मुख्यपृष्ठस्तंभमध्यांतर : मध्य प्रदेश में तीसरा विकल्प बनने की होड़ में बसपा

मध्यांतर : मध्य प्रदेश में तीसरा विकल्प बनने की होड़ में बसपा

प्रमोद भार्गव
शिवपुरी (मध्य प्रदेश)

मध्य प्रदेश की दो ध्रुवीय राजनीति में तीसरा विकल्प बनने के प्रयासों में बहुजन समाज पार्टी जुटी है। उसे तीसरा विकल्प बनने की गुंजाइश इसलिए भी ज्यादा दिख रही है, क्योंकि अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी जंजाल में फंसी है और उसके कई विधायक व मंत्री जेल में हैं। समाजवादी पार्टी इसलिए कमजोर है, क्योंकि वह मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति से बाहर नहीं निकल पाई है। सपा मध्य प्रदेश में इंडिया गठबंधन के प्रमुख दल कांग्रेस से भी गठबंधन करने में सफल नहीं हुई है। इसकी छटपटाहट सपा प्रमुख अखिलेश यादव और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ की नोक-झोंक में भी नजर आती रही है। बावजूद बसपा ने २०२३ के इस विधानसभा चुनाव में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (गोंगपा) के साथ गठबंधन किया है। नतीजतन, बसपा प्रदेश की २३० सीटों में से १८३ और गोंगपा ४५ से अधिक सीटों पर चुनावी समर में कई सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबले में कांग्रेस या भाजपा में से किसी एक का खेल बिगाड़ने में कामयाब होती दिख रही है। हालांकि, परिणाम आने पर ही पता चलेगा कि त्रिकोणीय मुकाबले में वोटों का बंटवारा किसका हित साधने वाला साबित हुआ है।
इस चुनाव में भाजपा या कांग्रेस से टिकट न मिलने के कारण नाराज २२ उम्मीदवार अपना दल छोड़कर बसपा, सपा या ‘आप’ के चुनाव चिह्न पर चुनावी समर में किस्मत आजमा रहे हैं। इन रूठों को दल प्रमुखों ने समझाने एवं मनाने की कोशिशें भी कीं। सत्ता में आने पर किसी आयोग, निगम या मंडल का अध्यक्ष बना देने के प्रलोभन भी दिए। लेकिन रूठे माने नहीं। हालांकि, इस बार मतदान के बदले तरीके के चलते ३४ सीटों पर महिलाओं ने अधिक मतदान किया है। यह मतदान २०१८ में ७४.०१ था, जो अब बढ़कर ७६.०३ हो गया है। नतीजतन, चुनाव विश्लेषकों का अनुमान है कि बागियों के मतों की पूर्ति महिलाएं कर देंगी। लेकिन यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि महिलाओं का बढ़ा हुआ मत प्रतिशत किस दल के खाते में गया है। भाजपा लाडली लक्ष्मी योजना के चलते इसे अपने पक्ष में तो कांग्रेस नारी सम्मान निधि और ४५० में गैस सिलिंडर देने के वादे के चलते अपने पक्ष में मान रही है।
मध्य प्रदेश के ग्वालियर-चंबल और उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे विंध्य, बघेल और बुंदेलखंड के अंचलों में बसपा ने चुनाव परिणामों में बढ़त दिखाई है, जबकि सपा मध्यांचल और महाकौशल क्षेत्रों में जीत दर्ज करा चुकी है। बसपा ने सबसे कम ७ प्रतिशत और सबसे अधिक ११ प्रतिशत मत हासिल करने में सफलता पाई है। १९९३ और १९९८ के चुनावों में बसपा के ११ उम्मीदवार विजयी रहे थे। दोनों ही बार कांग्रेस की सरकार बनी थी। परंतु २००३ के चुनाव में उमा भारती ने जब दिग्विजय सिंह को बंटाधार मुख्यमंत्री कहकर चुनौती दी तो भाजपा १७३ सीटें जीतकर सिरमौर रही और कांग्रेस सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया था। भाजपा की इस लहर में भी बसपा १०.६ प्रतिशत मत हासिल करने में सफल रही और उसके दो विधायक भी बने। २०१८ के चुनाव में उसने ६.४२ प्रतिशत मत हासिल करके दो सीटों पर विजय प्राप्त की और कांग्रेस की कमलनाथ सरकार बनाने में अपना योगदान दिया। इस वर्ष सपा से भी एक विधायक जीते थे, उनका सहयोग भी कांग्रेस को मिला था। २००३ में सपा के सबसे अधिक सात विधायक जीते थे। इस चुनाव में सपा को ५.२६ फीसदी वोट मिले थे। यह इस बात का संकेत है कि बसपा या सपा का वोट बैंक स्थिर रहने की बजाय बढ़ता या घटता रहता है।
बाद में ज्योतिरादित्य सिंधिया की नाराजगी के चलते कमलनाथ सरकार को मुंह के बल गिरना पड़ा और शिवराज सिंह चौहान सत्ता की घोड़ी पर फिर सवार हो गए। इस तरह से बनाई गई भाजपा सरकार को सबसे बड़ी चुनौती सिंधिया के गढ़ कहे जानेवाले ग्वालियर-चंबल अंचल में ही झेलनी पड़ रही है। भाजपा से असंतुष्ट सबसे ज्यादा बागी ग्वालियर-अंचल में ही त्रिकोणीय मुकाबले का प्रमुख आधार बन रहे हैं। इनमें भिंड से संजीव सिंह कुशवाह, चाचैड़ा से ममता मीणा, अटेर से मुन्नालाल भदौरिया, मुरैना से राकेश सिंह, दिमनी से बलबीर दंडोतिया और लहार से रसाल सिंह चुनावी समर में हैं। वहीं कांग्रेस से नाराज पोहरी में प्रद्युम्न सिंह वर्मा, सुमावली से कुलदीप सिंह सिकरवार त्रिकोणीय मुकाबले में अग्रणी दिख रहे हैं।
दिमनी में केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे बलबीर दंडोतिया कड़ी चुनौती दे रहे हैं। दरअसल, यहां से कांग्रेस प्रत्याशी दिमनी से वर्तमान विधायक रविंद्र तोमर हैं। रविंद्र और नरेंद्र एक ही जाति समूह से आते हैं, इसलिए जब नरेंद्र सिंह को अपना खेल बिगड़ते दिखा तो उन्होंने ब्राह्मण समुदाय के एक बड़े समूह को प्रशासन की मदद से वोट डालने ही नहीं जाने दिया। हालांकि, कुछ मतदान केंद्रों पर ब्राह्मणों ने भी ठाकुरों को वोट डालने से रोका। दोनों समुदायों में मुंहवाद और पत्थरबाजी भी देखने में आई है। इन बदले हालातों के चलते नरेंद्र सुरक्षित स्थिति में जरूर दिख रहे हैं, लेकिन बलबीर का डंक भी लग सकता है?
(लेखक, साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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