहुंचाया गया। यहां रानी अवंती बाई की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया और सभा हुई। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा के खिलाफ नारेबाजी हुई। इस सभा के बाद दूसरी बड़ी सभा शिवपुरी जिले के करैरा में हुई। यहां भी प्रीतम के भिंड जैसे तेवर देखने में आए। चोरी और सीना-जोरी का मुहावरा चरितार्थ हुआ। प्रीतम बिना कोई अनुमति के अपनी मनमानी करके चलते बने और पुलिस दर्जनों एफआईआर दर्ज होने के बावजूद हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। इस रैली के बाद शिवपुरी जिले के लोधी ब्राह्मणों के खिलाफ मुखर हो रहे हैं। दर्जनों ग्रामों के लोधियों ने यह संकल्प ले लिया है कि वे ब्राह्मणों से किसी मांगलिक कार्यक्रम में पूजा-पाठ नहीं कराएंगे। हालांकि क्षेत्र के कांग्रेस विधायक केपी सिंह गांव-गांव नुक्कड़ सभाएं करके समाज को समरस बनाने की मुहिम में जुटे हैं। जबकि केपी और प्रीतम के बीच ३६ का आंकड़ा है। हैरानी इस बात पर है कि आखिर प्रदेश सरकार और संगठन क्यों अब तक हाथ पर हाथ धरे बैठा है? कोई अनुमति नहीं लेने के बावजूद प्रीतम उन सब विधानसभा सीटों पर सक्रिय हो गए हैं, जहां-जहां लोधी समाज की बहुलता है। प्रदेश की २३० विधानसभा सीटों में से ९४ ऐसी सीटें हैं, जहां पांच हजार से लेकर पचास हजार तक लोधी वोट हैं लेकिन करीब ३० सीटें ऐसी हैं, जिन्हें लोधी वोट-बैंक प्रभावित करता रहा है। बुंदेलखंड की अधिकतम सीटों पर लोधी वोट की अपनी महिमा है। इसी कारण उमा भारती का मध्य प्रदेश की राजनीति में वजूद बना हुआ है। राजनीति के विश्लेषकों का ऐसा मानना है कि उमा भारती अगले विधानसभा चुनाव में अपनी अहमियत जताने की दृष्टि से प्रीतम लोधी को शह दे रही हैं, जिससे उनके मुख्यमंत्री बनने का मार्ग प्रशस्त हो जाए। पिछले कई महीनों से उमा भारती शराब बिक्री को लेकर भी प्रदेश सरकार के खिलाफ मुखर प्रदर्शन में लगी हुई हैं लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। ऐसे में प्रीतम के बढ़ते जनाधार से उमा भारती को संजीवनी अनुभव हो रहा है। क्षेत्रीय क्षत्रपों को प्राणवायु देकर अपने पक्ष में कर लेने की दृष्टि से केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी जुटे हुए हैं। उन्होंने बीते रविवार को भाजपा की संपन्न हुई कोर समिति की बैठक में हिस्सा लेने के लिए भोपाल की सड़कों पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया। एक बड़ा जुलूस निकाल कर वे बैठक में हिस्सा लेने भाजपा कार्यालय पहुंचे। इस जुलूस में बड़ी भीड़ थी, उनके सर्मथकों ने सिंधिया का ढोल-धमाकों और फूलों से जबरदस्त स्वागत किया।

(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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