मुख्यपृष्ठखबरेंमध्यांतर: तोमर का तगड़ा होना, भाजपा के लिए घातक!

मध्यांतर: तोमर का तगड़ा होना, भाजपा के लिए घातक!

इधर, ग्वालियर अंचल के दिग्गज नेता और कृषि एवं कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को मध्य प्रदेश की विधानसभा चुनाव प्रबंधन समिति का संयोजक नियुक्त किया गया। उधर, भाजपा के दो बड़े नेताओं ने भाजपा छोड़ कांग्रेस का दामन थाम लिया। इनमें से एक नेता अवधेश नायक ग्वालियर क्षेत्र के दतिया से ही हैं। वे पाठ्यपुस्तक निगम के उपाध्यक्ष भी रहे हैं। दूसरे नेता सागर जिले की सुर्खी से राजकुमार सिंह धनौरा हैं। दोनों नेता बड़ी-बड़ी कारों के बड़े काफिले और समर्थकों की भारी भीड़ के साथ भोपाल पहुंचे और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ की उपस्थिति में पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली। नायक के साथ २६३ और धनौरा के काफिले में ३०० कारों का जमावड़ा था। दोनों नेताओं ने कांग्रेस में शामिल होने के बाद भाजपा में अपमानित और प्रताड़ित किए जाने का आरोप लगाया है। इन दोनों नेताओं के कांग्रेस में आने से कमलनाथ और दिग्विजय सिंह गदगद हैं और उन्हें उम्मीद है कि अभी और लोग भाजपा से कांग्रेस में आएंगे।
तोमर के पार्टी में तगड़े होने से भाजपा के लिए अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने का यह एक उदाहरण है। कमलनाथ ने कहा है कि ‘सुर्खी और दतिया जैसे अनेक क्षेत्र हैं, जहां लोगों को प्रताड़ित किया जा रहा है। इन नेताओं ने भाजपा के विरोध में बिगुल बजा दिया है, जो पूरे प्रदेश में गूंजेगा।’ जबकि, दिग्विजय सिंह ने कहा है कि इस बार कांग्रेस की सरकार इतने विधायकों की बनेगी कि कोई तोड़ नहीं सकेगा। नरेंद्र सिंह तोमर के लिए यह सिर मुड़ाते ही ओले पड़ने जैसा है। प्रदेश में भाजपा की हो रही खस्ता हालत के चलते तोमर को समन्वयक बनाया गया है। पिछले दिनों पेशाब कांड को लेकर प्रदेश को राष्ट्रीय स्तर पर बदनामी झेलनी पड़ी थी। इस कांड से हुई खराब राजनैतिक हालात को सुधारने की दृष्टि से केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भोपाल आए थे। तभी तोमर की नियुक्ति की पटकथा लिख दी गई थी।
मध्य प्रदेश भाजपा में जारी गुटबाजी और मुख्य नेताओं द्वारा पार्टी छोड़ने की जानकारियां शाह के पास पूर्व से ही थीं। अतएव गुटबाजी और पलायन भाजपा के लिए संकट खड़ा करे, इससे निपटने की दृष्टि से ही तोमर को आनन-फानन में चुनाव प्रबंधन समिति का संयोजक बनाया गया। केंद्रीय नेतृत्व के माध्यम से ही प्रदेश में भूपेंद्र यादव और अश्विनी वैष्णव को चुनाव प्रभारी बनाया गया था। इन नियुक्तियों से संकेत मिलता है कि चुनाव की पूरी कमान अमित शाह की मुट्ठी में है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की भूमिका सीमित हो चुकी है। हालांकि, तोमर सबसे समन्वय बनाकर चलनेवाले नेता हैं। इसलिए वे शिवराज के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी साधे रहने में सफल होंगे, ऐसा लोगों को विश्वास है। लेकिन चुनाव और टिकट वितरण संबंधी सबसे ज्यादा चुनौतियां ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में ही पेश आएंगी, जिनसे निपटना तीनों दिग्गजों के लिए आसान नहीं होगा।
सिंधिया समझ रहे हैं कि विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा जोखिम उन्हीं के इर्द-गिर्द है, क्योंकि उनके समर्थक मंत्री और विधायक कांग्रेस से आए हैं। इसलिए भाजपा और संघ की विचारधारा और कार्यशैली से तालमेल बिठाकर चलना उनके लिए मुश्किल हो रहा है, उस पर कांग्रेस की तरफ से भी सर्वाधिक घेराबंदी उन्हीं सीटों पर है, जिन पर सिंधिया समर्थक विधायक हैं। नतीजतन, सिंधिया अपने समर्थकों की टिकट और चुनावी रणनीति के लिए संयम व समन्वय का दृष्टिकोण अपना रहे हैं। सिंधिया अपनी बैठकों में समर्थकों को इसी मंत्र की घुट्टी पिलाने में लगे हैं। दरअसल, कांग्रेस से बगावत के समय सिंधिया के साथ २२ विधायक-मंत्री भाजपा में शामिल हुए थे। इनमें से तीन अदल सिंह कंसाना, हरदीप सिंह डंग और बिसाहूलाल साहू सिंधिया खेमे के नहीं होने के बावजूद उन्हीं के खेमे में आ गए थे। १९ विधायक और मंत्री सीधे सिंधिया के निष्ठावान अनुयायी हैं। अब चुनौती इन्हीं १९ विधायकों के साथ पेश आ रही है। डंग व बिसाहूलाल के मंत्री होने के नाते उनकी टिकट की दावेदारी पक्की है। कंसाना चुनाव हारने के बावजूद एमपी एग्रो इंडस्ट्री डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष हैं। लिहाजा, इन्हें टिकट मिलना आसान नहीं है। इसी तरह टिकट मिलने के बावजूद हार चुके रघुराज सिंह कंसाना, इमरती देवी, गिर्राज दंडोतिया, मुन्नालाल गोयल, रणवीर जाटव और जसवंत जाटव को भी टिकट मिलना आसान नहीं है। हालांकि, इन सभी को हार का मुंह देखने के बावजूद सिंधिया के दबाव के चलते निगमों का उपाध्यक्ष बनाकर राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया गया है। इसके बावजूद जीत की दृष्टि से इन्हें अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा उपयुक्त प्रत्याशी नहीं मान रही है। भाजपा के आंतरिक सर्वेक्षणों में भी इनका रिपोर्ट कार्ड उत्तम नहीं रहा है।
खैर, अवधेश नायक का भाजपा छोड़ना तोमर, सिंधिया और दतिया से विधायक व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा के लिए भी बड़ा झटका माना जा रहा है। यदि कांग्रेस अवधेश नायक को टिकट देती है तो जीत-हार के समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। अवधेश नायक एक बार उमा भारती की जनशक्ति पार्टी से चुनाव लड़कर भी अपना दमखम दिखा चुके हैं। हालांकि, नरोत्तम मिश्रा ने पूरे दतिया क्षेत्र में विकास कार्यों के साथ लोगों के व्यक्तिगत काम करके घर-घर पैठ बनाई है। इन सबके बावजूद २०१८ में मिश्रा बमुश्किल चुनाव जीत पाए थे। इसी तरह राजकुमार धनौरा सुर्खी में परिवहन मंत्री गोविंद सिंह राजपूत की जीत में बड़ा अड़ंगा साबित हो सकते हैं। उन्हें राजपूतों के खिलाफ बयानबाजी करने के कारण भाजपा से निष्कासित कर दिया गया था। तभी से वे कांग्रेस में जाने का मन बना रहे थे। इन दोनों नेताओं के भाजपा छोड़ने से ये आशंकाएं भी बढ़ रही हैं कि अभी और भी नेता पार्टी छोड़ेंगे। इससे जहां भाजपा को नुकसान होगा, वहीं कांग्रेस मजबूत होती जाएगी। अंत में, बड़ा सवाल यह है कि रूठों को मनाने के लिए तोमर को समन्वयक की जो जिम्मेदारी दी गई है, वह असरकारी क्यों साबित नहीं हो रही है? क्या इसके पीछे उनका राजनैतिक तौर पर तगड़ा होना है?

प्रमोद भार्गव
शिवपुरी (मध्य प्रदेश)
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

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